तेल बाजार का ग्लोबल लीडर बनेगा भारत, चीन छूट जाएगा पीछे, पेट्रोल बेचने वाले देश फिरेंगे आगे-पीछे
तेल को लेकर अकसर सऊदी अरब ने भारत को ब्लैकमेल किया है, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने हालात को बदल दिए हैं। अब भारत सऊदी से भी ज्यादा तेल रूस से खरीदता है।

India to become number one Oil Consumer Country: भारत की विकास की स्पीड रॉकेट की रफ्तार से हो रही है और अब भारत, चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ा तेल उपयोगकर्ता देश बनने की कगार पर पहुंच गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, जल्द ही भारत तेल खपत करने के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा, जो भारत के लगातार विकास को दर्शाता है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन की विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई है, लिहाजा भारत जल्द ही चीन को पीछे छोड़ देगा। रिपोर्ट में कहा गया है, कि शायद भारत आखिरी देश बनेगा, जो सबसे ज्यादा तेल खर्च करने वाला देश होगा, क्योंकि अब दुनिया तेजी से हरित क्रांति की तरफ आगे बढ़ रही है और ज्यादातर देश ग्रीन एनर्जी की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।
चीन को पीछे छोड़ेगा भारत
आबादी के लिहाज से अनुमान है, कि भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है और अब भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है, लेकिन उसी रफ्तार से भारत में पेर्टोलियम पदार्थ का खपत भी बढ़ा है। लिहाजा, भारत में तेल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। भारत में अभी भी पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाड़ियों की संख्या में इजाफा हो रहा है, जबकि चीन में अब तेजी से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। चीन में इलेक्ट्रिक कारों की डिमांड पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है और ये भी एक वजह है, कि चीन में पेट्रोल-डीजल की डिमांड में कमी आई है। हालांकि, इस बात की संभावना काफी कम है, कि भारत भी अपने तेल नेटवर्क का चीन की तरह ही विशालकाय पैमाने पर विस्तार करेगा, क्योंकि भारत का लक्ष्य भी ग्रीन एनर्जी की दिशा में बढ़ना है। माना जा रहा है, कि चीन की तुलना में भारत में कच्चे तेल की डिमांड में तीन गुना का इजाफा होगा, लिहाजा दुनियाभर के तेल उत्पादक देश भारत की तरफ ही आएंगे, ताकि तेल की डिमांड में विश्वस्तर पर आई गिरावट की भरपाई भारत में की जा सके। इस रेस में खाड़ी के कई देश भी शामिल होंगे, जो भारत को तेल बेचने की कोशिश करेंगे।

'भारत का चीन से आगे निकलना निश्चित था'
जेपी मॉर्गन चेस एंड कंपनी में एशिया एनर्जी एंड केमिकल रिसर्च के प्रमुख पार्ले ओंग ने कहा, कि "तेल की डिमांड में भारत का ग्लोबल ड्राइवर बनना हमेशा से निश्चित था और ये सिर्फ वक्त की बात थी, कि भारत कब तक चीन से आगे निकलता है। भारत का तेल खपत में नंबर वन बनना निश्चित था, खासकर भारत की जनसंख्या में जिस रफ्तार से वृद्धि हुई है, वो सबसे बड़ा फैक्टर है"। आपको बता दें, कि 1950-60 के दशक के बाद जब चीन आर्थिक जाकरण काल में आया, तो वो दुनिया का सबसे बड़ा तेल खपत करने वाला देश बन गया। तेल के साथ साथ चीन में दुनिया की सबसे ज्यादा बिजली की खपत होने लगी, जिसका फायदा दुनिया के तेल और बिजली उत्पादक देशों ने जमकर उठाया और चीन में तेल और बिजली बेचकर डॉलर्स कमाए। लेकिन,अब दुनिया ऊर्जा के लिए तेल पर अपनी निर्भरता तेजी से कम कर रही है, लिहाजा तेल उत्पादक देश भी टेंशन में हैं। चीन की शीर्ष रिफाइनर चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्प ने हाल ही में कहा है, कि 2030 के आसपास चीनी तेल की खपत रम पर होगी और उसके बाद चीन में तेल की डिमांड कम होने लगेगी।

चीन का 'आखिरी तूफान'
सिटीग्रुप इंक में कमोडिटी रिसर्च के प्रमुख और इंडस्ट्री के जाने माने नाम ED Morse ने कहा, कि कोविड प्रतिबंधों के बाद चीन के बाजार खुल रहे हैं और चीन में तेल की मांग में आने वाला ये तूफान आखिरी होगा। इसके बाद चीन में कभी तेल की इतनी डिमांड नहीं हो पाएगी। वहीं, डेटा इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के प्रमुख क्रूड विश्लेषक विक्टर कैटोना का मानना है, कि भारत की वृद्धि 2026 से चीन को पीछे छोड़ आगे निकल जाएगी। उन्हें यह भी उम्मीद है, कि साल 2036 के बहुत बाद जाकर भारतीय में तेल की डिमांड अपने पीक पर आएगी। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, लंदन में फिच सॉल्यूशंस लिमिटेड की एक वरिष्ठ विश्लेषक एम्मा रिचर्ड्स ने कहा, कि "वैश्विक तेल मांग में एक प्रमुख इंजन होने की चीन की भूमिका में तेजी से कमी आ रही है।" उन्होंने कहा, कि अगले दशक में, वैश्विक तेल बाजार में घटकर 15 प्रतिशत के आसपास सिमट जाएगी, जो अभी करीब 50 प्रतिशत के आसपास है। जबकि, भारत की हिस्सेदारी दोगुनी होकर 24% हो जाएगी। यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले ही तेल की डिमांड के मामले में भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यूक्रेन युद्ध के बाद तेल के लिए भारत की भूख में और इजाफा हुआ है। दक्षिण एशियाई राष्ट्र भारत, अब रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख उपभोक्ता बन गया है।

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चीन को पहले ही पीछे छोड़ सकता था भारत
रिपोर्ट में कहा गया है, कि ये पहली बार नहीं है, जब भारत की तेल की मांग में भारी वृद्धि की भविष्यवाणी की गई है, बल्कि पिछले दशक के मध्य में इसी तरह की भविष्यवाणी की गई थी। लेकिन, क्या इस बार भारत वास्तव में तेल डिमांड के मामले में नंबर वन बनेगा, ये निर्भर करता है भारत की नौकरशाही पर और उसके सुचारू ढंग से काम करने के तरीकों पर। भारत सरकार की तेल रिफाइनर कंपनियां अपने ऑपरेशन की आधुनिकीकरण में धीमे रहे हैं और तेल के ऑर्डर देने में भारत अभी भी अपना पुराना तरीका ही आजमा रहा है, जिसमें स्पॉट तेल खरीददारी के लिए टेंडर जारी करना है। भारत अभी भी तेल खरीदने के लिए चुस्त और लचीला तरीका नहीं अपना रहा है, जैसे की दूसरे देश सीधे तौर पर कंपनी से बात करके करते हैं। लिहाजा, भारत की बोझिल प्रक्रिया इस रास्ते में बड़े बाधक की तरह है। सिंगापुर में वंदा इनसाइट्स की संस्थापक वंदना हरि ने कहा, कि फिर भी, भारत की तेजी से बढ़ती कच्चे तेल की मांग दक्षिण एशियाई राष्ट्र को विदेशी व्यापारियों और उत्पादकों के लिए एक आकर्षक अवसर के रूप में पेश करेगी।












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