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World News Hindi: भारतीय को बोला 'गुलाम-धोखेबाज', फिर लंदन की कोर्ट ने सुनाई ऐसी सजा सुनकर दिल खुश हो जाएगा

London KFC racism case: दक्षिण-पूर्व लंदन के एक KFC आउटलेट में भारतीय मूल के कर्मचारी मधेश रविचंद्रन के साथ हुए नस्लीय भेदभाव के मामले में ब्रिटिश अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। तमिलनाडु के रहने वाले रविचंद्रन को उनके श्रीलंकाई तमिल बॉस द्वारा 'गुलाम' और 'धोखेबाज' जैसी अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल ने न केवल नस्लीय भेदभाव को सही पाया, बल्कि रविचंद्रन को गलत तरीके से नौकरी से निकालने के लिए कंपनी पर 67,000 पाउंड (लगभग 74 लाख रुपये) का भारी जुर्माना भी लगाया। यह फैसला कार्यस्थल पर समानता और मानवाधिकारों की बड़ी जीत मानी जा रही है।

London KFC racism case

नस्लीय टिप्पणियां और 'गुलाम' शब्द का प्रयोग

ट्रिब्यूनल की सुनवाई में मधेश रविचंद्रन ने अपने प्रबंधक काजन के खिलाफ चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने बताया कि उनके बॉस अक्सर उन्हें 'गुलाम' कहकर संबोधित करते थे और भारतीय धोखेबाज होते हैं जैसी नस्लवादी बातें कहते थे। न्यायाधीश पॉल एबॉट ने इन आरोपों को सही पाया और माना कि रविचंद्रन (Madhesh Ravichandran KFC) को सिर्फ उनके भारतीय मूल के होने के कारण मानसिक प्रताड़ना दी गई। यह मामला कार्यस्थल पर मौजूद घटिया मानसिकता और गहरे नस्लीय पूर्वाग्रह को उजागर करता है।

छुट्टियों में भेदभाव और पक्षपात

जांच में यह भी सामने आया कि प्रबंधक काजन जानबूझकर रविचंद्रन के साथ पक्षपात करता था। वह अन्य श्रीलंकाई तमिल सहकर्मियों की छुट्टियों की अर्जियों को तुरंत स्वीकार कर लेता था, लेकिन रविचंद्रन की वैध छुट्टियों को भी खारिज कर दिया जाता था। ट्रिब्यूनल ने इसे 'कम अनुकूल व्यवहार' की श्रेणी में रखा, जहां एक कर्मचारी को उसकी राष्ट्रीयता के आधार पर मूल अधिकारों से वंचित रखा गया। यह भेदभाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रशासनिक निर्णयों में भी स्पष्ट था।

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Indian employee 74 lakh compensation: ट्रिब्यूनल का सख्त फैसला और जुर्माना

नेक्सस फूड्स लिमिटेड, जो इस KFC फ्रैंचाइजी का संचालन करती है, को अदालत ने कड़ी फटकार लगाई है। ट्रिब्यूनल ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह रविचंद्रन को मुआवजे के रूप में 74 लाख रुपये का भुगतान करे। इसके साथ ही, अगले छह महीनों के भीतर कंपनी को अपने सभी कर्मचारियों और प्रबंधकों के लिए 'वर्कप्लेस भेदभाव प्रशिक्षण' कार्यक्रम अनिवार्य रूप से लागू करना होगा, ताकि भविष्य में किसी अन्य कर्मचारी को ऐसी प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।

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प्रवासी भारतीयों के लिए न्याय की मिसाल

ब्रिटेन में कार्यरत प्रवासी भारतीयों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए यह फैसला एक बड़ी कानूनी जीत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े अदालती आदेश कंपनियों को अपनी नीतियों में सुधार करने और कार्यस्थल पर एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए मजबूर करेंगे। रविचंद्रन का मामला साबित करता है कि यदि कोई कर्मचारी साहस दिखाकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है, तो एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल जैसे संस्थान उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।

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