Israel-Hamas War: गाजा का गला घोंटने के करीब इजराइल, जानें कैसे भारत-अमेरिका-चीन खेल रहे ग्रेट गेम?
Israel-Hamas War: इजराइल और हमास के बीच चल रहे युद्ध का वैश्विक रणनीतियों पर पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली प्रभाव पड़ना तय है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मौजूदा जियो-पॉलिटिक्स ने विश्व में कई गुट तैयार कर दिए हैं और मौजूदा वैश्विक राजनीति में हर देश के लिए 'अपना हित' पहले पायदान पर है।
इजराइल-हमास युद्ध ने दुनिया का ध्यान यूक्रेन युद्ध से हटाकर इस नये-नवेले विस्फोटक युद्ध पर ला दिया है और यूक्रेन में युद्ध का लम्बा खिंचना यह दर्शाता है, कि युद्ध के लंबे होने के बाद भी दुनिया के एक और विश्वयुद्ध में फंसने की भविष्यवाणी सच नहीं हुई। वहीं, एक और बात ये निकलकर सामने आई है, कि दुनिया के देश किसी युद्ध में उलझने के मूड में बिल्कुल भी नहीं हैं।

वहीं, अब विश्व शक्तियों का ध्यान यूक्रेन से हटकर इजराइल-गाजा क्षेत्र की जा चुका है, जहां संकट गहरा और खतरनाक है और कई इस्लामी समाज इसमें शामिल हैं।
लिहाजा, मिडिल ईस्ट में चल रहे इस जंग के बीच रूस, यूक्रेन में भरपूर फायदा उठा सकता है। वहीं, बाइडेन प्रशासन के ऊपर से भी यूक्रेन का अनिश्चितकाल तक साथ देने का दबाव हटने लगा है।
बाइडेन प्रशासन पर इजराइल की रक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता के संबंध में और ज्यादा स्पष्ट दृष्टिकोण रखने का दबाव है। पूर्वी भूमध्य सागर में दो सबसे शक्तिशाली अमेरिकी युद्धपोतों की आवाजाही उस दबाव का प्रमाण है, जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं।
संभव है युद्ध का विस्तार
इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमास के विनाश तक गाजा पट्टी पर हमले की शपथ खाई है, लिहाजा युद्ध के विस्तार होने की पूरी आशंका है। गाजा के 10 लाख से ज्यादा निवासियों ने जमीनी हमले की आशंका में अपने घरों को छोड़ना शुरू कर दिया है, वहीं इजराइल ने अपने सैकड़ों टैंक्स और डिफेंस सिस्टम की तैनाती गाजा के पास कर दी है।
इस संघर्ष के और बढ़ने की इसलिए भी आशंका है, क्योंकि इस्लामिक संगठन हिजबुल्लाह, हौथी विद्रोही, सूडानी और शिया-सीरियाई संगठनों ने युद्ध में शामिल होने की चेतावनी दी है।
इजरायलियों को प्रोजेक्टाइल की कमी महसूस होने लगी है, जिसका अर्थ है उनकी तोपखाने बंदूकों और रॉकेट लॉन्चरों के लिए विशेष गोला-बारूद। अमेरिका के लिए इजरायलियों को हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति प्राथमिकता है। इजराइल के बाद ही यूक्रेन का नंबर आता है।

