G7 Summit को टक्कर देने की कोशिश है चीन-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन? जानें शी जिनपिंग की चाल
G7 Summit:जब दुनिया के सात अमीर और लोकतांत्रिक देश जापान में जी 7 सम्मेलन के लिए जुटने वाले थे, उससे एक दिन पहले चीन-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन आयोजित होना सामान्य नहीं है। यह जिनपिंग की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

चीन के उत्तर पश्चिमी शहर शीआन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मध्य एशिया के पांच देशों के साथ पहली बार एक खास सम्मेलन आयोजित किया है, जिसको लेकर चर्चा इसलिए ज्यादा हो रही है कि यह विश्व के सात अमीर देशों के जी-7 सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले शुरू हुआ।

चीन-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन में शामिल देश
चीन के साथ सम्मेलन में शामिल हुए मध्य एशिया के पांच देश हैं- कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान। शी जिनपिंग की ये पहल कई नजरिए से महत्वपूर्ण है। यह सारे मध्य-एशियाई देश रूस के पिछले इलाके में हैं, जो अभी यूक्रेन से युद्ध में उलझा है। ये सारे देश पहले सोवियत यूनियन का ही हिस्सा थे।

जी-7 देशों का वैश्विक अर्थव्यस्था में योगदान कम हुआ है
उधर जी7 में शामिल दुनिया के सात प्रभावशाली देश कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी तनाव में है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनका योगदान कम हुआ है। दूसरी तरफ चीन पांचों मध्य-एशियाई देशों के साथ अपनी आर्थिक, सुरक्षा और राजनयिक संबंधों को बेहतर करना चाहता है, जो खुद उसकी अर्थव्यवस्था और घरेलू आवश्यकताओं के लिए बहुत अहम है।

दोनों सम्मेलनों का एजेंडा
पांचों मध्य-एशिया देशों को मौजूदा हालात में मास्को का विकल्प खोजना पड़ रहा है और चीन उसी का लाभ लेने की कोशिश में है। जबकि, जी 7 के सदस्य देशों का, जो कि पश्चिम के लोकतांत्रिक देश हैं, उनके सामने 19 से 21 मई के सम्मेलन में विभिन्न मोर्चे पर चीन के बढ़ते कद के मुकाबले के लिए विकल्प की तलाश मुख्य एजेंडा रहने वाला है।

नई विश्व व्यवस्था के लिए विकल्प देने की कोशिश में चीन!
रॉयटर्स के मुताबिक बिश्केक में ओएससीई एकैडमी की रिसर्च फेलो एडिना मसलबेकोवा ने कहा है, 'वैश्विक व्यवस्था में बीजिंग एक नए विकल्प को पेश करना चाहता है और मध्य एशिया क्षेत्र को इसपर राजी करना चाहता है कि नई विश्व व्यवस्था उनके लिए भी बेहतर है।'

सम्मेलन को सिल्क रूट की भावना से जोड़ने की कोशिश
चीन की पहल पर पिछले साल इस सम्मेलन की शुरुआत हुई थी, लेकिन तब कोविड महामारी की वजह से ऑनलाइन ही बैठक हुई थी। खासकर इस सम्मेलन के लिए शीआन को इसलिए चुना गया है कि वह उस प्राचीन सिल्क रूट का प्रतिनिधित्व करता है, जो खास व्यापार के मकसद से मध्य एशिया तक जाता था।

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चीन की चाल क्या है?
चीन की चाल को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। वह दुनिया पर अमेरिकी प्रभुत्व की जगह अपनी छाप छोड़ना चाहता है। चीन ने शीआन में इस सम्मेलन के प्रचार-प्रसार का कोई मौका नही छोड़ा है। यहां गौर करने वाली बात है कि इन मध्य एशियाई देशों में कुछ के रिश्ते मास्को से उतने अच्छे नहीं हैं।

मध्य एशिया से चीन के व्यापार में भारी बढ़ोतरी
वैसे चीन का इन पांचों देशों के साथ राजनयिक संबंध तभी से बन चुका है, जब ये सोवियत यूनियन से बाहर हुए थे। इन देशों का चीन के साथ व्यापार इन तीन दशकों में सैकड़ों गुना बढ़ चुका है। 2022 में चीन और इन पाचों देशों के बीच निवेश 70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड पर पहुंच गया था।
चीन अपनी सुरक्षा के लिए भी कर रहा है पहल
चीन की सरकारी मीडिया इस क्षेत्र को चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के लिए भी महत्वपूर्ण बता रहा है। 2013 में जिनपिंग ने इस विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर पॉलिसी की घोषणा कजाकिस्तान दौरे पर ही की थी। विश्लेषकों का मानना है कि इस आर्थिक साझेदारी से चीन को यह भी फायदा है कि उसके लिए यह इलाका सुरक्षित रहेगा।
शिंजिआंग प्रांत को लेकर भी चिंतित रहते हैं जिनपिंग
क्योंकि, पांच में से तीन मध्य एशियाई देश चीन के पश्चिमी शिंजिआंग प्रांत की सीमा से सटते हैं, जो इलाका उइगर मुसलमानों के साथ मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर चीन को दुनिया की नजरों में चढ़ाए रखता है। अफगानिस्तान की सत्ता तालिबान के हाथों में आने के बाद मुस्लिम आतंकवादियों को पालने-पोसने वाले चीन को भी पता है कि उसके लिए यह इस्लामी आतंकी कभी भी नासूर बन सकते हैं।
चीन के एजेंडे में है उसका अपना 'लक्ष्य'
एक बात और है कि रूस प्रतिबंधों से परेशान है, इसकी वजह से भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नजरिए से मध्य एशिया की अहमियत बढ़ी है। एटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल चाइना हब की नॉनरेसिडेंट फेलो निवा याउ का कहना है कि बीजिंग अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए 'क्षेत्रीय एकता' तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
जी7 की कमजोरी का फायदा उठाने के चक्कर में चीन?
दूनिया के दूसरे सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता होने के चलते चीन ने मध्य एशिया के प्राकृतिक गैस के भंडार तक पहुंच बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर लगा रखे हैं। यही नहीं चीन मध्य एशिया को यूरोप तक अपना कारोबार बढ़ाने के लिए एक ट्रांजिट की तरह भी इस्तेमाल करना चाह रहा है। इस तरह से चीन मध्य एशिया को साध कर क्षेत्र में अपना वर्चस्व तो कायम रखना चाहता है ही, जी-7 की कमजोर होती शक्ति का फायदा अपने हक में उठाने के फेर में भी लग चुका है।












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