भारत के 'परमाणु त्रिशूल' ने 3rd एयरक्राफ्ट कैरियर के प्लान को 'डूबोया'? अरिहंत, अरिघात के बाद आ रहा INS अरिदमन
Aircraft Carrier: भारत की सेकंड-स्ट्राइक परमाणु क्षमता अगले साल तक पूरी तरह से चालू हो जाएगी, क्योंकि भारत अपनी तीसरी परमाणु पनडुब्बी INS अरिदमन (INS Aridaman) को जल्द ही नेवी के बेड़े में शामिल करने जा रहा है। ये 3500 किलोमीटर की रेंज वाली K-4 पनडुब्बी-लॉन्च मिसाइलों से लैस होगी।
INS अरिदमन को लेकर सबसे ज्यादा टेंशन में चीन है, क्योंकि माना जा रहा है, कि इसे चीन को ध्यान में रखकर ही डिजाइन किया गया है और चीन के एक महत्वपूर्ण हिस्से को भारत की स्ट्राइक लिफाफे में ला देगा। INS अरिदमन से भारत को एक विश्वसनीय न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध हासिल हो जाएगा।

भारत का 'परमाणु त्रिशूल' क्या है?
ऐसा माना जाता है, कि परमाणु युद्ध की स्थिति में, सबसे ज्यादा जिंदा रहने की क्षमता, परमाणु-संचालित पनडुब्बियों को पर्याप्त रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस करने पर क्षमता पर निर्भर करती है। जब से पनडुब्बी से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पहली बार अस्तित्व में आई है, तब से इसे सबसे ज्यादा जीवित रहने वाली डिलीवरी सिस्टम माना जाता है, क्योंकि ये समुद्र की गहराई काफी हद गुप्त बनी रहती है।
अगस्त 2024 में, भारत ने INS अरिघाट (जिसका मतलब दुश्मन को नष्ट करने वाली भी है) को भारतीय नौसेना में शामिल किया था। जबकि, INS अरिहंत पहले से ही भारत के पास है और अगले साल जब INS अरिदमन नौसेना के बेड़े में शामिल होगा, तो ये तीन परमाणु पनडुब्बियां मिलकर 'परमाणु त्रिशूल' का निर्माण करेंगी। ये दोनों पनडुब्बियां 750 किलोमीटर की रेंज वाली K-15 मिसाइलों से लैस हैं, जिससे उनकी मारक क्षमता सीमित हो जाती है।
पाकिस्तान के साथ संघर्ष की स्थिति में भी, ये मिसाइलें देश के दक्षिणी हिस्से में ही अपनी सीमा के भीतर लक्ष्य को भेद सकती हैं। ये पहली स्वदेशी रूप से विकसित छोटी दूरी की पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलें (SLBM) हैं।
इसलिए, डेवलपर्स को अंडरवाटर वर्टिकल लॉन्च सिस्टम जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों से पार पाना होगा, जो सबसे परिष्कृत और जटिल हथियारों में से एक है, क्योंकि इसके लिए दो माध्यमों- पानी और वायुमंडल में स्थिरता, गति और सटीकता की जरूरत होती है।
INS अरिदमन की हाल ही में सैटेलाइट इमेजरी के जरिए तस्वीर ली गई थी। यह अरिहंत क्लास की पनडुब्बियों के पिछले वेरिएंट से ज्यादा लंबी है। INS अरिदमन 'थोड़ा बड़ा' है, जिसकी लोड वॉटर लाइन माप 125.4 मीटर है, जबकि इस क्लास की प्रमुख 6,000 टन की INS अरिहंत की 111.6 मीटर है।
यानि भारत अभी जिस परमाणु पनडुब्बी INS अरिदमन का निर्माण कर रहा है, वो अपने दोनों पूर्ववर्तियों INS अरिहंत और INS अरिघाट की तुलना में दोगुनी मिसाइलें ले जा सकता है।
परमाणु प्रतिरोध के लिए भारत की रणनीति, लगातार परमाणु प्रतिरोध बनाए रखने के लिए कम से कम तीन परमाणु पनडुब्बियों पर निर्भर करती है। इन परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों के अलावा, भारतीय नौसेना का लक्ष्य दो परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पारंपरिक रूप से सशस्त्र पनडुब्बियां बनाना है। ये पनडुब्बियां चीन के विशाल पनडुब्बी बेड़े का मुकाबला करने के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं।

परमाणु पनडुब्बियों के बेड़े बनाने के रणनीतिक फायदे
चीन के पनडुब्बी बेड़े में 70 से ज्यादा जहाज शामिल हैं, जिनमें परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां और परमाणु हमला करने वाली पनडुब्बियां, दोनों शामिल हैं। चीन के साथ सीमा तनाव के दौरान रूसी अकुला क्लास की पनडुब्बी, आईएनएस चक्र की तैनाती ने जमीनी आक्रामकता के जवाब में भारत की समुद्री हमला करने की क्षमताओं को उजागर किया है।
परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां अपनी उच्च लागत के बावजूद पारंपरिक पनडुब्बियों की तुलना में महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करती हैं। वे बेहतर स्पीड, गायब रहने की क्षमता प्रदान करते हैं और बंदरगाहों से दूर संचालन करते हुए लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकते हैं। ये विशेषताएं उन्हें वाहक युद्ध समूहों की रक्षा करने और दुश्मन पनडुब्बियों का शिकार करने में प्रभावी बनाती हैं।
भारतीय नौसेना SSN (परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमलावर पनडुब्बियां) और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को पूरक प्लेटफॉर्म के रूप में देखती है। इनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी ताकत और भूमिकाएं हैं, जो भारत की समग्र समुद्री रणनीति में योगदान देती हैं।
अपनी नौसेना क्षमताओं को बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता संभावित खतरों के खिलाफ एक विश्वसनीय निवारक बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है। INS अरिदमन का शामिल होना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आईएनएस अरिदमन जैसी एडवांस पनडुब्बियों की तैनाती यह सुनिश्चित करती है, कि भारत किसी भी समुद्री चुनौती के लिए तैयार रहे, साथ ही क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करे।
क्या अब भारत नहीं बनाएगा तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर?
INS अरिदमन के बाद, भारतीय नौसेना एक और SSBN बनाने की योजना बना रही है, जिसका कोड नाम S-4* है। परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी के अलावा, भारतीय नौसेना दो परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पारंपरिक रूप से सशस्त्र पनडुब्बियों (SSN) के निर्माण के लिए सरकार से AoN की मांग कर रही है। फिलहाल भारतीय नौसेना के बेड़े में एक भी SSN नहीं है।
इसकी तुलना में, चीन के पनडुब्बी बेड़े में 70 से ज्यादा पनडुब्बियां हैं, जिनमें सात परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN), 12 परमाणु हमला करने वाली पनडुब्बियां (SSN) और 50 से ज्यादा डीजल हमला करने वाली पनडुब्बियां (SSK) शामिल हैं। इसके विपरीत, भारत के ज्यादातर पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को 1980 के दशक में खरीदा गया था और अब वे पुराने हो रहे हैं।
चीनी नौसेना की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों की क्षमता का मुकाबला करना भारत के लिए इतना ज्यादा जरूरी हो गया है, कि SSN परियोजना के लिए भारत ने 65,000 टन वजनी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC)-2 के निर्माण की अपनी योजना को स्थगित कर दिया है। जबकि, कई डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है, कि भारत को तीसरे एयरक्राफ्ट निर्माण की तरह जाना चाहिए। लेकिन अब ऐसा लगता है, कि भारत ने फिलहाल तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का प्लान ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
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