चीन और रूस का सऊदी को मिला साथ, जानिए अमेरिका को अपना पॉवर कैसे दिखा रहे हैं प्रिंस सलमान?

सऊदी अरब, ईरान के साथ रिश्ते सुधार रहा है और अमेरिका को उसने पूरी तरह से दरकिनार कर रखा है, वहीं चीन के साथ स्थानीय मुद्रा में कारोबार पर विचार अमेरिका के लिए बड़े संकेत हैं।

रियाद/वॉशिंगटन, मई 08: पिछले साल 20 जनवरी को जब जो बाइडेन ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी, उसके बाद उन्होंने कई वैश्विक नेताओं से बात करनी शुरू की। जिसमें कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन और भारत के राष्ट्र प्रमुख थे। लेकिन, जो बाइडेन ने यह कहते हुए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात करने से इनकार कर दिया था, कि प्रिंस सलमान सऊदी अरब के प्रमुख नहीं हैं। एक साल बीत चुके हैं और पिछले दो महीने में राष्ट्रपति बाइडेन ने कई बार प्रिंस सलमान से बात करने की कोशिश की है, लेकिन प्रिंस सलमान राष्ट्रपति बाइडेन का फोन नहीं उठा रहे है। ये वक्त वक्त की बात है, लेकिन सऊदी क्राउन प्रिंस किस तरह से अमेरिका को अपना पॉवर दिखा रहे हैं, आइये समझते हैं।

सीआईए प्रमुख का सऊदी दौरा

सीआईए प्रमुख का सऊदी दौरा

आज से तीन हफ्ते पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी के प्रमुख विलियन बर्न्स ने सऊदी अरब का दौरा किया था और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात की थी और तीन हफ्ते बाद इस गुरुवार को तेल उत्पादक देशों ओपेक प्लस की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक बैठक हुई, जिसमें ओपेक+ बैठक ने इस बात पर संतोष जताया, कि 'तेल-बाजार के बुनियादी सिद्धांतों और दृष्टिकोण पर आम सहमति एक संतुलित बाजार की ओर इशारा करती है'। यानि, सीआईए प्रमुख जिन मांगों के लिए सऊदी अरब पहुंचे थे, उन मांगों पर सऊदी अरब ने विचार तक नहीं किया। तेल उत्पादक देशों की बैठक में फैसला लिया गया, कि कच्चे तेल का प्रोडक्शन नहीं बढ़ाया जाएगा, जो अमेरिका के लिए बहुत बड़ा झटका है और रूस को बहुत बड़ी मदद, जो प्रिंस सलमान ने कर दी है।

अमेरिका को वैल्यू नहीं दे रहा सऊदी

अमेरिका को वैल्यू नहीं दे रहा सऊदी

द वॉल स्ट्रीट जर्नल के पूर्व प्रकाशक, करेन इलियट हाउस के अनुसार, सीआईए डायरेक्टर लिलियन बर्न्स प्रिंस मोहम्मद के साथ "संभोग नृत्य" के लिए सऊदी अरब गए थे, अर्थात्, प्रिंस सलमान से ये अनुरोध करने कि 'उत्पादन बढ़ाने के लिए एक नई तेल-सुरक्षा-सुरक्षा रणनीति पर सहयोग करना चाहिए और यूरोपीय देशों को ऊर्जा की कमी से बचाएं।" लेकिन, प्रिंस सलमान ने सीआईए डायरेक्टर की बातों को मानने से इनकार कर दिया। विलियन बर्न्स ने सऊदी अरब का दौरा ठीक उस वक्त किया था, जब सऊदी खुफिया प्रमुख और ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप प्रमुख के बीच बगदाद में सऊदी-ईरानी रिश्ते को सामान्यीकरण करने के लिए पांचवें दौर से बैठक होने वाली थी। इस बैठक की मध्यस्थता इराक के प्रधानमंत्री मुस्तफा अल-कदीमी कर रहे थे और सऊदी राज्य मीडिया से कहा कि, 'सऊदी अरब और ईरान के हमारे भाई वर्तमान क्षेत्रीय स्थिति की मांग के अनुसार एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ बातचीत कर रहे हैं और हम आश्वस्त हैं कि सुलह निकट है'।

