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भारत से अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पिछड़ना बर्दाश्त नहीं, नंबर-5 पर जाने से पहले जापानियों में क्यों भरा आक्रोश

India to Become 4th largest economy: भारत बहुत जल्द दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला है और अनुमानों के मुताबिक, अगले साल भारत, जापान को पीछे छोड़ देगा, जो टोक्यो के लिए बहुत बड़ा झटका है।

जापान के लोगों के लिए सबसे 'अपमान' की बात ये भी है, कि साल 2010 तक जापान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, लेकिन सिर्फ 15 सालों के अंदर जापान, पांचवे स्थान पर खिसकने वाला है।

india vs japan economy

जापान को पीछे छोड़ने वाला है भारत

अप्रैल के अंत में जारी अनुमानों के मुताबिक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने संकेत दिया है, कि भारत की नामिनल जीडीपी 2025 में 4.34 ट्रिलियन अरब डॉलर तक पहुंच जाएगी, जो जापान के 4.31 ट्रिलियन अरब डॉलर से ज्यादा होगी। IMF का पिछला अनुमान ये था, कि भारत 2026 तक दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा, लेकिन जापानी मुद्रा येन की कमजोरी के बाद नये अनुमान में कहा गया है, कि 2025 तक ही भारत, जापान को पीछे छोड़ देगा।

जापान एक साल पहले तक तीसरे नंबर पर था, लेकिन पिछले साल जर्मनी ने उसे पीछे छोड़ दिया और अगले साल भारत भी जापान को पीछे छोड़ने वाला है। जो जापानियों के लिए 2020 के ही सदमे के समान है, जब उसे चीन ने पीछे छोड़ा था।

फुजित्सु की ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस यूनिट के मुख्य नीति अर्थशास्त्री मार्टिन शुल्ज़ ने कहा, कि "जापान के लिए, यह एक बहुत बड़ी चिंता है, और कुछ लोग इसके बारे में खुलकर बात कर रहे हैं, क्योंकि यह उनके लिए शर्मनाक है और इसे हल करना बहुत मुश्किल है।"

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जापानी अर्थव्यवस्था क्यों खा रही गोता?

मार्टिन शुल्ज़ के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जापानी अर्थव्यवस्था में आने वाली परेशानियों को पहचाना और 2012 में पीएम बनने के बाद जापानी विकास को बढ़ाने के लिए "एबेनॉमिक्स" नामक व्यापक योजनाओं की घोषणा की।

शिंजो आबे ने मुख्य तौर पर तीन कार्यक्रमों की घोषणा की थी, जिसमें बैंक ऑफ जापान द्वारा मौद्रिक सहजता की घोषणा करना, सरकारी खर्च के माध्यम से राजकोषीय प्रोत्साहन देना और संरचनात्मक सुधार करना शामिल था, लेकिन तीसरा कार्यक्रम फेल हो गया।

शुल्ज ने कहा, कि "एबेनॉमिक्स का पूरा विचार व्यवसायों में विकास को बढ़ावा देना था, लेकिन उत्पादकता को बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधारों की भी आवश्यकता थी, लेकिन ऐसे देश में ऐसा करना बहुत कठिन है जो बूढ़ा हो रहा है, और जहां परिवर्तन, डिजिटलीकरण और कई विकास कार्यक्रमों को लेकर लोगों का विरोध हो। जापानी सरकार में शामल ज्यादातर लोग लंबे समय से पदों पर हैं, और वो बस पुराने तरीकों को पसंद करते हैं।"

वहीं, कोविड-19 महामारी और यूक्रेन युद्ध ने भी जापानी अर्थव्यवस्था पर असर डाला है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) ने 2 मई को वैश्विक आर्थिक विकास के दृष्टिकोण पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट जारी करके टोक्यो पर नया दबाव डाला है। ओईसीडी ने पूरी दुनिया के लिए 3.1% के ग्रोथ रेट की भविष्यवाणी की है, जो कि फरवरी की रिपोर्ट में 2.9% से ज्यादा है, जिसमें अनुमान लगाया गया है, कि अमेरिका और चीन दोनों पिछली भविष्यवाणियों से आगे निकल जाएंगे, लेकिन पेरिस स्थित इस संगठन ने जापान की संभावित वृद्धि को 1% से कम कर दिया है।

वैश्विक रणनीतिकार और टोक्यो में निक्को एसेट मैनेजमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर नाओमी फिंक ने कहा, कि जापान की कुछ आर्थिक अस्वस्थता को स्थिर आर्थिक विकास के तीन "खोए हुए दशकों" से जोड़ा जा सकता है।

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, कि "जापान, भारत में होने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश का अब मुकाबला नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा, कि "विकसित देशों के लिए उभरते बाजारों की तुलना में धीमी गति से विकास करना पूरी तरह से सामान्य है।"

फिंक ने कहा, जापान बुनियादी ढांचे में भारत के निवेश और तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग से मेल नहीं खा सकता है, जबकि जहां तक जर्मनी का सवाल है, तो जापानी मुद्रा येन का वैल्यू, यूरो की तुलना में 40 प्रतिशत नीचे गिर गया है। जिससे जापान, जर्मनी से पीछे चला गया है।

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जापान के लिए मुद्रा येन सबसे बड़ी चुनौती

शुल्ज़ ने कहा, कि कमजोर येन इस समय जापानी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।" उन्होंने कहा, कि "अतीत में अगर सरकारें कुछ नहीं करती, तो भी मुद्रा वापस मजबूत हो जाती, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है।" उन्होंने रेखांकित किया, कि बाजार में सरकार का हस्तक्षेप "निरर्थक" रहा है और जब तक ब्याज दरें स्थिर रहेंगी, तब तक ऐसा ही रहेगा।

विशेषज्ञ ने बताया, कि समस्या का समाधान यह है, कि बैंक ऑफ जापान एक सख्त मौद्रिक नीति अपनाए और देश उत्पादकता में सुधार पर ध्यान केंद्रित करे।

एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अब जापान के लिए भारत का मुकाबला करना संभव नहीं है और जापानियों को अपनी अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट वाला कड़वा घूंट पीना ही पड़ेगा।

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