इसबीच, इजराइल को प्रोजेक्टाइल की कमी महसूस होने लगी है और अब अमेरिका के ऊपर इजराइल को हथियारों की सप्लाई करने का प्रेशर बढ़ गया है।
लिहाजा, अब आशंका इस बात की है, कि यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी सहायता और वित्तीय पैकेज भी काफी कम हो जाएगी।
वहीं, युद्ध बढ़ने की स्थिति रूस के लिए फायदेमंद है और वो अब यूक्रेन में आक्रामकता के साथ आगे बढ़ सकता है, जबकि अमेरिका अलग अलग मोर्चों पर फंस गया है।
मध्यस्थता की कोशिश में चीन
चीन ने दो स्वतंत्र और संप्रभु राज्य बनाने के रूसी फॉर्मूले का समर्थन किया है और इस दिशा में, युद्धविराम लाने और हितधारकों के बीच बातचीत फिर से शुरू करने का समर्थन किया है।
शी जिनपिंग ने युद्ध लड़ रहे देशों के बीच मध्यस्थता करने की उत्सुकता जताई है, लेकिन शी जिनपिंग की ये इच्छा फर्जी जान पड़ती है। पर्यवेक्षकों का मानना है, कि संघर्ष की कहानी में कहीं न कहीं चीन का हाथ है।
फिलिस्तीन प्रधानमंत्री महमूद अब्बास ने हाल ही में बीजिंग का दौरा किया था और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। चीन ने खाड़ी क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण लेकिन कट्टर प्रतिद्वंद्वी शक्तियों, अर्थात् ईरान और सऊदी अरब के बीच एक समझौता बनाने का सफलतापूर्वक प्रयास किया था।
हालांकि, नई दिल्ली जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत और यूरोपीय संघ द्वारा 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप' आर्थिक गलियारे की घोषणा ने चीन को परेशान कर दिया है क्योंकि, यह एक ऐसी परियोजना है, जिससे ना सिर्फ चीन का प्रभुत्व कम हो जाएगा, बल्कि चीन को काफी ज्यादा वाणिज्यिक नुकसान भी होगा। लिहाजा, चीन यही चाहेगा, कि लड़ाई बढे और 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप' आर्थिक गलियारे खटाई में पड़ जाए।
इसके अलावा, ईरान अब बीजिंग से विदेश नीति पर राय मशविरा करता है और ईरान बिल्कुल नहीं चाहता है, कि सऊदी अरब और इजराइल के संबंध बने। जबकि, यूएई एकमात्र मुस्लिम देश है, जो तेहरान या बीजिंग से निर्देश नहीं लेता है, बल्कि अपनी विदेश नीति खुद तय करता है।

भारत का 'बैलेंस'
भारत के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो गई है। निर्दोष इजरायलियों पर हमास का बर्बर हमले के खिलाफ भारत ने इजराइल के साथ एकजुटता दिखाई है और प्रधामंत्री मोदी ने आतंकवाद के किसी भी रूप की सख्त निंदा की है।
भारत एकमात्र ऐसा देश है जो पिछले कुछ दशकों या उससे भी अधिक समय से दुनिया को आतंकवाद से मानवता के लिए उत्पन्न गंभीर खतरे के बारे में आगाह करता रहा है। अमेरिका में हुए आतंकी हमले से पहले तक भारत की बातों पर कोई ध्यान नहीं देता था, लेकिन 9/11 के बाद ओसामा बिन लादेन की कहानी सार्वजनिक हो गई।
लेकिन, इसके बाद भी आतंकवाद को लेकर वैश्विक राजनीति तेज ही रही। चीन ने पाकिस्तनी आतंकियों का सार्वजनिक समर्थन किया, वहीं अमेरिका भी अपनी हितों को देखते हुए बार बार पाकिस्तान की मदद करता रहा।
भारत ने हमास के क्रूर हमले की निंदा करने में कोई समय नहीं गंवाया। वैसे भी, जिन मुस्लिम देशों के साथ प्रधानमंत्री मोदी घनिष्ठ मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित करने में सफल हो सकते हैं, वे भारत से खुश नहीं हैं। विशेष रूप से, ईरान, जहां हम बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं और हमारे बीच घनिष्ठ व्यापार, वाणिज्य और सांस्कृतिक संबंध हैं, वो भारत से नाखुश है।

इन मुस्लिम देशों को यह समझाना कि भारत के मन में फिलिस्तीन को लेकर कई दुर्भावना नहीं है, लेकिन भारत को हमास जैसे संगठनों से सख्त ऐतराज रहा है। भारत आतंकवाद से समझौता नहीं कर सकता और न ही करेगा क्योंकि भारत पिछले साढ़े तीन दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहा है।
इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी, जो दुनिया के मुसलमानों (भारत को छोड़कर, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है) के मुसलमानों के लिए काम करने का दावा करता है, वो कश्मीर पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित करता रहा है। लिहाजा, भारत हमास हमले की जांच का हिस्सा बनने से नहीं हिचकेगा।












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