चंद्रयान-मंगलयान के बाद स्पेस में ISRO फिर रचेगा इतिहास, जानिए क्या है भारत का मिशन शुक्रयान, कब होगा लॉन्च?

Venus Misson of India: पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्र ग्रह पर भारत के पहले मिशन को मंजूरी दे दी है जिसे भारतीय स्पेस एजेंसी ISRO मार्च 2028 में लॉन्च करना चाहता है। 2013 में लॉन्च किए गए मार्स ऑर्बिटर मिशन के बाद यह देश का दूसरा अंतरग्रहीय मिशन है।

शुक्र ग्रह मिशन का मकसद ग्रह के चारों ओर की ऑर्बिट से उसका स्टडी करना है। यह मिशन शुक्र ग्रह की सतह और उप-सतह, इसके वायुमंडल, इसके आयनमंडल और सूर्य के साथ इसके संबंधों की जांच करने के लिए भारत और विदेश से वैज्ञानिक उपकरण ले जाएगा।

Venus Misson of India

शुक्र, जिसे अक्सर पृथ्वी का जुड़वां ग्रह कहा जाता है, वो अपने समान द्रव्यमान, घनत्व और आकार की वजह से वैज्ञानिकों के लिए ग्रहों के विकास में गहराई से जाने का एक अनूठा मौका प्रदान करता है, इसलिए शुक्र ग्रह को लेकर वैज्ञानिकों की हमेशा से दिलचस्पी रही है। हालांकि, पृथ्वी से अपनी समानताओं के बावजूद, शुक्र अपनी बहुत अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों की वजह से जाना जाता है।

शुक्र ग्रह की सतह का तापमान लगभग 462 डिग्री सेल्सियस है, जो बुध ग्रह से भी ज़्यादा गर्म है - जो सूर्य के सबसे नजदीकी ग्रह है। वैज्ञानिकों का मानना ​​है, कि यह ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र की सतह पर मौजूद पानी, सूर्य के ग्रह के नज़दीक होने के कारण वाष्पित हो गया। चूंकि जल वाष्प एक ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए इसने ग्रह को काफी ज्यादा गर्म कर रखा है।

काफी ज्यादा गर्म तापमान की वजह से शुक्र ग्रह पर कोई भी लैंडर दो घंटे से ज्यादा नहीं टिक पाया। वहीं, शुक्र पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की तुलना में बहुत ज़्यादा है। यह पृथ्वी पर महासागरों के नीचे महसूस किए जाने वाले दबाव के लगभग समान है।

शुक्र के वायुमंडल का 96.5% हिस्सा कार्बन डाइऑक्साइड से बना है और ग्रह पर सल्फ्यूरिक एसिड के बादल हैं।

शुक्र अपनी धुरी पर पृथ्वी की तुलना में बहुत धीरे घूमता है। शुक्र का एक चक्कर लगभग 243 पृथ्वी दिनों के बराबर होता है।

शुक्र ग्रह की स्टडी करना क्यों है महत्वपूर्ण?

पृथ्वी और शुक्र जब एक दूसरे के करीब आते हैं, तो किसी मिशन के लिए ये सबसे छोटा रास्ता प्रदान करता है और ऐसा हर 19 महीने में एक बार होता है। मिशन को पहले 2023 के लिए तय किया गया था, लेकिन हाल ही में कैबिनेट के मुताबिक, अब मंजूरी मार्च 2028 के लिए मिली है। मिशन लगभग 100 किलोग्राम वजन वाले वैज्ञानिक पेलोड ले जाएगा। यह भारत के अन्य अंतरिक्ष अन्वेषण मिशनों के समान योजना का पालन करेगा और सैटेलाइट, पृथ्वी की कक्षा में स्पीड हासिल करेगा शुक्र की ओर बढ़ेगा, और फिर इसकी कक्षा में कैद हो जाएगा। एक बार जब उपग्रह पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकल जाएगा, तो उसे शुक्र तक पहुंचने में करीब 140 दिन लगेंगे।

इस मिशन में भारत पहली बार एयरो-ब्रेकिंग भी करेगा।

एयरो-ब्रेकिंग क्या होता है?

