ISIS-K को कुचलने में नाकाम हुआ तालिबान, अफगानिस्तान में कर सकता है हमले तेज, अमेरिका को भी खतरा
आईएसआईएस-के का मकसद पूरी दुनिया में इस्लामिक शासन की स्थापना करनी है और ये एक बार फिर से इराक और सीरिया को अपना बेस कैंप बनाना चाहता है। लिहाजा, अब आशंका जताई जा रही है, कि ये अब जल्द अफगानिस्तान से बाहर आएगा।

Taliban vs ISIS-K in Afghanistan: अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में सत्ता में लौटने के बाद से, तालिबान ने इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत, जिसे आईएसआईएस-के भी कहा जाता है, उसे रोकने में बुरी तरह से नाकाम साबित हुआ है और अफगानिस्तान में लगातार हमले करने वाले इस्लामिक स्टेट समूह के सहयोगी संगठन को कंट्रोल करने में लगातार फेल नजर आया है। लिहाजा, अफगानिस्तान एक अशांत देश अभी भी बना हुआ है। अब, तालिबान के शीर्ष अधिकारियों की हत्याया हत्या की कोशिशों की एक ताजा लहर ने, पूरे अफगानिस्तान को दहलाकर रख दिया है। वहीं, ISIS-K की शक्ति में अब इस कदर इजाफा होने लगा है, कि आशंका इस बात को लेकर हैं, कि वो अब सिर्फ अफगानिस्तान तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि अब अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए भी खतरा बन गया है।

लगातार हमले कर रहा इस्लामिक स्टेट
9 मार्च 2023 को, इस्लामिक स्टेट समूह ने एक आत्मघाती बम विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी, जिसमें उत्तरी अफगानिस्तान में बल्ख प्रांत के तालिबान गवर्नर मोहम्मद दाऊद मुज़म्मिल समेत दो लोगों को उड़ा दिया गया था। 9 मार्च को हुए बम धमाके से ठीक पहले इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने अफगानिस्तान के पश्चिमी हेरात प्रांत में जल आपूर्ति विभाग के प्रमुख को निशाना बनाकर हमला किया, जिसमें उसकी जान चली गई और फिर अभी हाल ही में, 15 मार्च को, इस्लामिक स्टेट ने ISIS-K के पूर्व गढ़ नंगरहार के पूर्वी प्रांत में एक तालिबान जिला गवर्नर पर भी हमला किया, हालांकि ये हमला नाकाम रहा था। लेकिन, आईएसआईएस-के हार मानने का नाम नहीं ले रहा है और इसने तालिबान की नाक में दम कर दिया है।

फिर कैसे एक्टिव हुआ ISIS-K
आईएसआईएस-के इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या के आधार पर एक वैश्विक खिलाफत बनाने के इस्लामिक स्टेट के लक्ष्य को आगे बढ़ाना चाहता है। इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन का लक्ष्य पूरी दुनिया में इस्लामिक शासन की नींव रखना है। वहीं, ISIS-K पर सालों से नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है, कि 2015 में संगठन के अस्तित्व में आने के बाद से ही अफगानिस्तान में ISIS-K एक्टिव होने लगा था और हालिया हमलों की संख्या में आने वाले वक्त में तेजी से इजाफा होने वाला है। ISIS-K ने अफगान सरकार, सैन्य अधिकारियों, मीडिया प्रोफेशनल्स, धार्मिक नेताओं और अन्य आम नागरिकों को मारने के लिए ही बम धमाके किए हैं और दुर्भाग्य से, अफगानिस्तान में ऐसे ज्यादातर हमले कामयाब भी रहे हैं। पूर्व अफगान सरकार के पतन और अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद, ISIS-K ने काबुल एयरपोर्ट पर भीषण बम धमाके किए थे, जिसमें 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें 13 लोग अमेरिकी सेवा सदस्य थे। वहीं, पिछले साल भी ISIS-K ने राजधानी काबुल में शिया मुसलमानों की मस्जिक में बम धमाके कर कई सौ लोगों की जान ले ली।

