India-Bangladesh Ties: खालिदा जिया के बांग्लादेश के साथ भारत को कैसे डील करना चाहिए? ये होंगी 5 बड़ी चुनौतियां
India-Bangladesh Ties: शेख हसीना के पतन के बाद के परिणामों से निपटने के लिए भारत को बहुत ज्यादा पॉलिटिकल और डिप्लोमेटिक रणनीति बनाने की जरूरत होगी, जो उपमहाद्वीप की जियो-पॉलिटिक्स को हिला सकता है, यदि इस संकट से सावधानी से नहीं निपटा गया।
संकट के इस दौर में भारत सरकार के सामने पांच बड़ी चुनौतियां उभरकर आ सकती हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को बेहतरीन रणनीति बनाकर चलने की जरूरत होगी।

नंबर- 1- क्या भारत अपने दोस्तों के साथ खड़ा हो सकता है?
भारतीय प्रतिष्ठान ने निश्चित रूप से यह सुनिश्चित किया है, कि गुस्साए प्रदर्शनकारियों के बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास पर हमला होने से पहले शेख हसीना को सुरक्षित तरीके से ढाका से निकाल लिया जाए। 50 साल पहले की कहानी बिलकुल अलग थी, जब दिल्ली 15 अगस्त 1975 को तख्तापलट करने वालों की तरफ से शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के ज्यादातर लोगों की हत्या को नहीं रोक पाई थी।
भारत को 1992 में भी इसी तरह की नाकामी का सामना करना पड़ा था, जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया था। उस वक्त भी दिल्ली, अफगान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को संकट से बाहर नहीं निकाल सका था। इस घटना के चार साल बाद, जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया, तो तालिबान ने नजीबुल्लाह को संयुक्त राष्ट्र की हिरासत से बाहर निकाला और उन्हें लैंप पोस्ट से लटकाकर मार दिया।
इस बार भारत, शेख हसीना के साथ खड़ा रहा और उन्हें सुरक्षित निकालकर शरण दिया। जिससे संकेत गया है, कि भारत अपने दोस्तों के साथ खड़ा हो सकता है।
नंबर-2- शेख हसीना या बांग्लादेश, किसे चुनेगा भारत?
हर मुश्किल परिस्थिति में दोस्तों का साथ देना, क्षेत्र और उससे आगे जाकर भी साथ देना, किसी भी बड़ी शक्ति की साख का अहम हिस्सा होता है। लेकिन कोई भी देश अपनी किस्मत को किसी एक व्यक्ति या पार्टी से नहीं जोड़ सकता। दिल्ली के लिए एक तात्कालिक चुनौती, शेख हसीना का साथ देते हुए भी उनसे खुद को दूर करना और उनके विरोधियों से डिप्लोमेटिक स्तर पर जुड़ना है।
पिछले एक दशक से भी ज़्यादा समय में भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों में नाटकीय बदलाव देखने को मिला है, जिसका श्रेय हसीना की दूरदर्शी डिपलोमेसी को जाता है। लेकिन, एक हकीकत ये है, कि शेख हसीना का शासन तानाशाही की तरफ झुखा था और उनका संपर्क जनता से टूट चुका था। वो लोगों के बदलते आकांक्षा को भांप नहीं पाईं, जिसकी वजह से उनकी सरकार को लेकर इकबाल खत्म हो गया।
चाहे जानबूझकर हो या नहीं, नई दिल्ली, शेख हसीना के साथ बहुत ज्यादा जुड़ी हुई है और उनके खिलाफ बढ़ती नफ़रत का असर भारत पर भी पड़ना तय है। शेख हसीना के समर्थन और घर में उनकी बढ़ती अलोकप्रियता के बीच तनाव, पिछले कुछ सालों में स्पष्ट रूप से देखा गया है।
इसके अलावा, जब बाइडेन प्रशासन ने शेख हसीना की गिरती राजनीतिक विश्वसनीयता को उजागर किया, तो भारत में जमीनी स्तर पर बदलती वास्तविकता को समझने के बजाय वाशिंगटन की निंदा की और शेख हसीना के साथ अटूट समर्थन दिखाया।
लिहाजा, उम्मीद है कि सरकारी एजेंसियां सार्वजनिक तर्क से थोड़ी ज्यादा समझदार होंगी। विदेश नीति पर एकरंगी चर्चा, जिसमें अंतर्निहित मान्यताओं पर बहुत कम सवाल उठाए जाते हैं, वो निश्चित तौर पर दिल्ली को नुकसान पहुंचाती है।
अगले कुछ दिनों में पता चलेगा, कि क्या भारतीय प्रतिष्ठान ने बंगाली विपक्ष के प्रमुख लोगों के साथ कामकाजी रिश्ते विकसित किए हैं, जिनकी जनता के गुस्से को शांत करने, एक स्थिर अंतरिम सरकार बनाने और दोनों देशों के बीच हाई स्टेक वाली साझेदारी को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका है।

