भारत का ग्लोबल पावर की तरह बर्ताव, मोदी-बाइडेन की मीटिंग.. तो इस मजबूरी में जी20 से भागे हैं चीनी राष्ट्रपति?
G20 Summit Xi Jining: आखिरकार ये तय हो गया है, कि शी जिनपिंग इस हफ्ते नई दिल्ली में होने वाली जी20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले रहे हैं और उनकी जगह पर चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग दिल्ली आने वाले हैं।
दो दिन पहले, समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बताया था, कि भारत के एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने पुष्टि की थी, कि "हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री, शी जिनपिंग की जगह आएंगे"

चीन में, दो विदेशी राजनयिकों और एक अन्य G20 देश के एक सरकारी अधिकारी ने कहा, कि शी जिनपिंग संभवतः शिखर सम्मेलन के लिए यात्रा नहीं करेंगे। उनमें से दो अधिकारियों ने कहा, कि उन्हें चीन के आधिकारिक सूत्रों ने इस बारे में सूचित किया है, लेकिन उन्हें शी की अनुपस्थिति के पीछे की कोई वजह नहीं बताई गई है।
हालांकि, भारतीय स्रोतों ने घटना का सामान्यीकरण करके, शी जिनपिंग की अनुपस्थिति के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया है। सूत्रों में से एक ने पीटीआई के हवाले से कहा, कि "आज की दुनिया में नेताओं की समय की इतनी अधिक मांग है, कि हर नेता के लिए हर शिखर सम्मेलन में भाग लेना हमेशा संभव नहीं होता है।"
मोदी के डर से कितना भागेंगे शी जिनपिंग?
हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने इस संदर्भ में दो घटनाक्रमों पर बात नहीं की। पहला यह, कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते जकार्ता में आसियान (दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के संघ) और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भी शामिल नहीं होंगे, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व्यक्तिगत रूप से भाग ले रहे हैं। यानि, जहां जहां प्रधानमंत्री मोदी जाएंगे, उस उस मंच से शी जिनपिंग भागते नजर आएंगे।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले तक शी जिनपिंग का भारत आना तय था, मगर ब्रिक्स के बाद अचानक परिस्थितियां बदली हैं।
जी20 की अपार व्यस्तताओं और कई द्विपक्षीय बैठकों के बीच भी पीएम मोदी ने आसियान में शामिल होने का वक्त निकाला है, जो बताता है, कि रणनीतिक तौर पर भारत, दक्षिण चीन सागर में कितना आक्रामक होना चाहता है।
वहीं, दूसरी बात ये, कि शी जिनपिंग के अलावा, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पहले ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होने के अपने फैसले से फोन पर अवगत करा चुके हैं, क्योंकि उन्हें यूक्रेन में "विशेष सैन्य अभियान" पर ध्यान केंद्रित करना है।
रूस (और चीन को भी) को ब्रिक्स प्रस्ताव के दो पैराग्राफों पर आपत्ति थी, जिसमें यूक्रेन युद्ध के लिए रूस पर आरोप लगाए गए थे। अब चीन ने साफ कर दिया है, कि अगर यूक्रेनी युद्ध पर रूसी रुख को जगह नहीं दी गई तो वह जी20 के प्रस्ताव पर उचित विचार नहीं करेगा।
इस बीच, व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता का कहना है, कि राष्ट्रपति बाइडेन को उम्मीद है, कि शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। लेकिन, जब काफी हद तक चीजें आधिकारिक हो गईं, कि शी जिनपिंग भारत नहीं जाएंगे, तो बाइडेन ने इसे 'निराशाजनक' स्थिति करार दिया।

