चंद्रमा की मिट्टी से बनेगी ऑक्सीजन, रॉकेट के लिए बनेगा गैस स्टेशन! मिशन मंगल में बड़ी कामयाबी!
वैज्ञानिकों ने कहा कि, रॉकेट के लिए ईंधन लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन से बनता है और चंद्रमा की मिट्टी से रॉकेट के लिए ईंधन तैयार किया जा सकता है।
नई दिल्ली, मई 06: मंगल ग्रह पर इंसानों की दुनिया बसाना बहुत बड़ा लक्ष्य है और इसके लिए दुनियाभर के अंतरिक्ष वैज्ञानिक दिन रात काम करते रहते हैं और दुनियाभर में मंगल ग्रह को लेकर सैकड़ों रिसर्च किए जा रहे हैं और एक नये रिसर्च में पाया गया है कि, चंद्रमा की मिट्टी को संभावित रूप से रॉकेट ईंधन में परिवर्तित किया जा सकता है, ताकि मंगल ग्रह पर भविष्य के मिशनों को शक्ति प्रदान की जा सके।

चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन
चीन के चांग'ई 5 अंतरिक्ष यान पिछले कुछ महीने पहले चंद्रमा पर एक मिशन को अंजाम देकर वापस लौटा था, लेकिन इस अंतरिक्ष यान में चंद्रमा की सतह से उसकी मिट्टी और कई दूसरे पदार्थ फंस गये थे, जिसका वैज्ञानिकों ने विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण के दौरान पाया गया है कि, चंद्रमा पर मौजूद रेजोलिथ में ऐसे यौगिक होते हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में परिवर्तित करते हैं।

कैसे बनेगी ऑक्सीजन?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रमा के सतह पर मौजूद मिट्टी में लोहा और टाइटेनियम प्रचूर मात्रा में मौजूद है, जो सूर्य के प्रकाश के तहत उत्प्रेरक के रूप में काम करती है और कार्बन डाइऑक्साइड और अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर द्वारा छोड़े गए पानी को ऑक्सीजन, हाइड्रोजन और मीथेन जैसे अन्य उपयोगी उप-उत्पादों में बदल सकती है, ताकि चंद्र आधार को शक्ति मिल सके। वैज्ञानिकों ने कहा कि, रॉकेट के लिए ईंधन लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन से बनता है और चंद्रमा की मिट्टी से रॉकेट के लिए ईंधन तैयार किया जा सकता है। इस रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों की उम्मीद बंधी है, कि भविष्य में मिशनों के लिए चंद्रमा पर गैस स्टेशन का निर्माण किया जा सकता है। इस रिसर्च को दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण और भविष्य के अगले कदम के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अंतरिक्ष की कक्षा में ईंधन भेजना काफी ज्यादा महंगा होता है।

भविष्य में मिशनों को काफी फायदा
दरअसल, अभी जो रॉकेट अंतरिक्ष में लांच किए जाते हैं, उसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडल में खिंचाव की वजह से कई टन ईंधन की जरूरत होती है, इसीलिए अगर धरती से ईंधन ले जाने की जरूरत ही ना पड़े, तो बहुत सारा पैसा बच सकता है। चीन में नानजिंग विश्वविद्यालय के अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रोफेसर यिंगफैंग याओ ने कहा कि, 'हम रॉकेट पेलोड को कम करने के लिए इन-सीटू पर्यावरण संसाधनों का उपयोग करते हैं। हमारी रणनीति एक स्थायी और किफायती वातावरण को खोजना है, जिससे हमें भविष्य के मिशनों के लिए फायदा हो'। रिसर्चर्स ने 'अतिरिक्त-स्थलीय प्रकाश संश्लेषण' नामक एक टेक्नोलॉजी का प्रस्ताव दिया है, जिससे चंद्रमा की मिट्टी और सौर विकिरण का फायदा उठाकर रॉकेट के लिए ईंधन बनाया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि, चंद्रमा की सतह पर प्रचूर मात्रा में संसाधन मौजूद हैं।

