इमरान ख़ान अपनी सरकार बचाने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल कर रहे हैं?

पाकिस्तान में जहां प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव और सड़कों पर हो रही रैलियों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है वहीं प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और विपक्षी नेता धार्मिक संदर्भों और शब्दों का भी ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं.

ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान की राजनीति में धर्म कार्ड ख़ूब चलाया जा रहा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसा पहली बार हो रहा है?

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अपने रिसर्च पेपर 'पाकिस्तान के राजनीतिक विकास में धर्म का किरदार' में बीएम चंगपा लिखते हैं कि पाकिस्तान द्वी-राष्ट्रीय नज़रिए की बुनियाद पर क़ायम हुआ था, जिसने 11 अगस्त 1947 को अपनी प्राथमिकता खो दी थी, जब पाकिस्तान के संस्थापक क़ायद-ए-आज़म जिन्ना ने एक सार्वजनिक बयान में कहा था कि धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है.

बाद में अहमदिया विरोधी दंगों, संकल्प उद्देश्यों, मूल सिद्धांत समिति की रिपोर्ट और 1962 के संविधान ने पाकिस्तान के राजनीतिक विकास में मज़हब के किरदार को उजागर किया.

75 सालों से धर्म का इस्तेमाल

लाहौर यूनिवर्सिटी आफ़ मैनेजमेंट साइंस से जुड़े इतिहास के प्रोफ़ेसर अली उस्मान क़ासमी कहते हैं कि जब देश की बुनियाद इसी पर है कि मुस्लिम राष्ट्र की एक अलग पहचान है, इसके ताने-बाने चाहे सांस्कृतिक क्यों ना हो लेकिन किसी ना किसी तरह धर्म से ही जुड़े हुए हैं.

पाकिस्तान बनने के बाद हालांकि बहस इस बात पर रही कि वो कौन-सा आधार है जिस पर पाकिस्तान बना, किस आधार पर पाकिस्तान के संविधान या महासंघ का गठन किया जाए, इसकी व्याख्या किन अर्थों में की जाए?

क़ासमी कहते हैं, "पिछले 70-75 सालों से धर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है. वो मूल सिद्धांतों से शुरू हो जाता है. आगे चलते हैं तो फिर अय्यूब ख़ान के ज़माने में एक नई शक्ल अख़्तियार कर लेता है जिसमें एक नए इस्लाम की राजनीति चलती है. इसमें अय्यूब ख़ान ख़ुद को कमाल अतातुर्क के रूप में पेश करते हैं. वो एक आधुनिक इस्लाम और मुल्ला इस्लाम के बीच युद्ध छेड़कर अपनी ताक़त को मज़बूत करते हैं और धर्म को राष्ट्र निर्माण में शामिल करते हैं."

बांग्लादेश का अलगाववाद और उग्रवाद

अली उस्मान क़ासमी के मुताबिक़, बांग्लादेश के गठन के बाद एक और रुझान आता है. पाकिस्तान को उप-महाद्वीप में मुसलमानों के अपने घर के तौर पर बनाया गया था. बाद के हालात में मुसलमानों की बड़ी आबादी बांग्लादेश के रूप में अलग हो गई, उसके अलावा एक बड़ी तादाद में मुसलमानों की आबादी भारत में है जिसके बाद ये पहचान दी गई कि पाकिस्तान अच्छे मुसलमानों का घर है और इस बयान में तेज़ी देखी गई.

"1971 युद्ध में हुई हार ने पाकिस्तान की नागरिक आबादी और फ़ौज में एक मानसिक तनाव भी पैदा किया है जिसमें वो समझते थे कि इस्लाम की दूरी की वजह से अपमानजनक हार हुई क्योंकि हमने मज़हब को छोड़ दिया था."

"उन दिनों के युद्धबंदियों की आत्मकथाएं पढ़ने पर पता चलता है कि वो धर्म का अध्ययन कर रहे थे. इसलिए हम देखते हैं कि 1971 के बाद धर्म का हवाला और धार्मिक कार्ड का इस्तेमाल और अधिक मज़बूत हुआ है. चाहें फिर वो अहमदिया मुसलमानों को गैर-मुस्लिम घोषित करना हो, जुमे के दिन छुट्टी घोषित करना हो या फिर शराब पर प्रतिबंध हो."