ब्रिक्स के दौरान और बाद में क्या बदला है?
पहले जी20, फिर आसियान और फिर पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भी शामिल नहीं होना बताता है, कि स्थिति में असल में जो दिख रही है, उससे कहीं ज्यादा गंभीर है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग (22-24 अगस्त) में ब्रिक्स बैठक के मौके पर, शी जिनपिंग और पीएम मोदी के बीच हुई दुर्लभ बैठक में, बताया जाता है कि मोदी ने शी से दो टूक कहा था, कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को हल करने की जरूरत है। बिना समय बर्बाद किये केवल संवाद के माध्यम से।
ध्यान देने वाली बात यह है, कि दक्षिण अफ्रीका से लौटने के तुरंत बाद बीजिंग ने एक सीक्रेट नक्शा भी जारी कर दिया, जिसमें भारत के अरुणाचल और पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों को चीनी क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है।
यानि, चीन चाहता था, भारत इसपर कड़ी प्रतिक्रिया दे और भारत ने सख्त प्रतिक्रिया भी दी।
भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और दिलचस्प बात यह है, कि पहली बार अमेरिका और कई अन्य देशों ने चीन की हठधर्मिता पर नाराजगी व्यक्त की। बीजिंग की बेपरवाह प्रतिक्रिया कि भारत को मानचित्र विवाद की अधिक व्याख्या नहीं करनी चाहिए, ऐसा कहकर चीन ने दुनिया भर को आश्वस्त कर दिया है, कि चीन ताइवान की तरह, हिमालयी सीमा रेखा में तलवार चलाने की नीति का आदी हो गया है।
शी जिनपिंग की अनुपस्थिति, शिखर सम्मेलन में भाग लेने से इनकार करके भारत को नीचा दिखाने की कोशिश से कहीं अधिक गहरी है।

न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (एएसपीआई) में साउथ एशिया इनिशिएटिव्स की निदेशक फरवा आमेर ने इस विषय पर उपयुक्त टिप्पणी करते हुए लिखा है, कि "शी जिनपिंग के शिखर सम्मेलन में भाग न लेने को चीन द्वारा भारत, को केंद्रीय मंच सौंपने के अनिच्छुक होने के रूप में पढ़ा जा सकता है।"
हमें यह याद रखने की जरूरत है कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने अफ्रीकी संघ की आवाज को जी20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उचित स्थान देने की पुरजोर वकालत की थी। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने भारत के लिए ग्लोबल साउथ का मुखपत्र बनने की जगह बना ली है।
शी जिनपिंग इसी बात से घबरा रहे हैं। पूरी दुनिया में आर्टिकिल लिखे जा रहे हैं, कि जी20 के जरिए भारत ने ग्लोबल साउथ में सुपर पावर बनने के लिए अपने कदम बढ़ा दिए हैं।

भारत को नहीं देखना चाहते ग्लोबल पावर
23 अगस्त को इसरो ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान को कामयाबी के साथ उतारकर अंतरिक्ष सेक्टर में भारत की धाक मजबूत कर दी है।
इसके अलावा, 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ती भारत की जीडीपी, भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति का दर्जा दिलाने की महत्वाकांझा, पश्चिम एशियाई, अफ़्रीकी और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भारत के सॉफ्ट पावर का असीमित होता विस्तार... ये सब फैक्टर्स मिलाकर चीन के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं, यह चीन की आधिपत्यवादी कार्यशैली के लिए चुनौती है, खासकर तब, जब चीन का रिसर्च एंड डेवलपमेंट अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ठप होने के करीब पहुंच गया है और चीन की अर्थव्यवस्था गंभीर मंदी का सामना कर रही है।
लिहाजा, शी जिनपिंग के लिए यह जानना असहनीय हो गया था, कि राष्ट्रपति बाइडेन जी20 शिखर सम्मेलन से एक दिन पहले मेजबान पीएम मोदी के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए नई दिल्ली की यात्रा कर रहे हैं।
यानि, इस पूरे वाकये को इस बैकग्राउंड में भी भी देखा जाना चाहिए, चीन किस तरह का प्रेशर महसूस कर रहा है और शी जिनपिंग के लिए जी20 समेत हर वो मंच जटिल बन गया है, जहां भारत के प्रतिनिधि रहेंगे।
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