पाकिस्तान अगर डिफॉल्ट होता है, तो जानिए क्या-क्या हो सकता है? भारत के लिए क्यों है खतरनाक
पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 4 अरब डॉलर के पास पहुंच गया है और अब पाकिस्तान के पास इतने पैसे नहीं हैं, कि वो अपना कर्ज चुका पाए।

Pakistan Default: बहुत ज्यादा संभावना है, कि पाकिस्तान इस साल मई महीने तक अपने विदेशी कर्ज को चुकाने से नाकाम हो जाएगा और वो डिफॉल्ट कर जाएगा। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 4 अरब डॉलर के आसपास हो चुका है, लिहाजा पाकिस्तान के पास दो या तीन हफ्तों के बाद विदेशों से सामान खरीदने के लिए पैसे भी नहीं होंगे, लिहाजा पाकिस्तान के लिए आने वाला वक्त काफी खराब होने वाला है। लेकिन, जैसा की संभावना है, अगर पाकिस्तान डिफॉल्ट हो जाता है, तो फिर क्या-क्या हो सकते हैं, आईये समझते हैं।

डिफॉल्ट होने का पहला दिन
जाहिर तौर पर, पाकिस्तान के डिफॉल्ट होने के पहले दिन दुनियाभर की मीडिया की सबसे अहम सुर्खियों में पाकिस्तान होगा और पाकिस्तान सरकार के लिए ये एक आपातकाली स्थिति होगी और आशंका इस बात को लेकर है, कि ऐसी स्थिति को समझने में और उन परिस्थितियों को संभालने में सरकार बड़ी गलती भी कर सकती है। पाकिस्तान के डिफॉल्ट होने के बाद इंटरनेशनल डेलवपमेंट पार्टनर्स और डोनर्स, पाकिस्तान को कुछ मदद मुहैया कराने की तरफ ध्यान देना शुरू करेंगे, हालांकि इसका ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा।

डिफॉल्ट होने का पहला हफ्ता
डिफॉल्ट होने के पहले हफ्ते में पाकिस्तान में स्थापित विदेशी कंपनियां इस गर्मी से बाहर निकलने की कोशिश में लग जाएंगी और उनकी पहली कोशिश पाकिस्तान से बाहर निकलने की होगी। वहीं, पाकिस्तान की कंपनियां बंद होने की स्थिति में पहुंचने लगेंगे। अगर कंपनियां बंद नहीं भी होती हैं, तो उनमें बड़े पैमाने पर छंटनी होंगे और पाकिस्तान आर्थिक संकट में बुरी तरह से समा जाएगा। वहीं, पाकिस्तान की सरकार, देश में मची अफरातफरी पर मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश करेगी, ताकि अपनी बदनामी से बच सके। वहीं, सरकार की दूसरी कोशिश जल्द से जल्द डेपलपमेंटल एजेंसियों से कर्ज लेने की होगी। वहीं, सामाजिक अशांति के संकेत भी दिखने शुरू हो जाएंगे। मुख्य रूप से कीमतों में अनुपातहीन वृद्धि के कारण, हर सामान के दाम में तेजी से उछाल आएगा और सरकारी मैनेजमेंट फेल होता नजर आएगा। वहीं, देश में कालाबाजारी और जमाखोरी भी आसमान पर पहुंच जाएगी, जिससे दाम की कीमत में बेतहाशा इजाफा होने के साथ साथ अराजकता की स्थिति भी बन सकती है।

डिफॉल्ट होने का पहला महीना
डिफॉल्ट होने के पहले महीने बहुत ज्यादा संभावना इस बात की होगी, कि देश में आपातकालीन स्थितियों का निर्माण होना शुरू हो जाएगा और देश में आयात बंद हो जाएगा। आयात बंद होने का मतलब होगा, विकास पर होने वाले खर्च पर प्रतिबंध और आवश्यक सार्वजनिक क्षेत्र के खर्च में कमी, व्यापार बंद होने और औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों से भारी छंटनी के साथ आर्थिक मंदी अपना गंभीर असर दिखाना शुरू कर देगी। वहीं, देश में फैली अनिश्चितता के कारण, बहुत से नागरिक अपनी बचत और निवेश को बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली से बाहर निकालने की कोशिश करेंगे, और यह कुछ वित्तीय संस्थानों के बंद होने सहित स्थिति को और भी खराब कर देगा। वहीं, सरकार पर प्रेशर इतना ज्यादा होगा, कि या तो प्रधानमंत्री या तो खुद इस्तीफा देकर बाहर जा सकते हैं, या फिर देश में सरकार चलाने के लिए वैकल्पिक शासन मॉडल खोजने की मांग होगी। और चूंकी बात पाकिस्तान की हो रही है, लिहाजा वहां सैन्य शासन आने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ऐसी स्थिति में सेना, सरकार को अपने हाथ में लेकर अपना हाथ नहीं चलाना चाहेंगी, लिहाजा जो भी नई सरकार बनेगी, या अगर मौजूद सरकार ही क्यों ना रहे, वो सामाजिक अशांति और रणनीतिक स्थिति का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हो सकती है।

