11 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा अक्षय ऊर्जा में निवेश

बेंगलुरु। जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियां अब सजग हो गई हैं। साथ ही बढ़ते तापमान का असर पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। कहीं जरूरत से अधिक बारिश तो कहीं सूखा। इसी के चलते तमाम कंपनियों ने अब प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिये प्रतिबद्ध कंपनियों ने कोयला, तेल, लकड़ी जैसे जीवाश्‍म ईंधन का उपयोग कर रही कम्‍पनियों में निवेश बंद करके अक्षय ऊर्जा में पैसा लगाना शुरू कर दिया है। यह मुहिम पूरी दुनिया में तेज़ी से आगे बढ़ रही है, जिसके चलते अक्षय ऊर्जा में निवेश का आंकड़ा 11 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया है।

Renewable Energy

केपटाउन में एक नयी रिपोर्ट '$11T and counting: new goals for a fossil-free world.' (11 ट्रिलियन डॉलर और सिलसिला जारी : जीवाश्‍म ईंधन मुक्‍त दुनिया के लिये नये लक्ष्‍य) जारी की गई। इस रिपोर्ट में उन संकल्पों को दर्शाया गया है, जो कंपनियों ने अक्षय ऊर्जा के लिये लिये। खास बात यह है कि शुरुआत के दो वर्षों में इस दिशा में दो ट्रिलियन डॉलर निवेश हुआ, जबकि अगले छह महीने में उतनी ही राशि का निवेश हुआ और इसी तरह तेज़ गति से बढ़ता निवेश 11 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

कोयले के धुएं से छुटकारा दिलाने का संकल्प

वर्ष 2014 में जहां 52 अरब डॉलर की संपत्ति को जीवाश्म ईंधन के चंगुल से छुड़ाने का संकल्प किया गया था, वहीं आज यह 11 ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा हो गया है यह 22000 प्रतिशत की बेहद चौंकाने वाली बढ़ोत्तरी है। दुनिया के 1110 से ज्यादा संगठनों ने कोयला, तेल और गैस उद्योगों को ब्लैक लिस्ट करने की नीति पर हामी भरी है। इनमें वेल्थ फंड बैंक, ग्लोबल असेट मैनेजर, बीमा कंपनियां, पेंशन फंड, स्वास्थ्य संगठन, विश्वविद्यालय, धार्मिक समुदाय और फाउंडेशन शामिल हैं।

इसके अलावा नॉर्वे का संप्रभु वेल्थ फंड, फिलीपींस की कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस, रॉकफेलर ब्रदर्स फंड, ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन, अमुंडी असेट मैनेजमेंट, केस दि डेपोज (फ्रांस का सार्वजनिक वित्तीय संस्थान), न्यूयॉर्क सिटी, केप टाउन सिटी, केएफडब्ल्यू ग्रुप (जर्मनी का डेवलपमेंट बैंक) स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी ब्रिटेन स्थित स्टेट म्यूजियम और आलियांज इंश्योरेंस और एडिनबर्ग स्थित दुनिया का पहला कैथ्रेडल सेंट मेरिज एपिस्कोपल कैथ्रेडल भी इस कतार में शामिल हैं।

केपटाउन में शुरू हो रहा शिखर सम्मेलन

यह संयोग की बात है कि यह रिपोर्ट ऐसे वक्‍त जारी हुई, जब‍ केप टाउन में वैश्विक विनिवेश-निवेश शिखर सम्‍मेलन 'फिनांसिंग द फ्यूचर' Financing the Future की शुरुआत हुई है। 44 देशों के 300 से ज्‍यादा प्रतिनिधि इस सम्‍मेलन में हिस्सा लेंगे। इस सम्‍मेलन में यह चर्चा की जायेग‍ी कि किस तरह से पूरी दुनिया को जीवाश्‍म ईंधन से बाहर निकालकर 100 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा का भविष्‍य बनाया जाये।

हर घर में होगी बिजली

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सभी देश इस संकल्‍प को पूरा करने में कामयाब हो गये, तो भारत समेत सभी देशों में बिजली से वंचित 85 करोड़ लोगों के घरों में रोशनी पहुंचेगी। यानी हर घर रौशन होगा। एमनेस्‍टी इंटरनेशनल के महासचिव कुमी नायडू ने इस कांफ्रेंस की शुरुआत में कहा ''जलवायु से जुड़े इंसाफ की लड़ाई हमारे मूलभूत मानवाधिकारों के लिये संघर्ष भी है। हर वह व्यक्ति जो भयंकर सूखे, अधिक जोरदार तूफान या प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है उसके प्रति जीवाश्म ईंधन कंपनियों ने नाइंसाफी की है। उन लोगों की सेहत पानी भोजन आवास और यहां तक कि उनकी जिंदगी के अधिकार को भी नुकसान पहुंचा है। यही वजह है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जीवाश्म ईंधन बनाने वाली कंपनियों की मुखालिफत करने का फैसला किया है। इससे यह तय होगा कि मानवाधिकार और सभी को अक्षय ऊर्जा उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य इस शिखर बैठक में चर्चा के केंद्र में रहे।"