ईंधन की समस्या को सुलझाने के लिए सैटेलाइट को शुक्र के चारों ओर 500 किमी x 60,000 किमी की अत्यधिक अण्डाकार कक्षा में रखा जाएगा। हालांकि, यह विज्ञान पेलोड के लिए प्रयोगों के संचालन के लिए बहुत ज्यादा है।

उपग्रह को एयरो-ब्रेकिंग की मदद से या तो 300 x 300 किमी या 200 x 600 किमी की कक्षा में लाया जाएगा और यहा पेलोड की जरूरतों के आधार पर निर्भर करेगा। यह सैटेलाइट को कई बार लगभग 140 किमी नीचे धकेलता हुआ देखेगा, जब यह अण्डाकार कक्षा में उस प्वाइंट पर पहुंचेगा, जहां यह शुक्र के सबसे करीब है। इस ऊंचाई पर, सैटेलाइट, शुक्र के वायुमंडल की बाहरी परत से होकर गुजरेगा, जो उपग्रह को धीमा करने वाला खिंचाव पैदा करेगा और इस तरह धीरे-धीरे कक्षा की ऊंचाई कम करेगा।

सैटेलाइट को वायुमंडल से कितनी ऊंचाई पर जाना है, इसका चयन बहुत सावधानी से करना होगा - यदि उपग्रह बहुत गहराई में चला जाता है, तो उसे अत्यधिक घर्षण का सामना करना पड़ सकता है और वह जल सकता है, लेकिन यदि यह बहुत उथला है, तो सैटेलाइट को तय कक्षा तक पहुंचने में बहुत लंबा समय लग सकता है। 2022 में शुक्र विज्ञान सम्मेलन के दौरान वैज्ञानिकों की चर्चा के अनुसार, उपग्रह को निश्चित कक्षा तक पहुंचने में लगभग छह महीने लगेंगे।

हालांकि, एक बार कक्षा में पहुंचने के बाद, सैटेलाइट, ग्रह के वायुमंडल से पूरी तरह से बाहर निकल जाएगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यदि उपग्रह को ड्रैग का अनुभव होता रहता है, तो उसे कक्षा को और कम होने से रोकने के लिए बहुत अधिक ईंधन का उपयोग करना होगा।

मिशन पर वैज्ञानिक पेलोड क्या होंगे?

संसद में दिए गए जवाब के मुताबिक, 2019 तक मिशन के लिए कम से कम 17 भारतीय प्रयोगों और सात अंतरराष्ट्रीय प्रयोगों के प्रस्तावों का चयन किया गया था। भारतीय पेलोड में एल और एस बैंड सिंथेटिक एपर्चर रडार शामिल हैं, जो ग्रह की सतह की इमेजिंग में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा, एक थर्मल कैमरा, अंतरग्रहीय धूल कणों के प्रवाह का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोग और शुक्र के वायुमंडल में प्रवेश करने वाले उच्च-ऊर्जा कणों का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोग भी होगा, जिससे इसका आयनीकरण होता है। एक अन्य पेलोड शुक्र के वायुमंडल की संरचना, परिवर्तनशीलता और थर्मल स्थिति का अध्ययन करेगा।

कौन से देश शुक्र ग्रह का अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं?

अतीत में संयुक्त राज्य अमेरिका, तत्कालीन USSR, जापान और जापान के साथ यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के एक सहयोगी मिशन द्वारा शुक्र ग्रह पर कई मिशन भेजे गए हैं। अमेरिका ने भविष्य में शुक्र ग्रह के लिए कम से कम दो और मिशनों की योजना बनाई है - 2029 में दा विंची और 2031 में वेरिटास - और ईएसए ने 2030 के लिए एनविजन मिशन की योजना बनाई है।

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