रॉकेट्स, मोर्टार, बम, बारूद; पाकिस्तान में कैसे छिड़ी शिया और सुन्नियों के बीच जंग? 50 से ज्यादा मरे, 200 घायल

Pakistan News: पाकिस्तान में एक जमीन विवाद खतरनाक सुन्नी-शिया संघर्ष में बदल गया, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए हैं। यह घटना अफगानिस्तान की सीमा पर खैबर पख्तूनख्वा (केपी) प्रांत की राजधानी पेशावर से लगभग 220 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिमी कुर्रम आदिवासी जिले में हुई हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को युद्धरत जनजातियों ने बुज़ुर्गों की मदद से युद्ध विराम की घोषणा की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये काफी खतरनाक इलाका माना जाता है और अकसर यहां पर शिया और सुन्नियों के बीच हिंसक झड़पें होती रहती हैं।

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लेकिन इस बार क्या हुआ है, हिंसा में शामिल ये जनजातियां क्या हैं, आइये जानते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, यह घटना पिछले हफ्ते एक सुन्नी परिवार और एक शिया परिवार के बीच संपत्ति विवाद के बाद शुरू हुई थी। स्थानीय अधिकारियों ने बताया है, कि ऊपरी कुर्रम जिले के बोशेरा गांव में पांच दिन पहले भारी झड़पें शुरू हुईं। इसके बाद अशांति पूरे जिले के गांवों और बस्तियों में फैल गई।

अधिकारियों ने बताया कि मृतकों में से 34 शिया जनजाति के थे, जबकि आठ सुन्नी जनजाति के थे। डॉन के मुताबिक, ये परिवार बोशेरा और मालीखेल जनजाति के हैं।

दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर हमला करने के लिए भारी हथियारों का इस्तेमाल किया। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, रविवार रात और सोमवार सुबह अफगान सीमा के पास ऊपरी कुर्रम के मकबल और टेरी मंगल इलाकों के साथ-साथ मध्य कुर्रम में पारा चमकानी और निचले कुर्रम में बालिश खेल में जनजातियों के बीच गोलीबारी की गई।

डॉन के अनुसार, पीवर, टांगी, बालिशखेल, खार कलाय, मकबल, कुंज अलीजई, पारा चमकानी और करमन में भी झड़पें हुईं। स्थानीय लोगों ने कहा, कि दोनों पक्ष एक दूसरे के खिलाफ मोर्टार शेल और रॉकेट लॉन्चर सहित भारी और खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने कहा, कि कुर्रम आदिवासी जिले के मुख्य शहरों पाराचिनार और सद्दा पर भी मोर्टार और रॉकेट गोले दागे गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन परिवारों के रिश्तेदार डूरंड रेखा के दोनों ओर रहते हैं, जो पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच की सीमा रेखा है, जिसे तालिबान नहीं मानता है।

द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, झड़पों के कारण जिले के कई गांवों में भोजन और जीवनरक्षक दवाओं की कमी हो गई है, क्योंकि अधिकारियों ने सड़कें बंद कर दी हैं। पाराचिनार अस्पताल के एक अधिकारी ने डॉन को बताया, कि कम से कम 12 घायल व्यक्तियों को मरनासन्न हालात में पेशावर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।

क्या हिंसा से खत्म हो पएगा भूमि विवाद?

अधिकारियों ने आदिवासी बुजुर्गों- जिन्हें जिरगा के नाम से जाना जाता है - सैन्य नेतृत्व, पुलिस और जिला प्रशासन की मदद से बोशेरा, मलिकेल और डंडार क्षेत्रों में शिया और सुन्नी जनजातियों के बीच समझौता करवाया है।

जिला पुलिस अधिकारी (डीपीओ) निसार अहमद खान ने अरब न्यूज को बताया, कि "अधिकारियों ने आदिवासी बुजुर्गों की मदद से दोनों जनजातियों के बीच समझौता करवाया है।" उन्होंने कहा, कि "पुलिस अब युद्धरत जनजातियों से बंकर और खाइयों को खाली करवाने और उन बंकरों पर नियंत्रण हासिल करने में व्यस्त है।"

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार में प्रवासी पाकिस्तानियों के लिए संघीय मंत्री के रूप में काम करने वाले स्थानीय राजनेता साजिद हुसैन तुरी ने अरब न्यूज को बताया, कि "सबसे पहले युद्ध विराम करवाना प्राथमिकता थी।" तुरी ने कहा, "दूसरे चरण में जिरगा भूमि विवाद का निपटारा करेगा।"

कश्मीरियत अखबार ने खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर के हवाले से कहा, कि "किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने या क्षेत्र की शांति भंग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।"

हालांकि, इलाके के सभी शैक्षणिक संस्थान और बाजार बंद हैं, जबकि मुख्य सड़कों पर दिन के दौरान यातायात को अभी भी रोककर रखा गया है। अधिकारियों ने कहा, कि प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस और सुरक्षा बलों की भारी टुकड़ियां तैनात की गई हैं।

कुर्रम के डिप्टी कमिश्नर जावेदुल्लाह महसूद ने डॉन को बताया, कि "हमने हिंसा में शामिल सभी लोगों को स्पष्ट चेतावनी दी है, कि वे संघर्ष विराम करें और स्थिति को और न बिगाड़ें। मुझे विश्वास है कि इसका असर होगा।"

डॉन के अनुसार, हिंसा का विरोध करने के लिए सोमवार को कोहाट में तीन अलग-अलग जगहों पर भारी भीड़ ने हंगू राजमार्ग को जाम कर दिया। उस्तारजई पुलिस ने डॉन को बताया, कि कहका पाखा, मोहम्मदजई और नुसरतखेल इलाकों में राजमार्ग को ब्लॉक कर दिया गया है।

क्षेत्र में हिंसा का रहा है लंबा इतिहास

कश्मीरियत अखबार के मुताबिक, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यह जिला पिछले कई वर्षों से लगातार भ्रष्टाचार और संघर्ष से ग्रस्त रहा है। स्थानीय और संघीय अधिकारियों ने शांति बनाए रखने के लिए संघर्ष किया है, क्योंकि शिया अल्पसंख्यकों को हिंसा का खामियाजा भुगतना पड़ा है।

कुर्रम जिले का पाराचिनार शहर सुन्नी पाकिस्तान के कुछ शिया बहुल इलाकों में से एक है।

यह पहली बार नहीं है जब इस क्षेत्र में इस तरह की झड़पें हुई हैं।

द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, कुर्रम में वर्तमान में आठ बड़े विवाद चल रहे हैं - उनमें से कई विभाजन से पहले के युग से जुड़े हैं।

कश्मीरियत के अनुसार, गेडू मेंगल और पेवार जनजातियों के बीच एक पुराने विवाद में 2023 में हिंसा भड़क उठी। 2011 के मुरी समझौते का मकसद पूरे जिले में संपत्ति विवादों को बढ़ने से रोकना था।

हालांकि, समझौते के लागू न होने के कारण बार-बार झड़पें होती रही हैं।

अरब न्यूज ने बताया है, कि 2007 में एक बड़ी झड़प शुरू हुई और चार साल तक जारी रही, जब तक कि 2011 में एक जिरगा ने इसे खत्म करने में मदद नहीं की।

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