तालिबान-ISIS-K में क्या है मतभेद?
तालिबान और ISIS-K, दोनों के इस्लामी संगठन होने के बावजूद, दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है और अब तालिबान, जो एक शांति अफगानिस्तान पर शासन करना चाहता है, वहीं ISIS-K तालिबान की इस कोशिश को खत्म करना चाहता है और अफगानिस्तान से शिया मुसलमानों को भी खदेड़ना चाहता है। ISIS-K के गठन के बाद से ही तालिबान के साथ लगातार इसका संघर्ष चला है और ISIS-K ने ज्यादातर मौकों पर तालिबान के कई बड़े नेताओं की हत्या कर दी है। वहीं, हाल की हत्याएं इस आतंकी समूह की हमले की प्राथमिकताओं का एक सिलसिला मात्र हैं। तालिबान की कोशिश अफगानिस्तान में निवेश को लाने की है, जबकि ISIS-K तालिबान की कामयाबी की दिशा में बहुत बड़ी दीवार है।

ISIS-K लोगों की हत्याएं क्यों करता है?
लोगो की हत्याएं करना, आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट समूह के विद्रोह सिद्धांत का एक मूलभूत स्तंभ हैं, जिसे इसके सहयोगी आतंकी संगठनों ने भी अपनाया है और हत्याएं करना इसकी कई उद्देश्यों को पूरा करता है। सबसे पहला उद्येश्य तो ये, कि तालिबान जितने ISIS-K के आतंकियों को मारता है, उससे ज्यादा लोगों को मारकर ISIS-K उसका बदला लेता है, और इसी के तहत ISIS-K ने जनवरी और फरवरी में तालिबान के कुछ प्रमुख नेताओं की बम धमाकों में हत्या कर दी। वहीं, ISIS-K ने हिंसक गतिविधियों को बढ़ाने की भी धमकी दी है। वहीं, ISIS-K का मानना है, कि वो जितनी हत्याएं करेगा, वो अफगानिस्तान से विदेशी प्रभाव को उतना दूर रख सकता है, जैसे की चीन, जो अफगानिस्तान में निवेश करना चाहता है, लेकिन हिंसक घटनाओं की वजह से निवेश करने से कतराता है। इसके साथ ही, ISIS-K उन नेताओं को खास तौर पर निशाना बनाता है, जिसके संबंध विदेशों से हैं। बल्ख प्रांत के तालिबान गवर्नर मोहम्मद दाऊद मुजम्मिल की हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए ISIS-K ने कहा था, कि ये हमला इसलिए किया गया था, क्योंकि मुजम्मिल के संबंध ईरान से थे।

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अमेरिका को क्यों है खतरा?
आईएसआईएस-के का मकसद इस्लामिक शासन का निर्माण करना है और इसके लिए उसे एक बार फिर से इराक और सीरिया में पांव जमाना है, ताकि इन जगहों पर खिलाफत मॉडल की स्थापना कर सके और ISIS-K का ये मकसद कई कारकों पर निर्भर करता है। आईएसआईएस-के की सबसे बड़ी खासियत इसकी दूसरे आतंकी संगठनों से साझेदारी है और दूसरे आतंकी संगठनों के साथ मिलकर ये बम धमाकों को अंजाम देता है। वहीं, ISIS-K का मानना है, कि तालिबान अमेरिका, चीन, ईरान और तुर्की के साथ साथ काफिर देशों से मदद चाहता है और इसके लिए तालिबान इस्लाम के साथ समझौता कर रहा है, और उसकी ये सोच उसे तालिबान से अलग करता है। लिहाजा, ISIS-K का अफगानिस्तान में मजबूत होना, अमेरिका और पश्चिमी देशों के हितों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। फरवरी 2023 की अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने ISIS-K की पश्चिम पर हमला करने की महत्वाकांक्षा के बारे में चेतावनी दी थी। वहीं, 16 मार्च को, US CENTCOM के कमांडर जनरल माइकल कुरिल्ला ने चेतावनी दी है, कि ISIS-K अगले 6 महीने से भी कम समय में अफगानिस्तान के बाहर अमेरिकी और पश्चिमी ठिकानों पर हमला करने में सक्षम होगा। लिहाजा, तमाम पश्चिनी देशों को सतर्क रहने की जरूरत है, खासकर तालिबान के लिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में तालिबान के लिए भी भारी मुश्किलें पैदा होंगी।












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