3- क्या चीन-पाकिस्तान को दूर रख पाएगा भारत?
पाकिस्तान और चीन ढाका में मौजूदा उथल-पुथल का फायदा उठाने की कोशिश जरूर करेंगे और आने वाले दिनों में नई सरकार को भारत से दूर धकेलने की कोशिश करेंगे। भारत को वर्तमान समय में हिंसा को सीमित करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप जैसे अपने मित्रों और साझेदारों के साथ काम करने की आवश्यकता होगी और बांग्लादेश के भीतर एक नई व्यवस्था के लिए शांतिपूर्ण संक्रमण सुनिश्चित करने के लिए बांग्लादेशी सेना के साथ काम करना होगा।
अच्छी बात ये है, कि बांग्लादेश की सेना के साथ भारत के काफी मजबूत रिश्ते हैं, बांग्लादेशी सेना के ज्यादातर सीनियर अधिकारियों की ट्रेनिंग भारत में होती है और भारत के लिए यहां एक बेहतर मौका होगा और सेना के जरिए भारत कूटनीतिक फायदे उठा सकता है।
पाकिस्तान के अलावा, तुर्की लंबे समय से बांग्लादेश के अशांत जल में मछली पकड़ता रहा है। और तुर्की को काउंटर करने के लिए नई दिल्ली, खाड़ी देशों में अपने साझेदारों, खासकर यूएई और सऊदी अरब के साथ मिलकर काम करना चाहेगी, ताकि बांग्लादेश के आर्थिक स्थिरीकरण के लिए रास्ते विकसित किए जा सकें और उग्रवाद के खतरों को सीमित किया जा सके।
4- भारत को 1971 की मानसिकता से बाहर निकलने की जरूरत
भले ही यह कितना भी दर्दनाक क्यों न हो, लेकिन अब दिल्ली को 1971 में बांग्लादेश की आजादी को रोमांटिक अंदाज में बताना बंद कर देना चाहिए। बांग्लादेश अपने इतिहास की व्याख्या करने में बहुत विभाजित है, यह एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे दिल्ली अनदेखा नहीं कर सकती। बांग्लादेश में कई ताकतें, बांग्लादेश की मुक्ति पर शेख हसीना (और भारत) की बातों को नहीं मानती हैं। और यही वजह है, कि बांग्लादेश में 'इंडिया ऑउट' जैसे कैम्पेन काफी आसानी से चलाए जाते हैं।
शेख हसीना ने बांग्लादेश में 1971 के भारतीय नजरिए को और भारत की तरफ से किए गये मदद को उतारने की भरसक कोशिश की, लेकिन उसका नतीजा क्या निकला है, उसे आज की तारीख की परिस्थितियों से समझा जा सकता है।
लिहाजा, दिल्ली को इतिहास को पीछे छोड़ते हुए इन "मुक्ति-विरोधी" ताकतों से जुड़ने की चुनौती होगी। और अब जबकि, शेख हसीना का युग खत्म हो गया है, तो भारत के पास 1971 के मोहपाश में बंधे रहने की वजह भी खत्म हो गई है।
वैसे भी, भारत-बांग्लादेश संबंधों की कहानी सिर्फ 1971 के बारे में नहीं है। 1947 के विभाजन ने कभी भी संबंधों पर काली छाया डालना बंद नहीं किया है। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली और ढाका ने विभाजन की कई कड़वी विरासतों को दूर करने की कोशिश की है। लेकिन बांग्लादेश में उभरता संकट हमें याद दिलाता है कि दोनों पक्ष अभी भी समझौते के करीब नहीं हैं।
5- बांग्लादेश की वास्तविकता स्वीकार करने की चुनौती
भारतीय विदेश नीति को अब बांग्लादेश की वास्तविकता को स्वीकार करना होगा और ये भी मानना है, कि 'पड़ोसी पहले' की नीति में सिर्फ भारतीय संकल्प, सद्भावना या भारतीय रणनीति ही शामिल नहीं हो। बल्कि भारत को ये भी समझने की जरूरत होगी, कि पड़ोसी देशों की भी अपनी राजनीति और विदेश नीति है, जिसे भारत नियंत्रित नहीं कर सकता है।
लिहाजा, भारत को बदलते बांग्लादेश के साथ संबंध बनाने में विभाजन की बुरे सपने को पार करने के लिए बहुत ज्यादा रणनीतिक धैर्यता, भौगोलिक स्थिति और एक मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता की जरूरत होगी।












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