जापान: भूकंप के बाद फिर बढ़ी परमाणु संयंत्रों को लेकर चिंता

टोक्यो, 17 मार्च। बुधवार 16 मार्च को फुकुशिमा प्रांत एक बार एक तीव्र भूकंप के झटकों से हिल गया. भूकंप की तीव्रता बाद में 7.4 पाई गई और उसके झटकों से प्रांत में काफी नुकसान हुआ. अभी तक कम से कम चार लोगों के मारे जाने और 200 से ज्यादा के घायल होने की पुष्टि हुई है.
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भूकंप के तुरंत बाद सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई थी, लेकिन गुरुवार सुबह चेतावनी को हटा लिया गया. भूकंप के बाद लाखों घरों में बिजली भी चली गई थी, लेकिन बिजली कंपनियों का कहना है कि सप्लाई फिर से शुरू कर दी गई है.
फुकुशिमा हादसे की वर्षगांठ
2011 में एक सुनामी के बाद फट पड़ने वाला फुकुशिमा दाईची परमाणु ऊर्जा संयंत्र इसी प्रांत में स्थित है. हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि ताजा भूकंप का इस संयंत्र पर कोई असर नहीं पड़ा है.

शुरू में अधिकारियों ने कहा था कि संयंत्र की एक टरबाइन बिल्डिंग में आग का एक अलार्म बजने लगा था. लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि किसी भी संयंत्र में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई है.
कुछ ही दिनों पहले फुकुशिमा हादसे की 11वीं वर्षगांठ थी और उसी दिन सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ सांसदों ने सरकार से कहा था कि सुरक्षा की चिंताओं की वजह से बंद पड़े हुए परमाणु संयंत्रों को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए.
खुद प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा भी इन संयंत्रों को दोबारा शुरू करना चाहते हैं, हालांकि लोगों का भरोसा अभी पूरी तरह से लौटा नहीं है. असाही अखबार ने फरवरी में एक सालाना सर्वे करवाया था जिसमें 47 प्रतिशत लोगों ने संयंत्रों को दोबारा शुरू करने का विरोध किया और 38 प्रतिशत ने समर्थन.
परमाणु ऊर्जा पर दुविधा
हालांकि, बीते सालों में प्रतिशत का यह फासला कम ही हुआ है. परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष तात्सुजीरो सुजुकी ने बताया कि अमेरिका और फ्रांस की कोशिशों के मुकाबले जनता के साथ कमजोर संवाद जापान के लिए समस्या बना हुआ है.

सुजुकी नागासाकी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. उन्होंने बताया, "उद्योग, नियामकों और स्थानीय जनता के बीच संवाद के अच्छे चैनल नहीं हैं." उन्होंने संवाद के तरीकों के लिए एक कानूनी योजना की मांग की है.
फुकुशिमा हादसे के बाद परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में इतनी कमी आई कि 2014 तक वो लगभग शून्य पर आ गई थी. लेकिन फिर उसका उपयोग बढ़ा और इस समय वो कुल ऊर्जा उत्पादन के तीन प्रतिशत के बराबर है. सरकार इसे 2030 तक 20-22 प्रतिशत तक पहुंचाना चाहती है.
सीके/एए (डीपीए, रॉयटर्स)
Source: DW












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