ईरान से रिश्ते सुधारने का मतलब

ईरान से रिश्ते सुधारने का मतलब

सऊदी अरब ईरान के साथ रिश्ते सुधार रहा है और अमेरिका को उसने पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है, यहां तक की सलाह-मशविरा भी नहीं। वहीं, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद से संबंधित नोरन्यूज़ ने 24 अप्रैल को यह भी बताया कि, दोनों देशों के बीच पांचवें दौर की वार्ता "रचनात्मक" थी और वार्ताकार द्विपक्षीय संबंधों को फिर से शुरू करने के तरीके के बारे में "एक स्पष्ट तस्वीर खींचने" में कामयाब रहे हैं और, " अब तक के रचनात्मक द्विपक्षीय संवाद को देखते हुए निकट भविष्य में ईरानी और सऊदी शीर्ष राजनयिकों के बीच बैठक की संभावना है'। यानि, सऊदी अरब का ईरान से रिश्ते सुधारने की कोशिश करना, तेल उत्पादन नहीं बढ़ाकर रूस की बात मानना और चीन के साथ स्थानीय करेंसी में व्यापार समझौते के लिए तैयार होकर सऊदी अरब ने साफ तौर पर वॉशिंगटन की चिंताएं बढ़ा दी हैं और नये जियोपॉलिटिकल दुनिया की एक नई मानचित्र बनानी शुरू कर दी है।

अब्राहम समझौते में शामिल होगा सऊदी?

अब्राहम समझौते में शामिल होगा सऊदी?

परमाणु समझौते पर जिद्दी रूख बनाए रखने की वजह से अमेरिका के पास अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ ईरान विरोधी मोर्चे को पुनर्जीवित करने के डिफ़ॉल्ट विकल्प के अलावा कोई और ऑप्शन नहीं है और अमेरिका को उम्मीद है कि सऊदी अरब अब्राहम समझौते में शामिल होगा। इस बीच तेल की कीमतों का मुद्दा फिर सेंटर में आ गया है। दरअसल, उच्च तेल की कीमतों का मतलब रूस के लिए उच्च आय है। आसमान छूती कीमतों के परिणामस्वरूप रूस की तेल और प्राकृतिक गैस की बिक्री 2021 के शुरुआती पूर्वानुमानों से कहीं ज्यादा है, जो रूस के कुल बजट का 36 प्रतिशत है। और रूस का राजस्व, प्रारंभिक योजनाओं से 51.3% अधिक हो गया, जो कुल मिलाकर 19 अरब डॉलर है। यानि, रूसी अर्थव्यवस्था को चरमराने के लिए अमेरिकी प्रशासन की सबसे अच्छी योजनाएं भी फेल साबित हो रही हैं। इसी तरह, तेल की ऊंची कीमत भी राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए एक घरेलू मुद्दा है। सबसे बढ़कर, जब तक यूरोप को अन्य तेल स्रोत नहीं मिलते, वह रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा।

क्या है प्रिंस सलमान का एजेंडा?

क्या है प्रिंस सलमान का एजेंडा?

हालांकि, प्रिंस सलमान का एक अलग एजेंडा है, क्योंरि संभावना यही है, कि प्रिंस सलमान अभी कई दशकों तक सऊदी अरब पर शासन करेंगे। लिहाजा, सऊदी अरब क्राउन प्रिंस अपने लिए एक "पावर बेस" बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसीलिए उन्होंने सऊदी अरब 2030 प्रोग्राम भी लांच किया था, जिसमें सऊदी अरब के छात्रों को अलग अलग देशों की संस्कृति सिखाने के साथ साथ उन्हें मजहबी कट्टरता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है और सऊदी अरब बहुत जल्द स्पेस प्रोग्राम भी लांच करने वाला है, ताकि आने वाले वक्त में वो स्पेस टेक्नोलॉजी में पीछे ना रहे। और प्रिंस सलमान की वजह से ही सऊदी अरब के 70 साल के उम्र के लोग और 35 साल की उम्र के लोगों की जीवनशैली में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है और प्रिंस सलमान बहुत हद तक देश के युवाओं को यह समझाने में कामयाब रहे हैं, कि देश का भविष्य टेक्नोलॉजी के विकास में है।