डिफॉल्ट होने की पहली तिमाही
डिफ़ॉल्ट होने के कारण अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान की भयावहता का आकलन करने के मामले में पहली तिमाही काफी चुनौतीपूर्ण होगी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है, कि आर्थिक पीड़ा और सामाजिक अशांति को व्यापक रूप से महसूस किया जाएगा और कुछ राजनेताओं को इस अशांति को बढ़ाने और नकारात्मक भावना का उपयोग करके और सार्वजनिक विद्रोह को भड़काने का मौका होगा, जिसका फायदा वो उठाने की कोशिश जरूर करेंगे, लिहाजा देश में हिंसक प्रदर्शन होने की आशँका काफी बढ़ सकती है। श्रीलंका ने भी हिंसक प्रदर्शन देखे हैं, लेकिन पाकिस्तान में ये स्थिति काफी विकराल हो सकती है। वहीं, देश में जिन लोगों के पास विदेशी करेंसी होगी, वो देश से बाहर निकलने की सोचेंगे, वहीं, कीमतें नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी और पहली तिमाही में रुपये में काफी गिरावट आ जाएगी।

डिफॉल्ट होने का पहला साल
डिफॉल्ट होने के एक साल होते होते पाकिस्तान की जीडीपी काफी कम हो जाएगी। जबकि कुछ उद्योग और सेवाएं अपनी गतिविधियों को फिर से शुरू करने की तरफ बढ़ेंगी। हालांकि, आयात पर निर्भर क्षेत्रों को अभी और इंतजार करना होगा। ऊर्जा की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि के कारण, उत्पादन लागत बहुत अधिक हो जाएगी और कई सेक्टर के काम काज पूरी तरह से बंद हो चुके होंगे। पहले वर्ष के भीतर, सरकार या यहां तक कि शासन मॉडल में भी परिवर्तन आ सकता है। आर्थिक शासन प्रणाली को फिर से तैयार करने का समय तो अभी भी आ गया है, जिसके बिना संकट से बाहर निकलना असंभव होगा। पाकिस्तान को इस तरह के संकट से उबारने की कुछ संभावनाओं और रास्तों को देखकर अंतर्राष्ट्रीय साझेदार शायद वापस पाकिस्तान पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर देंगे। हालांकि, यह समर्थन बड़ी शर्तों के साथ होगा, जिसमें मित्र देशों की शर्तें भी शामिल हो सकती हैं। पाकिस्तान को फिर से बहुत कम छूट के साथ नये कर्ज मिल सकते हैं।
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डिफॉल्ट होने पर पहली पीढ़ी पर असर
पाकिस्तान की यह पहली पीढ़ी हो सकती है, जो पाकिस्तान को डिफॉल्ट होता हुआ देखेगी। लिहाजा, पाकिस्तान की नई पीढ़ी पर इसका गंभीर असर पड़ेगा। पाकिस्तान के अंदर आतंकवाद में भारी उछाल आ सकता है और लोगों के हाथों में नौकरी नहीं होने की वजह से, वो गलत रास्ते की तरफ मुड़ सकते हैं। यह उन युवाओं के लिए विशेष रूप से हानिकारक होगा, जो नौकरी, बाजार या व्यवसाय या उद्यमिता में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। वे सीमाओं से परे देखना शुरू कर देंगे, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान में प्रतिभाओं का पलायन शुरू हो जाएगा। एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अगर पाकिस्तान डिफॉल्ट होता है, तो ये पूरी पीढ़ी ही तबाही के रास्ते पर आगे बढ़ सकती है, लिहाजा कई एक्सपर्ट्स का मानना है, कि भारत को काफी सतर्क रहना होगा, ताकि पाकिस्तान अगर बर्बाद हो, तो उसका असर भारत की तरफ ना आए।












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