Women's Day: संविधान ने भारतीय महिलाओं को दी बेजोड़ 'ताकत', जानिए प्रमुख अधिकार
भारतीय संविधान में महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और न्याय समेत सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए वो अधिकार दिए गए हैं, जो उन्हें दुनिया के अन्य कई देशों की महिलाओं की तुलना में अधिक सशक्त बनाते हैं।

International women's day 2023: 21वीं सदी के दौर में चीजें काफी कुछ बदल चुकी हैं। लेकिन महिलाओं के अधिकारों को लेकर आज भी कई देश अपवाद बने हैं। जहां लिंग के आधार पर भेदभाव और उनके अधिकारों में समानता नहीं है। लेकिन दुनिया के तमाम देशों को भारत इस मायने में काफी पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा है। हालांकि अक्सर महिलाओं के विकास की राह में बाधा की बात की जाती रही है, लेकिन संविधान में दिए गए इन्हीं अधिकारों की ताकत के बल पर आज महिलाएं देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। संविधान में भारतीय महिलाओं के कई ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिनका जानना महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि समाज के हर व्यक्ति को जानना जरूरी है। आइए जानते हैं वो कौन से अधिकार हैं, जिन्होंने महिलाओं को पुरूषों के बराबर समानता नहीं बल्कि आगे बढ़ने का मौका दिया?
भेदभाव से महिलाओं की जंग
भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों और भूमिकाओं का कोई तोड़ नहीं है। देश में महारानी लक्ष्मीबाई जैसी कई वीरांगनाएं हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना लहू बहाया। आज हम उन्हें बड़े गर्व से याद करते हैं, लेकिन देश में अब भी महिलाओं के नाम पर भेदभाव का व्यवहार किया जाता है। हालांकि देश के संविधान में इस तरह के मामले दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं। देश कई राज्यों में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां इस तरह के मामले आते हैं, वहीं सरकारी तंत्र और सामाजिक संगठन इसे खत्म करने कार्य कर रहे हैं। लिंग भेद को पूरी तरह से खत्म करने की जंग अंतिम दौर में चल रही है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का उद्देश्य
दुनिया में हर वर्ष 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य महिलाओं के प्रति समानता के अधिकाओं को लेकर भेदभाव, अत्याचार और उन्हें न्याय दिलाने के लिए जागरूकता लाना है। भारतीय संविधान में इसे महिलाओं के लिए कानूनों और अधिकारों में समानता को लेकर जागरूता लाने हर स्तर पर प्रसारित किया जाता है। कानून में कई महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं, जिन्हें सिर्फ महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए संविधान में जगह दी गई है। इन सभी अधिकारों से महिलाओं को भलीभांति परिचित होना जरूरी होता है, जिसे वे अपने न्याय लिए लड़ सकें।
मुफ्त कानूनी सहायता
भारतीय संविधान यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार देता है। जिसके तहत पीड़ित महिलाओं को किसी भी अदालत, न्यायाधिकरण या न्यायिक प्राधिकरण के समक्ष किसी मामले या कानूनी कार्यवाही के संचालन के लिए एक वकील को नियुक्त किया जाता है। ये वकील मुफ्त में पीड़िता को कानूनी सलाह देता है। दरअसल, कानूनी सहायता से तात्पर्य वंचितों और महिलाओं को कानूनी सेवाएं प्रदान करने से है।
मातृत्व लाभ अधिनियम
महिलाओं की प्रेग्नेंसी पूरी होने बाद बच्चे के पालन पोषण के लिए वक्त मिलता है। मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद 6 महीने की तक छुट्टी लेने का अधिकार है। इस दौरान ये सुनिश्चित किया गया है कि महिला का वेतन प्रभावित ना हो। मातृत्व लाभ एक्ट के तहत महिलाओं को प्रसव से पहले और बाद में स्वास्थ्य लाभ को लेकर अवकाश देने से अगर कोई भी संस्था इनकार करती है तो उस पर कानूनी एक्शन लिया जा सकता है।
निजता का अधिकार
महिलाओं पर अत्याचार जैसे मामलों में उनकी पहचान को सार्वजनिक होने से रोकने के लिए संविधान में ये प्रावधान किया किया गया है। रेप या फिर यौन उत्पीड़न मामले में पीड़ितों को गुमनाम रखने का अधिकार है। महिलाओं के मामले में महिला पुलिस अधिकारी या कांस्टेबल के सामने अपने बयान दर्ज कराने का भी अधिकार है। मामले में पीड़िता का नाम, पहचान, पता, या फिर तस्वीर मीडिया या फिर किसी अन्य माध्यम से सार्वजनिक करने का अधिकार नहीं है।
रात में गिरफ्तारी नहीं
किसी आरोपी महिला को सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को कोर्ट से अनुमति लेनी जरूरी है। भारतीय संविधान में 1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) की धारा 46 की उपधारा (4) के तहत किसी महिला को सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले गिरफ्तार करने के लिए अदालत से स्पेशल अथॉरिटी लेनी होती है।
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