भारत में जन्मे केमिस्ट शंकर बालासुब्रहमण्यम को मिला टेक्नोलॉजी का 'नोबेल' प्राइज, DNA क्षेत्र में लाई क्रांति
शंकर बालासुब्रहमण्यम और डेविड क्लेनरमैन को यह अवार्ड डीएनए पर गहन शोध, डीएनए की क्रमबद्धता के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए दिया गया है
लंदन, मई 19: भारतीय वैज्ञानिक पूरी दुनिया में अपनी काबिलियत की बदौलत देश का नाम रोशन कर रहे हैं। नासा की सफलता में दर्जनों भारतीय वैज्ञानिकों का हाथ है तो अब भारत में जन्म वैज्ञानिक प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम को तकनीक की दुनिया में अहम योगदान के लिए प्रतिष्ठित मिलेनियम टेक्नोलॉजी अवार्ड से नवाजा गया है। कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी में केमिस्ट शंकर बालासुब्रहमण्यम और उनके साथी डेविड क्लेनरमैन को संयुक्त तौर पर इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। इस अवार्ड को साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नोबेल प्राइज जितना सम्मानित माना जाता है। (सभी फोटो सौजन्य- Cambridge University)
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शंकर बालासुब्रहमण्यम को सम्मान
शंकर बालासुब्रहमण्यम और डेविड क्लेनरमैन को यह अवार्ड डीएनए पर गहन शोध, डीएनए की क्रमबद्धता के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए दिया गया है। मिलेनियम टेक्नोलॉजी अवार्ड एक बेहद सम्मानीय अवार्ड है जिसकी शुरूआत 2004 से की गई थी और हर दो साल पर ये अवार्ड टेक्नोलॉजी की दुनिया में अहम योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को दिया जाता है। मिलेनियम टेक्नोलॉजी अवार्ड अवार्ड फिनलैंड के राष्ट्रपति ने एक वर्चुअल कार्यक्रम के दौरान शंकर बालासुब्रहमण्यम को दी है। शंकर बालासुब्रहमण्यम को यह अवार्ड टेक्नोलॉजी एकेडमी फिनलैंड यानि टीएफ की तरफ से दिया गया है। पहली बार ये अवार्ड wwe यानि वर्ल्ड वाइड वेब का आविष्कार करने वाले सर टिम बर्नर्स को मिला था। इस पुरष्कार का मकसद समाज को बेहतर बनाने के उद्येश्य से जुड़ शोध और आविष्कार करनवे के लिए दिया जाता है, जिससे विज्ञान पर गहरा असर पड़ता हो।

कौन हैं शंकर बालासुब्रहमण्यम ?
भारत का नाम रोशन करने वाले शंकर बालासुब्रहमण्यम का जन्म भारत के तामिलनाडु राज्य की राजधानी चेन्नई में साल 1966 में हुआ था। लेकिन, जब शंकर बालासुब्रहमण्यम सिर्फ 2 साल के थे, तभी उनके माता-पिता चेन्नई से ब्रिटेन शिफ्ट हो गये थे। शंकर बालासुब्रहमण्यम ने अपनी बढ़ाई कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से की है, जहां उन्होंने नैचुरल साइंस में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने प्रोफेसर क्रिस एबेल के मार्गदर्शन में पीएचडी की भी डिग्री हासिल की। रिपोर्ट के मुताबिक प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम और उनके साथी डेविड क्लेनरमैन पिछले कई सालों से एक साथ काम कर हैं। सबसे पहले दोनों 1990 के दशक में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में केनेस्ट्री विभाग में एक साथ काम कर रहे थे, इस दौरान दोनों ने कम कीमत वाली हाई थ्रोपुच सिक्वेंसिंग पर काफी काम किया था।

दोनों ने मिलकर सोलेक्सा कंपनी बनाई
प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम और डेविड क्लेनरमैन डीएनए सिक्वेंसिंग पर साल 1998 से ही काम कर रहे हैं और 1998 में ही दोनों ने मिलकर सोलेक्सा नाम की कंपनी बनाई थी। साल 2007 में सोलेक्सा कंपनी को अमेरिका की एक कंपनी इल्युमिना ने 600 मिलियन डॉलर में खरीद लिया था। इस डील को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के लिहाज से काफी बड़ी सफलता कहा गया था। साल 2010 में प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम को बायोटेक्नोलॉजी के बायोलॉजिकल साइंस रिसर्च काउंसिल की तरफ से इनोवेटर ऑफ द ईयर का सम्मान दिया गया था। उन्हें ये सम्मान सोलेक्सा सिक्वेंसिंग पर किए गये काम के लिए दिया गया था।
भारत के साथ मजबूत रिश्ते
प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम भले ही 2 साल की उम्र में भारत से ब्रिटेन चले गये लेकिन अभी भी भारत के साथ उनका अटूट रिश्ता बना हुआ है। ब्रिटिश अखबार टेलीग्राफ को दिए गये इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनकी जड़ें आज भी भारत से ही जुड़ी हुई हैं और भारत उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने इंटरव्यू के दौरान कहा था कि 'मेरे परिवार के सदस्य आज भी साउथ इंडिया में रहते हैं और यूके में मुझसे और मेरे परिवार की सभी लोगों से मुलाकात होती रहती है। हमने भारत से अपनी जड़ों को काफी मजबूत कर रखा है।' भारत के विज्ञान पर बात करते हुए प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम ने कहा था कि 'भारत का वैज्ञानिक इतिहास काफी महान रहा है और वो भारतीय तंत्र के साथ अपनी दोस्ती बरकरार रखना चाहते हैं'। प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम इस वक्त कैब्रिज यूनिवर्सिटी के अलावा रॉयल सोसाइटी और ट्रीनिटी कॉलेज के भी फेलो हैं।

प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम की खोज
प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम ने अपने दोस्त क्लेनरनैन के साथ मिलकर सोलेक्सा-इलुमिना नेक्स्ट जेनरेशन डीएनए सीक्वेंसिंग यानि एनजीएस की खोज की है। इस खोज की मदद से अब किसी भी जीव के पूरे डीएनए सीक्वेंसिंग के बारे में पूरा पता लगाया जा सकता है। वहीं, ये भी माना जा रहा है कि प्रोफेसर शंकर बालासुब्रहमण्यम की इस खोज से कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में काफी अहम योगदान दे सकता है। दोनों वैज्ञानिकों की तरफ से जारी ज्वाइंट स्टेटमेंट में कहा गया है कि 'इस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में हमारे योगदान को इंटरनेशनल लेवल पर पहली बार सराहा गया है, लेकिन इस पुरस्कार पर हमारी पूरी टीम का हक है, जिन्होंने इस तकनीक को विकसित करने में काफी अहम भूमिका निभाई है।' उन्होंने ये भी कहा कि 'यह सम्मान उन सभी लोगों के लिए जिन्होंने हमारी यात्रा में हमारा साथ दिया है और हमें उत्साहित किया है।'












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