अमेरिका के चाहने पर भी भारत NATO प्लस में क्यों नहीं ले रहा दिलचस्पी? जानिए वजह
अमेरिका ने चीनी पर नकेल कसने के लिए 'नाटो प्लस' बनाया है। अमेरिका चाहता है कि भारत नाटो प्लस में शामिल हो। चीन पर बनी अमेरिकी संसद की शक्तिशाली समिति ने सिफारिश की है कि भारत को भी नाटो प्लस का हिस्सा बनाया जाए।

पीएम मोदी अगले महीने अमेरिका के दौरे पर जाने वाले हैं। इस बीच अमेरिका में कांग्रेस की सेलेक्ट कमेटी ने भारत को 'नाटो प्लस' का दर्जा देने की सिफारिश की है। नाटो प्लस में अभी पांच देश हैं। यदि भारत इसका हिस्सा बनता है तो वह इसका छठा सदस्य होगा।
आपको बता दें कि नाटो प्लस एक सुरक्षा व्यवस्था है, जो वैश्विक रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। यदि भारत नाटो प्लस का हिस्सा बनता है तो उसे अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी की बेहतर उपलब्धता मिलेगी।
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका में भारत को नाटो प्लस का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहे हैं। दरअसल अमेरिका में लंबे वक्त से एक लॉबी चाहती है कि भारत नाटो प्लस में शामिल हो जाए।
यदि भारत इस ग्रुप का हिस्सा बनता है तो वह रूस और उसके हथियार नेटवर्क से दूर हो जाएगा। भारत उन्नत हथियारों की पूर्ति के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर निर्भर हो जाएगा।
आपको बता दें कि यूएस इंडिया सिक्योरिटी काउंसिल जैसे थिंकटैंक और रमेश कपूर जैसे भारतीय मूल के डेमोक्रेट समर्थक व डोनर इसके लिए लॉबिंग करते रहे हैं। अमेरिकी सांसद रो खन्ना तो 3 सालों से भारत को नाटो प्लस का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
इसके लिए अमेरिका की प्रतिनिधि सभा ने 14 जुलाई 2022 को नेशनल डिफेंस अथाराइजेशन एक्ट (एनडीएए) में संशोधन संबंधी प्रस्ताव को भारी बहुमत से पारित किया था।
नाटो प्लस में शामिल देश ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इजरायल, जापान या फिर दक्षिण कोरिया सभी अमेरिकी गुट का हिस्सा हैं। इन देशों के साथ अमेरिका के सामरिक संबंध हैं।
जबकि भारत किसी गुट या घोषित खेमेबंदी में शामिल होने से परहेज करता रहा है। भारत में किसी भी पार्टी की सरकार हो वह स्वतंत्र विदेशनीति की बात को दोहराते रहे हैं।
फिलहाल भारत और रूस के बीच S 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की डील है। यदि भारत, नाटो प्लस का हिस्सा बनता है तो रूस और भारत के रक्षा संबंधों पर असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि भारत नाटो या फिर नाटो प्लस का हिस्सा बनने से कतराता रहा है। भारत जानता है कि यदि वह इसका हिस्सा बनता है तो भारत को फायदे के साथ नुकसान भी होंगे। चीन मोर्चे पर तो उसे फायदा होगा मगर रूस के साथ उसे संबंध खराब हो जाएंगे।
शीतयुद्ध के दौर में भी भारत ने तटस्थ रहना चुना था। भारत स्वंय तीसरी दुनिया के देश की छवि से बाहर निकल वैश्विक रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरा जोर लगा रहा है।
भारत के लिए उसके अपने हित सर्वोपरि हैं। यही वजह है कि वह WTO का भी हिस्सा है और वह SCO का भी सदस्य है और क्वाड में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।












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