चंद्रमा पर बनेगा गैस स्टेशन?
वैज्ञानिकों के लिए मिशन मंगल की सबसे बड़ी समस्या ईंधन ही है, क्योंकि लाखों टन ईंधन के साथ मंगल ग्रह के लिए मिशन लांच करना आसान नहीं होता है, लिहाजा वैज्ञानिक पिछले कई सालों से इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं, कि अगर बीच में किसी ग्रह पर गैस स्टेशन होता है, तो फिर बीच में रॉकेट में ईंधन भरा जा सकता है और चंद्रमा इसके लिए सबसे मुफीद जगह है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि, चंद्रमा पर प्रकाश संश्लेषण की वजह से इंसानों के सांस में जो ऑक्सीजन और हाइड्रोजन मौजूद रहता है, वो अलग अलग हो जाता है और वैज्ञानिकों का मानना है कि, चंद्रमा पर इंसानों की सांस से निकले कार्बन डायऑक्साइड को एकत्र किया जा सकता है और फिर उसे चंद्रमा की मिट्टी से उत्प्रेरित कर उससे ईंधन बनाया जा सकता है। इस प्रक्रिया से मीथेन जैसे हाइड्रोकार्बन उत्पन्न होते हैं, जिनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है, जबकि सूर्य के प्रकाश से पानी, ऑक्सीजन और ईंधन का उत्पादन होता है, जो चंद्रमा के आधार पर जीवन का भी समर्थन कर सकता है।

चंद्रमा पर बसाया जा सकता है गांव?
चीनी वैज्ञानिकों के इस रिसर्च से चंद्रमा पर गांव बसाने की भी एक उम्मीद जगी है, जिसके अंतर्गत और लांच पैड और खनन कार्य किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, चंद्रमा मूल्यवान संसाधनों का खजाना है, जिसमें अगली पीढ़ी के इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए सोना, प्लेटिनम और अन्य दुर्लभ धातुएं हैं जो सभी निष्कर्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वहीं, चीन भविष्य में चंद्रमा के लिए जिन मिशनों को लांच करेगा, उन चंद्र मिशनों में इलेक्ट्रोलिसिस के रूप में जानी जाने वाली अक्षय ऊर्जा पद्धति का परीक्षण करेगा और अगर चीन को इसमें कामयाबी मिल जाती है, तो चीन के अंतरिक्ष विज्ञान को बहुत बड़ी कामयाबी मिल जाएगी। चीन के वैज्ञानिक, प्रो याओ ने कहा कि, डिजाइन को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न तरीकों पर कोशिश की जा रही है, जैसे मिट्टी को नैनो-संरचित सामग्री में पिघलाना शामिल है। हालांकि, नासा के परसरवेंरेस मंगल रोवर भी कार्बन डाइऑक्साइड से ऑक्सीजन बनाता है, लेकिन यह एक परमाणु बैटरी द्वारा संचालित होता है।

क्रू स्पेसफ्लाइट इंडस्ट्री का विकास
चीन के वैज्ञानिक और इस रिसर्च को करने वाले प्रो याओ ने कहा कि, 'निकट भविष्य में, हम देखेंगे कि क्रू स्पेसफ्लाइट उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है'। उन्होंने कगा कि, 1600 के दशक में "सेल की उम्र" की तरह, जब सैकड़ों जहाज समुद्र में जाते थे, उसी तरह से हम "अंतरिक्ष के युग" में प्रवेश करेंगे'। उन्होंने कहा कि, 'लेकिन अगर हम अतिरिक्त-स्थलीय दुनिया के बड़े पैमाने पर अन्वेषण करना चाहते हैं, तो हमें पेलोड को कम करने के तरीकों के बारे में सोचना होगा, जिसका अर्थ है कि जितना संभव हो सके, पृथ्वी से कम सामान ले जाने पर काम करना होगा और इसके बजाए अलग अलग ग्रहों पर सामग्रियों के निर्माण पर ध्यान देना होगा'।

नासा बनाएगा चंद्रमा पर कैंप
आपको बता दें कि, नासा की महत्वाकांक्षी आर्टेमिस परियोजना 2028 तक चंद्र पर एक कैंप बनाने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है, साथ ही मंगल ग्रह पर आने वाले वक्त में मिशनों को आसानी हो, इसके लिए चंद्रमा पर अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की योजना पर काम कर रहा है। चीन अगले 10 वर्षों के भीतर मंगल पर पहला मानव उतारकर मंगल ग्रह की रेस को जीतने के लिए काफी तेजी से काम कर रहा है। चीन इस शताब्दी को अपना मानता है और चाहता है, कि मंगल ग्रह पर पहली बार इंसानों को भेजने का रिकॉर्ड उसके नाम पर दर्ज हो, जैसे चंद्रमा पर पहली बार इंसानों का भेजने का रिकॉर्ड अमेरिका के नाम पर दर्ज है।












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