ज़िया उल हक़ और भुट्टो

ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो
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ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो

पाकिस्तान में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को सत्ता से हटाए जाने और फिर जनरल ज़िया उल हक़ के सत्ता पर क़ाबिज़ होने के बाद पाकिस्तान में इस्लामी क़ानून बनाए गए.

डॉक्टर प्रोफ़ेसर मोहम्मद वसीम जिनकी हाल ही में 'पाकिस्तान में राजनीतिक संघर्ष' नाम से किताब प्रकाशित हुई है, कहते हैं कि जनरल ज़िया उल हक़ के आगे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के मुक़ाबले जनता की लोकप्रियता और संवैधानिक सर्वोच्चता दांव पर थी, लिहाज़ा वो मुक़ाबले में धर्म को ताक़त के तौर पर लाए. उस दौरान क़ानून बनाए गए और मॉर्शल लॉ अथॉरिटी ने उनका पालन कराया.

ज़ुल्फ़िक़ार अली के दौर में 1977 के चुनाव धांधली के कारण टल गए और उनके ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू हो गया. ज़ुल्फिक़ार अली भुट्टो के मंत्रिमंडल के सदस्य मौलाना कौसर नियाज़ी ने अपनी पुस्तक 'एंड द लाइन हैज़ बीन कट' में लिखा है कि शुद्ध राजनीतिक मतभेदों के कारण शुरू हुए इस आंदोलन ने जल्द ही एक धार्मिक रंग ले लिया.

मौलाना कौसर नियाज़ी के मुताबिक इसका श्रेय मौलाना शाह अहमद नियाज़ी की पार्टी जमीयत-उलेमा-पाकिस्तान को जाता है जिसकी वजह से इस आंदोलन का मक़सद राजनीतिक नहीं रहा बल्कि निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा (पैगंबर का शासन) हो गया.

जैसे-जैसे ये आंदोलन तेज़ होता गया, मौलाना कौसर नियाज़ी ने ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को एक सलाह दी- "जिस आंदोलन में धर्म के तत्व शामिल हो जाते हैं उसमें लोग अपनी जान की क़ुर्बानी भी देने लगते हैं."

उन्होंने अपनी सलाह को विस्तार से समझाते हुए लिखा है कि "इन धमाकेदार हालात में ज़रूरी है कि सरकार कुछ ऐसे फ़ैसले करे जिनकी वजह से इस्लाम के नारे का मालिकाना हक़ पाकिस्तानी क़ौमी इत्तेहाद (आंदोलन) के हाथ से निकलकर प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के हाथ में आ जाए."

ज़िया उल हक़
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ज़िया उल हक़

मौलाना कौसर नियाज़ी के ख़याल में राजनीतिक मक़सद हासिल करने के लिए इस तरह के ऐलान की तुरंत ज़रूरत थी लेकिन ये मामला खटाई में डाल दिया गया. इसमें देरी की वजह बताते हुए उन्होंने लिखा, "बदक़िस्मती से प्रधानमंत्री अब भी इस मसले को मौलवियालॉजी का एक मसला समझ रहे थे."

लेकिन मई के आते-आते हालात बदल गए. मौलाना कौसर नियाज़ी के मुताबिक आंदोलन तेज़ हो गया और प्रधानमंत्री के लिए राजनीतिक गुंजाइश सीमित हो गई.

कौसर लिखते हैं, "ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो कुछ लचीले हो गए और उन्हें भी इस दिशा में कुछ ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत महसूस होने लगी."

अपनी किताब में इस परिवर्तन का उल्लेख मौलाना नियाज़ी ने कुछ यूं किया है, "उन्होंने ख़ुद ही ओक़ाफ़ (इस्लामी संपत्तियों) को केंद्र के अधीन देने से लगातार टाल रहे थे और अब आंदोलन की तीव्रता को देखते हुए वो ये चाहते थे कि मैं प्रांतीय ओक़ाफ़ मंत्रालयों और उलेमाओं को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाकर मौलवी हज़रात को सरकार के हक़ में करूं."