शिखर सम्मेलन में धार्मिक समूह भी

धार्मिक समुदायों का लंबे समय से चला आ रहा नेतृत्व भी डाइवेस्‍ट-इन्‍वेस्‍ट के इस आंदोलन और इस शिखर सम्मेलन का एक मुख्य बिंदु है। आज विभिन्न धर्मों से जुड़े 22 और संगठनों ने जीवाश्म ईंधन से अपना नाता तोड़ने की घोषणा की और पूरी दुनिया में खराब ऊर्जा को छोड़ने वाले 170 से ज्यादा धार्मिक संगठनों की जमात में शामिल हो गए। ग्लोबल कैथोलिक क्लाइमेट मूवमेंट के अधिशासी निदेशक टॉमस इनछुआ ने कहा कि दुनिया में करोड़ों लोग बढ़ती भूख बीमारी और तपती धरती के कारण पैदा होने वाले विभिन्न टकरावों का सामना कर रहे हैं और धार्मिक संगठन इस संकट के कारण पैदा हुए तकाजों के बारे में अपनी राय साफ तौर पर रख रहे हैं। हम जीवाश्म ईंधन का विरोध कर यह साबित कर रहे हैं कि प्रेम के ऊपर लालच की जीत कभी नहीं होगी।

जहां मिशन आधारित निवेशक जैसे कि फेथ ग्रुप्स, फाउंडेशन स्कूल और स्वास्थ्य से जुड़े संगठन डाइवेस्‍ट-इन्‍वेस्‍ट के अपने संकल्पों पर कायम हैं वही, संस्थागत निवेशक भी बड़े पैमाने पर इस प्रतिज्ञा के भागीदार बन रहे हैं। इनमें वैश्विक असेट मैनेजर, संप्रभु वेल्थ फंड, बीमा कंपनियां और पब्लिक पेंशन फंड भी शामिल हैं। जीवाश्म ईंधन बनाने वाली कंपनियों से विनिवेश का आह्वान कभी खालिस नैतिक स्तर पर हुआ करता था मगर अब इसे जलवायु परिवर्तन संबंधी जोखिम की समझदारी भरी एकमात्र प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है। जीवाश्म ईंधन संबंधी उद्योग पिछले करीब एक दशक से बाजार में पिछड़ रहे हैं और वर्ष 2018 की एस एण्‍ड पी रैंकिंग में सबसे निचली पायदान पर रहे। यह क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है और यह जल्द खत्म होने और रूपांतरण से संबंधित कई जोखिम का सामना कर रहा है। नतीजतन, यह निवेशकों के लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

फिनांसिग द फ्यूचर के आयोजकों में शामिल डाईवेस्ट-इनवेस्ट की निदेशक क्लेरा वोंडरिच ने कहा कि संस्थागत निवेशकों के पास भविष्य को बनाने और बिगाड़ने की ताकत होती है। जीवाश्म ईंधन से मोहभंग होने का अभियान जोर पकड़ रहा है, ऐसे में हम जीवाश्म ईंधन कंपनियों में निवेश को हर क्षेत्र और हर महाद्वीप में खिसकते हुए देख रहे हैं। कोयला, तेल और गैस को एक जहरीले स्रोत के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा न सिर्फ जलवायु परिवर्तन के लिहाज से नैतिक जिम्मेदारी के तौर पर बल्कि वित्तीय तकाजे के तौर पर भी देखा जा रहा है। हम शेयर धारक समुदाय का आह्वान करते हैं कि वह जीवाश्म ईंधन उद्योग से साफ तौर पर कहे कि वह या तो अपना सुनिश्चित फेज आउट प्लान पेश करें या फिर विनिवेश का सामना करने के लिए तैयार रहे।

350.org के डाइवेस्टमेंट कंपेनर अहमद मोकगोपो ने कहा "यह बढ़ता संख्या बल इस बात की निशानी है कि लोगों की शक्ति जीत रही है। अगर हजारों स्थानीय समूहों ने अपने प्रतिनिधियों पर जीवाश्म ईंधन के प्रति अपना समर्थन वापस लेने के लिए दबाव न डाला होता तो हम ऐसी इंधन कंपनियों से डाइवेस्‍टमेंट के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाते। दुनिया के इस दक्षिणी हिस्से में हो रही अपनी तरह की इस पहली समिट में साथ काम करके हम वित्तीय संस्थानों द्वारा तैयार किए गए विकल्पों में से जरूरी विकल्प को चुनने के रास्तों की पहचान करने के साथ-साथ संसाधनों की अदला बदली करेंगे, जिससे पूंजी को जलवायु संबंधी लक्ष्यों के हिसाब से इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी।"

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