रूस के खिलाफ जाने से इनकार

रूस के खिलाफ जाने से इनकार

यानि, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अगर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के खिलाफ जाकर रूस को 'सजा' देने से इनकार कर दिया है, वहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के 2 अरब डॉलर के फंड को सऊदी अरब में निवेश करने की इजाजत देकर प्रिंस सलमान ने साफ तौर पर बाइडेन प्रशासन को स्पष्ट संकेत दे दिए हैं, कि उस अपमान को नहीं भूले हैं, जो बाइडेन ने राष्ट्रपति बनने के बाद का था। अमेरिका भी उसी तरह से जवाब देने की कोशिश कर रहा है, जिसमें सऊदी अरब को हथियार बेचने पर प्रतिबंध लगाना और हूती विद्रोहियों के सऊदी अरब पर हमले को लेकर खास प्रतिक्रिया नहीं देना शामिल है। और एक्सपर्ट्स का यहां तक कहना है, कि भले ही बाइडेन प्रशासन अब सऊदी अरब के लिए नई सुरक्षा गारंटी के लिए कांग्रेस की मंजूरी प्राप्त करने में सक्षम हो, लेकिन प्रिंस मोहम्मद को प्रभावित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि दिन के अंत में उच्च तेल की कीमतें सऊदी बजट को भी बढ़ावा देती हैं।

चीन के साथ सऊदी का गठबंधन

चीन के साथ सऊदी का गठबंधन

बाइडेन प्रशासन के लिए सबसे बड़ा झटका चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सऊदी अरब का दौरा होने वाला है और बाइडेन प्रशासन को शी जिनपिंग का सऊदी दौरा सबसे ज्यादा परेशान करने वाला है। चीन की मीडिया भी इसकी पुष्टि कर चुकी है, कि चीन में कोविड काबू में आने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सऊदी अरब की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, वहीं, अंदरखाने रियाद और बीजिंग के बीच कुछ खास बात भी चल रही है, जिसका ऐलान शी जिनपिंग के रियाद पहुंचने के बाद किया जाएगा। इसके साथ ही, चीन और रियाद के बीच लोकल करेंसी में तेल व्यापार पर सहमति बनाई जा रही है, यानि चीन अब सऊदी अरब से तेल खरीदने के बाद उसे अपनी मुद्रा युआन में भुगताव करेगा और सऊदी अरब जो सामान चीन से खरीदेगा, उसका भुगतान वो अपनी करेंसी में करेगी। ये व्यवस्था लागू होते ही तेल बाजार एक बड़े बदलाव की तरफ मुड़ जाएगा और मिडिल ईस्ट समेत खाड़ी देशों में चीन के प्रभाव को खाफी ज्यादा मजबूत कर देगा, क्योंकि कई और देश और अंतरराष्ट्रीय निवेशक, अपनी अपनी अपनी मुद्रा में लेनदेन करने के लिए राजी हो सकते हैं, जिसका सीधा असर अमेरिकी डॉलर पर पड़ेगा।

परमाणु टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ रहा सऊदी?

परमाणु टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ रहा सऊदी?

चीन की मुद्रा युआन में तेल बेचने को लेकर सऊदी अरब की दलील है कि, चूंकी सऊदी अरब में कई विशालकाय चीनी प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, तो उसके लिए चीनी ठेकेदारों को चीन की ही मुद्रा में भुगतान करने में आसानी होगी, लेकिन वाशिंगटन के लिए इसका मतलब यह है, कि युआन से कारोबार होने पर संवेदनशील या संदिग्ध ट्रांजेक्शन की जानकारी उसे हासिल नहीं हो पाएगी और उसके लिए सऊदी अरब में चीनी प्रोजेक्ट्स पर निकरानी रखना काफी मुश्किल हो जाएगा। वहीं, लगातार अमेरिकी रिपोर्टें हैं, कि चीन के समर्थन से सऊदी अरब परमाणु टेक्नोलॉजी की खोज को बढ़ाने के लिए अल-उला के पास एक नई यूरेनियम प्रसंस्करण सुविधा का निर्माण कर सकता है। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स में ये भी आशंका जताई गई है, कि आखिर सऊदी अरब ने पाकिस्तान को एक झटके में आठ अरब डॉलर का कर्ज कैसे दे दिया और अचानक पाकिस्तान के प्रति सऊदी अरब उदार कैसे हो गया? वॉशिंगटन भी इसपर निगाह बनाए हुआ है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित चाइना ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रैकर के अनुसार, सऊदी अरब चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का एक केंद्रीय स्तंभ है और चीनी निर्माण परियोजनाओं के लिए शीर्ष तीन देशों में शुमार है। यानि, आने वाले वक्त में सऊदी अरब विश्व पॉलिटिक्स के साथ साथ एशिया की राजनीति को भी गंभीर तौर पर प्रभावित करने वाला है और भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं।

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