भुट्टो ने जो घोषणाएं कीं उनके बारे में कौसर नियाज़ी ने 'और लाइन कट गई' में लिखा है- "लाहौर गवर्नर हाऊस में एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने शराब और जुए पर पाबंदी का ऐलान कर दिया."

मुशर्रफ़ का नया नज़रिया

परवेज़ मुशर्रफ़
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परवेज़ मुशर्रफ़

9/11 हमलों के बाद जब दुनियाभर के राजनीतिक और सुरक्षा हालात बदले तब अमेरिका और उसके सहयोगियों ने पाकिस्तान के पड़ोस में अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार पर हमला किया और इस दौरान जिहादी सक्रिय हो गए. लेकिन परवेज़ मुशर्रफ़ सरकार ने इसको अलग रखा.

अली उस्मान क़ासमी कहते हैं कि साल 2000 के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ का नए विचारों का नज़रिया आता है जिसने सन 71 के दौर पर ब्रैक लगा दिया और पाकिस्तान को एक वैचारिक राष्ट्र के बजाए एक राष्ट्रवादी देश बनाने का अमल शुरू किया.

क़ासमी कहते हैं, "2008 और 2013 के चुनाव देख लें. ज़रदारी और मियां नवाज़ शरीफ़ की सरकारों में मज़हबी कार्ड इस्तेमाल नहीं हुआ. एक राजनीतिक परिपक्वता नज़र आई कि पाकिस्तान में इस तरह के धार्मिक नारे लगाने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन जब ख़त्म-ए-नुबूवत (आख़िरी पैगंबर) के नारे पर तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी शुरू हुई उसके पीछे मक़सद यही था कि जो दक्षिणपंथी मतदाता हैं उन्हें तोड़ा जाए और नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाए."

इमरान ख़ान धार्मिक कार्ड वापस ले आए

जब साल 2018 में इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ पाकिस्तान सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपनी सरकार को मदीने की सरकार (पैगंबर मोहम्मद के ज़माने में) की तरह चलाने का ऐलान किया और अपने भाषणों में वो इसके हवाले भी देते रहे.

अली क़ासमी कहते हैं कि सत्ता में आने के बाद इमरान ख़ान ने धर्म को एक नए रंग और अंदाज़ में पाकिस्तान की राजनीति में खड़ा कर दिया. अब किसी पार्टी के बस में नहीं रहा और इमरान ख़ान की आलोचना ही क्यों ना हो लेकिन उनके विपक्षी भी अब रियासत ए मदीना का नारा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो गए हैं.

इस्लामी यूनिवर्सिटी इस्लामाबाद के उस्ताद हसन अल अमीन का कहना है कि इमरान ख़ान ने पहले कुछ और बयान दिए और फिर वो धर्म का इस्तेमाल करने लगे. वो कहते हैं, "यह बहुत भ्रामक है क्योंकि इसका इस्तेमाल अल्पकालिक लाभ के लिए किया जा रहा है."

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान

"बड़ा जज़्बाती नौजवान तबक़ा है और बहुत कम लोग हैं जो आलोचनात्मक नज़रिए से सोचते हैं. जब वो ऐसे नारे सुनते हैं तो इससे वो उकसावे में आते हैं कि इस वक़्त हम अमीर बिन मारूफ़ और हक़ की तरफ़ हैं जबकि दूसरी तरफ़ शैतान और धर्म के दुश्मन हैं और आख़िरकार ये बहस इस्लाम और कुफ़्र की तरफ़ चली जाती है."

हसन उल अमीन के मुताबिक़ धार्मिक पार्टियां जब धर्म का कार्ड इस्तेमाल कर रही हैं तो उनका एक एजेंडा है, उनका एक घोषणापत्र और कार्यक्रम है, जबकि पीटीआई इस मक़सद के लिए नहीं बनाई गई है और यह उनका मुख्य उद्देश्य नहीं है.

"ये लोगों को अल्पकालिक हितों और फ़ायदों के लिए उकसा रहे हैं जो कि बहुत ही हानिकारक है."

