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Explainer: पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को बर्बाद करने पर तुला ईरान, भारत के साथ चाहबहार पर फाइनल समझौते का ऐलान

India-Iran Vs Pakistan: पाकिस्तान के साथ तनाव के बीच इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारत और ईरान, भारत की पहली विदेशी बंदरगाह परियोजना, चाहबहार पोर्ट पर अंतिम समझौते पर पहुंच गए हैं। इस ईरानी बंदरगाह का निर्माण दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत का अहम मुद्दा रहा है और यह तब चर्चा में आया था, जब प्रधानमंत्री मोदी 2017 में तेहरान की यात्रा में गये थे।

चाहबहार पोर्ट वो मुद्दा है, जिसको लेकर पाकिस्तान हमेशा से परेशान रहा है और जब दोनों देशों के बीच चाहबहार पोर्ट को लेकर पहली बार बातचीत शुरू हुई थी, उसके बाद से ही पाकिस्तान ने हमेशा ईरान के सामने, भारत के साथ चाहबहार पोर्ट को लेकर समझौता करने पर आपत्ति जताई है।

iran india Chahbahar Port final deal

2021 में ताशकंद में एक कनेक्टिविटी सम्मेलन में, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चाहबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान सहित एक प्रमुख क्षेत्रीय ट्रांजिट केंद्र के रूप में पेश किया था।

23 नवंबर 2023 को, भारतीय विदेश सचिव विनय क्वात्रा राजनीतिक मामलों के लिए ईरानी उप विदेश मंत्री अली बाघेरी कानी के साथ भारत-ईरान विदेश कार्यालय परामर्श (एफओसी) की बैठक की सह-अध्यक्षता करने के लिए तेहरान में थे।

और उन्होंने एक ट्वीट में कहा था, कि "द्विपक्षीय मामलों, चाहबहार बंदरगाह सहित कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर चर्चा की और क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों पर दृष्टिकोण साझा किया...।"

चाहबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट क्या है?

चाहबहार बंदरगाह, ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित सिस्तान बलूचिस्तान प्रांत में स्थिति कनेक्टिविटी परियोजना है, जिसके तहत ओमान की खाड़ी पर चाहबहार बंदरगाह का विकास 2003 से भारत और ईरान, देशों के सहयोग से किया जा रहा है।

भारत और ईरान ने बंदरगाहों और संबंधित उद्योगों में 8 अरब डॉलर का निवेश करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए ट्रांजिट रूट के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके दो मुख्य बंदरगाह हैं, लेकिन भारत दोनों में से केवल एक का ही विकास करेगा, अर्थात् शहीद बेहेश्टी बंदरगाह का विकास भारत करेगा।

इस परियोजना से भारत और ईरान के अलावा अफगानिस्तान भी जुड़ा है। जनवरी 2016 में, तीनों देशों ने बंदरगाह को विकसित करने के लिए एक त्रिपक्षीय आर्थिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

इन वर्षों में, चाहबहार परियोजना विकसित हुई है और अब इसमें एक बंदरगाह, एक फ्री ट्रेड जोन, ज़ाहेदान तक 628 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन और फिर ईरान-तुर्कमेनिस्तान सीमा पर सिराख्स तक 1,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबे ट्रैक तैयार करने की योजना तैयार की गई है।

हालांकि, अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध और इस प्रोजेक्ट का जिन देशों पर असर पड़ता, वहां की घरेलू राजनीति के चलते इस परियोजना का विकास उस तरह से नहीं हो पाया, जैसा सोचा गया था, क्योंकि इस प्रोजेक्ट का असर पूरे क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतियों पर बड़े पैमाने पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

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भारत-ईरान में आखिरकार हो गया समझौता

भारतीय विदेश मंत्री इसी हफ्ते ईरान की यात्रा पर थे और उन्होंने अपनी ईरानी यात्रा की शुरुआत, ईरानी सड़क और शहरी विकास मंत्री मेहरदाद बजरपाश के साथ बैठक के साथ की।

जिसके बाद विदेश मंत्री ने ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने मुलाकात की और चाहबहार बंदरगाह विकास योजना सहित ईरान-भारत समझौतों के कार्यान्वयन में तेजी लाने और देरी के लिए और अधिक क्षतिपूर्ति करने पर चर्चा की।

भारत में ईरान दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, कि "राष्ट्रपति ने चाहबहार बंदरगाह विकास योजना सहित ईरान और भारत के बीच समझौतों के कार्यान्वयन में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।"

डॉ. जयशंकर ने ट्वीट किया, कि "चाहबहार बंदरगाह के संबंध में दीर्घकालिक सहयोग ढांचा स्थापित करने पर विस्तृत और सार्थक चर्चा। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया।"

भारत 2016 से क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए, विशेष रूप से अफगानिस्तान से अपनी कनेक्टिविटी के लिए, चाहबहार बंदरगाह परियोजना पर जोर दे रहा है, जब उपमहाद्वीप ने टर्मिनल विकसित करने के लिए ईरान और अब तालिबान के नेतृत्व वाले राष्ट्र के साथ त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

नवंबर 2023 में, विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने ईरानी विदेश मंत्री होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन के साथ रणनीतिक चाहबहार बंदरगाह के माध्यम से कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने और हमास-इज़राइल संघर्ष से उत्पन्न पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की थी।

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चाहबहार बंदरगाह कितना महत्वपूर्ण?

भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने 15 जनवरी को तेहरान में अपने ईरानी समकक्ष होसैन अमीराब्दुल्लाहियन के साथ व्यापक वार्ता की। चर्चा का मुख्य विषय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाहबहार बंदरगाह, उत्तर-दक्षिण कनेक्टिविटी परियोजना और कुछ महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों में भारत की भागीदारी थी।

भारत ने मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरेशिया के बाजारों तक पहुंच के लिए ईरान की अद्वितीय भौगोलिक स्थिति से लाभ उठाने में अपनी रुचि दोहराई। जयशंकर ने इस दौरान कहा, कि "हमने द्विपक्षीय संबंधों पर व्यापक चर्चा की।"

चाहबहार परियोजना पाकिस्तान को दरकिनार करके भारत को अफगानिस्तान के लिए एक सीधा रास्ता प्रदान करेगी, क्योंकि अभी पाकिस्तान, अफगानिस्तान जाने वाले भारतीय ट्रकों को अपने क्षेत्र से गुजरने की इजाजत नहीं देता है।

अफगानिस्तान, ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ मित्रता के बंधन में बंधा हुआ है, और नई कनेक्टिविटी अफगानिस्तान के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद है, क्योंकि इससे ना सिर्फ काबुल को अपने व्यापार, वाणिज्य और संपर्क का विस्तार करने के लिए एक विशाल बाज़ार मिलेगा, बल्कि इस प्रोजेक्ट के जरिए तालिबान को भारत के साथ काम करने का मौका भी मिलेगा, जो उसके लिए जियो-पॉलिटिकल लिहाज से काफी फायदेमंद होगा।

क्षेत्र में चीन का प्रभुत्व भी होगा कम

पाकिस्तान के साथ सीपीईसी प्रोजेक्ट के जरिए चीन ने इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी को लेकर एक प्रभुत्व का जो निर्माण किया है, चाहबहार प्रोजेक्ट उस प्रभुत्व को भी खत्म कर देगा।

भारत की तीन गुना कनेक्टिविटी योजना, अर्थात् भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), चाहबहार परियोजना, और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), बड़े पैमाने पर चीन और उसके कुख्यात दोस्त पाकिस्तान पर कई एशियाई और यूरेशियाई देशों की निर्भरता को कम करती है और कई देश चीन के ऋण जाल में फंसने से बच जाते हैं।

भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, चाहबहार बंदरगाह और INSTC भूमध्य-स्वेज़ मार्ग की तुलना में 30% सस्ता आयात प्रदान करते हैं। मध्य एशिया से प्राकृतिक गैस को चाहबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत में निर्यात किया जा सकता है। भारत पहले से ही मध्य एशियाई गणराज्य तुर्कमेनिस्तान से निकलने वाली तापी गैस पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं का हिस्सा है।

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पाकिस्तान कैसे हो जाएगा अलग-थलग

कूटनीतिक लिहाज से, चाहबहार बंदरगाह का उपयोग भारत द्वारा एक ऐसे मार्ग के रूप में किया जा सकता है, जहां से मध्य और दक्षिण एशिया में मानवीय कार्यों का कॉर्डिनेट किया जा सकता है। चाहबहार बंदरगाह, भारत की ईरान तक पहुंच को बढ़ावा देगा, जो अंतर्राष्ट्रीय आईएनएसटीसी का प्रमुख प्रवेश द्वार है, जिसमें भारत, रूस, ईरान, यूरोप और मध्य एशिया के बीच समुद्री, रेल और सड़क मार्ग हैं।

यह प्रोजेक्ट, 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर है, जो सेंट पीटर्सबर्ग को मुंबई से जोड़ता है। आईएनएसटीसी भारत को यूरेशियन मुक्त व्यापार क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

भारत ने चाहबहार समझौते को ऐसे समय में अंतिम रूप दिया है, जब मध्य पूर्व में राजनीतिक परिदृश्य अनिश्चित है। एक और विश्व युद्ध के बादल इस क्षेत्र पर मंडरा रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय नौसैनिक व्यापार जलमार्ग गंभीर खतरे में हैं। लाल सागर के माध्यम से वाणिज्यिक जहाजों की सुचारू आवाजाही में व्यवधान को खत्म करने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन को यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ बमबारी कर रहे हैं।

वहीं, भारत के साथ इतना बड़ा समझौता कर ईरान ने पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया है, कि उसका एक प्रोजेक्ट, पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर कितना बड़ा झटका दे सकता है और कैसे उसके कराची बंदरगाह की उपयोगिता ही खत्म कर सकता है।

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