Diplomacy: भारत-तालिबान की दोस्ती देख पाकिस्तान हैरान, मोदी की डिप्लोमेसी से कैसे करीब आया अफगानिस्तान?
India-Taliban Diplomacy: अफगानिस्तान को अपना आंगन बनाने की हरसत देख रहे पाकिस्तान को मोदी सरकार की डिप्लोमेसी से ऐसा झटका लगा है, जिसके सदमे से उबरना उसके लिए काफी मुश्किल है। पाकिस्तान ये बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है, कि भारत ने कैसे तालिबान को अपने खेमे में कर लिया है।
साउथ एशिया की जियो-पॉलिटिक्स लगातार बदल रही है और जिस अफगानिस्तान के जरिए भारत में आतंकवादियों को भेजने और हिंसा फैलाने का ख्वाब कट्टरपंथियों के देश पाकिस्तान ने देखा था, उसकी वो योजना बुरी तरह से फेल हो चुकी है। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने पिछले हफ्ते तालिबान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्ताकी से जैसे ही मुलाकात की, पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स और उसकी सरकार में खलबली मच गई।

भारत के साथ कैसे आया तालिबान? (India-Taliban Relation)
विक्रम मिस्री और तालिबान के विदेश मंत्री के बीच हुई ये मुलाकात, दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच हुई ये उच्चस्तरीय मुलाकात है और पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का कहना है, कि मोदी सरकार 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है' उस सिद्धांत पर काम कर रही है।
भारत और तालिबान के नेता के बीच उस वक्त मुलाकात हुई है, जब अफगानिस्तान पर पाकिस्तान ने एयरस्ट्राइक किए हैं, जिसमें 46 अफगानों की मौत हो गई, जिनमें ज्यादातर बच्चे और महिलाएं शामिल हैं। इस घटना ने दोनों देशों के बीच के तनाव को काफी ज्यादा भड़का दिया है और तालिबान ने पाकिस्तान से बदला लेने की कसम खाई है। अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी हमले के बाद नई दिल्ली ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान की निंदा की है और कहा, कि पाकिस्तान की अपनी नाकामियों के लिए अपने पड़ोसियों को दोष देने की पुरानी आदत है।
पाकिस्तान और तालिबान कैसे बन चुके हैं दुश्मन? (Pakistan-Taliban Conflict)
अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तो पाकिस्तान में जश्न मनाया गया था और तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था, कि 'अफगानों ने गुलामी की बेड़ियां तोड़ दी हैं।' वहीं, तत्कालीन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI प्रमुख फैज हमीद ने काबुल का दौरा किया था। पाकिस्तान ने काबुल पर तालिबान के कब्जे को अपनी जीत मान था और उस दौरान महीनों तक पाकिस्तान ने, दुनिया से तालिबान की सरकार को मान्यता देने की अपील की थी।
तालिबान के शासन के आने से पहले भारत के अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकारों के साथ काफी मजबूत संबंध थे, जिनमें अशरफ गनी की सरकार भी शामिल थी। और उस वक्त तक, तालिबान के साथ भारत के कोई संबंध नहीं थे और तालिबान को पूरी तरह से पाकिस्तान को पिट्ठू माना जाता था।
तालिबान के आने के बाद अफगानिस्तान में भारत के लिए चीजें खराब होती चली गई और भारत ने काबुल स्थित अपने दूतावास को भी बंद कर दिया और भारी संख्या में भारत समर्थक अफगान भागकर दिल्ली आ गये। लेकिन, कई महीनों की डिप्लोमेसी के बाद, एक तरह जहां भारत और तालिबान के बीच पर्दे के पीछे से बातचीत होने लगी, वहीं तालिबान और पाकिस्तान के बीच संबंध खराब होने लगे।
भारत के करीब कैसे आने लगा तालिबान?
दरअसल, पाकिस्तान चाहता था, कि तालिबान उसके इशारों पर काम करे और अफगानिस्तान, उसका सैटेलाइट राज्य बनकर रहे, लेकिन तालिबान ने पाकिस्तान के रिमोट कंट्रोल पर शासन चलाने से साफ इनकार कर दिया। वहीं, तालिबान ने डूरंड लाइन को भी मानने से इनकार कर दिया और पाकिस्तान ने डूरंड लाइन पर जो बाड़ेबंदी की थी, तालिबान के सैनिकों ने उन्हें उखाड़कर फेंक दिया।
वहीं, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पाकिस्तान में एक के बाद एक आतंकी हमले शुरू किए, जिसके लिए पाकिस्तान ने तालिबान को जिम्मेदार ठहराया। इसने दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ाया।
वहीं, पाकिस्तान के जाल से अलग होने के बाद तालिबान ने अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र किया और भारत के करीब आना शुरू कर दिया और वो क्षेत्र का प्रमुख खिलाड़ी बनने की दिशा में निकल पड़ा।
दरअसल, तालिबान ना सिर्फ भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों से मान्यता चाहता है, बल्कि अफगानों से भी वो मान्यता हासिल करना चाहता है। हालांकि, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और मानवाधिकार हनन को लेकर उसकी आलोचना भी की जा रही है, लेकिन अफगानों के बीच पाकिस्तान को लेकर फैली घृणा के साए में उसके करीब रहकर राजनैतिक वैधता हासिल नहीं कर सकता है, लिहाजा उसने लंबे वक्त से भारत के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश की और भारत को विश्वास दिलाया, कि वो अपनी जमीन का इस्तेमाल नई दिल्ली के खिलाफ नहीं होने देगा।
वहीं, पिछले साल अगस्त में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद अब पाकिस्तान ने बांग्लादेश के जरिए भारत को परेशान करने वाले कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ऐसे में अफगानिस्तान के जरिए भारत, पाकिस्तान को कंट्रोल कर सकता है। और पाकिस्तान के लिए सबसे सदमे वाली बात यही है। तालिबान ने भारत से अपील की है, कि वो अफगानिस्तान में अपने ठप पड़े प्रोजेक्ट्स फिर से शुरू करे और इसके जरिए, तालिबान की कोशिश अपने लोगों का दिल जितना है।
और भारत ने आश्वासन दिया है, कि वो अफगानिस्तान में अपने विकास कार्यों को फिर से शुरू करने के अलावा हेल्थ सेक्टर और शरणार्थियों को फिर से बसाने के लिए भौतिक सहायता देगा, जिसने तालिबान खुश है, जबकि पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स इसे पाकिस्तान की विदेश नीति की नाकामी बता रहे हैं।












Click it and Unblock the Notifications