धर्म तुरूप का पत्ता है

पाकिस्तान में अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे इमरान ख़ान और विपक्ष के नेता फ़ज़लुर्रहमान धार्मिक बयानबाज़ी कर रहे हैं. क्या इसका असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है, वो भी तब जब धार्मिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक ने पिछले चुनाव में ठीक ठाक मत हासिल किए हों.

अली क़ासमी कहते हैं कि पाकिस्तान की राजनीति फिर से उसी रास्ते पर है जिसमें प्रतिस्पर्धा इस बात पर होगी कि कौन धर्म का अधिक से अधिक इस्तेमाल कर सकता है. ये कथन अगले चुनाव पर भी सही साबित होगा.

शोधकर्ता और लेखिका डॉ. आयशा सिद्दीक़ा का कहना है कि धर्म एक तुरुप का पत्ता है चाहे फिर वो किसी के भी हाथ में क्यों ना हो. एस्टेबलिशमेंट छोड़ती है ना सियासी पार्टियां छोड़ती हैं, जिसको आगे बढ़ना है इसे सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ जाता है.

"पाकिस्तान की राजनीति की ये फ़ितरत है क्योंकि धर्म के अलावा तो जनता को कुछ और दिया भी नहीं जा सकता है. जहां पाकिस्तान का गेम खेला जाता है वहां मुस्लिम लीग नवाज़, जमात ए इस्लामी और तहरीक ए इंसाफ भी धर्म का ही इस्तेमाल करती हैं."

मौलाना फ़ज़लुर्रहमान
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मौलाना फ़ज़लुर्रहमान

प्रोफ़ेसर वसीम अहमद कहते हैं कि जो तीन चार साल से रियासत-ए-मदीना का इस्तेमाल जारी है इसकी वजह ये है कि उनकी अपनी लोकप्रियता कम होती जा रही थी और इसके इस्तेमाल से उसमें कमी नहीं हुई.

दूसरी तरफ़ कुछ लोग हैं जो ये कह रहे हैं कि इस कार्ड को इस्तेमाल करके धर्म को फैला रहे हैं लेकिन कोई भी इसको गंभीरता से नहीं ले रहा है. लोग समझते हैं ये उनके अस्तित्व का मसला है इसलिए वो धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं.

"मज़हब के हवाले से जो भी भाषण दिए जा रहे हैं उसमें नीति के हवाले से कोई चीज़ नज़र नहीं आ रही है. जब तक इसकी पैरवी ना की जाए और सरकार कोई क़ानून ना पास करे उस वक़्त तक ये बस नारे हैं. इस वक़्त ये कोई सामूहिक मुद्दा नहीं है जिससे सारे मुसलमान सक्रिय हो जाएं. साफ़ नज़र आ रहा है कि ये राजनीतिक झगड़ा है और इसमें धर्म का कोई हस्तक्षेप नहीं है."

हसन अमीन कहते हैं कि "जो पॉपुलर वोट है वो धार्मिक पार्टियों को नहीं जाता है. उनके पास यक़ीनन स्ट्रीट पॉवर है और धर्म का भावनात्मक इस्तेमाल हो जाता है लेकिन पूरी बहस ही इस दिशा में मुड़ गई है, ये कहना सही नहीं है."

"जिस तरह भुट्टो या अर्दोआन ने किया, हो सकता है कि उन्हें (इमरान ख़ान) अपने बारे में ग़लतफ़हमी पैदा हो गई हो कि मैं अर्दोआन बनने की कोशिश करूं जिसने पश्चिम के ख़िलाफ़ तुर्की में ख़िलाफ़त या उसी तरह के संदर्भों का इस्तेमाल किया है. मुझे नहीं लगता कि इमरान ख़ान की इतनी पॉपुलर अपील है जो वोट में बदल जाएगी."

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास पर नज़र रखने वाले पत्रकारों और विश्लेषकों के ख्याल में राजनीतिक सरगर्मियों में धार्मिक मुद्दों का इस्तेमाल पुरानी परंपरा का सिलसिला ही है. क्या ये प्रयास अतीत से अलग होंगे. इस पर आख़िरी राय बनाना जल्दबाज़ी होगा.

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