पाकिस्तान चीन और अमरीका के बीच कैसे उलझा
अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर नज़र रखने वाले कई इतिहासकारों का मानना है कि पाकिस्तान 1947 में जब अस्तित्व में आया तब से लेकर आज तक कई रणनीतिक चूक कर चुका है.
इन चूकों में 1971 में भारत पर हमले को पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल माना जाता है. यह इतनी बड़ी भूल थी कि पाकिस्तान का विभाजन हो गया और बांग्लादेश नाम के एक नए देश का जन्म हुआ.
पाकिस्तान की कई और ऐसी भूलें हैं जिन पर कम ही बात होती है. 1971 में भारत के साथ युद्ध के बाद पाकिस्तान ने चीन के साथ गठजोड़ किया.
पाकिस्तान ने चीन से दोस्ती ग़रीबी और रणनीतिक योजनाओं को ध्यान में रखकर की थी. पाकिस्तान का चीन के क़रीब जाने का ये तर्क भी था कि उसकी सुरक्षा के लिए यह ज़रूरी है. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के क़रीब आकर पाकिस्तान ने अपना भला से ज़्यादा बुरा किया है.
चीन के उभार और पाकिस्तान से क़रीब आने की कहानी साथ-साथ चली है. पाकिस्तान के साथ चीन की क़रीबी में भारत एक बड़ी वजह रहा है.
चीन भी भारत के साथ युद्ध कर चुका था और दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है.
ये सही बात है कि चीन ने 1962 में भारत पर हमला किया था लेकिन आज की तारीख में दोनों देशों के बीच समृद्ध व्यापारिक संबंध हैं.
पाकिस्तान को ये भी लगता है कि चीन से क़रीबी अमरीका पर उसकी निर्भरता कम करेगी क्योंकि अमरीका भारत से भी दोस्ती रखना चाहता है. पाकिस्तान को ये भी लगता है कि चीन से दोस्ती के कारण उसकी अर्थव्यवस्था की हालत ठीक होगी.
पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक अली मानते हैं कि पाकिस्तान ने बनने के बाद से ही कई ऐसी ग़लतियां की हैं जिनसे आज तक बाहर नहीं निकल पाया है.
वो कहते हैं, ''नेहरू ने अमरीका को ख़ारिज किया तो जिन्ना ने अमरीका को इसलिए अपनाया कि कुछ फंड हासिल होगा. जिन्ना को लगा कि अमरीका ही एक ऐसा देश है जो पाकिस्तान की मदद कर सकता है लेकिन सबसे बड़ी ग़लती यही थी कि पाकिस्तान को शीत युद्ध के दौर में नेहरू की तरह किसी भी पक्ष में नहीं जाना चाहिए था.''
मुबारक अली कहते हैं, ''इसके बाद पाकिस्तान ने 1965 में भारत के साथ जंग में अमरीका पर भरोसा किया कि मदद मिलेगी लेकिन अमरीका तटस्थ रहा. 1971 में भी भारत के साथ जंग हुई और एक बार फिर पाकिस्तान को लगा कि अमरीका मदद करेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अमरीका अगर मदद करता तो पाकिस्तान का विभाजन नहीं होता लेकिन बांग्लादेश बन गया.''
अब सवाल उठ रहे हैं कि पाकिस्तान को चीन की दोस्ती से क्या हासिल हुआ?
चीन के वफ़ादार सहयोगी कंबोडिया, ईरान, म्यांमार और उत्तर कोरिया रहे हैं लेकिन इनके साथ कोई गरिमापूर्ण संबंध नहीं रहे हैं. चीन और रूस के संबंध अधिनायकवादी सत्ता के चश्मे से देखा जाता है. दुनिया भर के कई विश्लेषक मानते हैं कि चीन का अपने सहयोगियों के साथ अवसरवादी और चालाकी भरा होता है.
चीन से पाकिस्तान को जो आर्थिक मदद मिली है उसकी भारी क़ीमत उसे चुकानी पड़ी है. पाकिस्तान ने चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) परियोजना के तहत 60 अरब डॉलर का निवेश किया है लेकिन इसकी बड़ी रक़म क़र्ज़ के तौर पर है और इसकी ब्याज दर सात फ़ीसदी है.
संभव है कि पाकिस्तान इन क़र्ज़ों को चुकाने में ख़ुद को असमर्थ पाए.
श्रीलंका में चीन ने इतना निवेश किया कि श्रीलंका ने क़र्ज़ चुकाने में ख़ुद को असमर्थ पाया और अंततः उसे क़र्ज़ के बदले 99 सालों के लीज़ पर हम्बनटोटा पोर्ट ही सौंपना पड़ा.
इसी तरह की आशंका पाकिस्तान के साथ जताई जा रही है. अब श्रीलंका की सरकार को उन ग़लतियों का अहसास है और वो पिछली सरकारों की तरह ग़लतियों से बचना चाह रही है.
मुबारक अली मानते हैं कि पाकिस्तान ने पहले अमरीका पर भरोसा किया लेकिन वहां से कुछ नहीं मिला. वो कहते हैं, ''हर मुल्क अपने इतिहास से सबक़ लेता है लेकिन पाकिस्तान ने सबक़ नहीं लिया. अमरीका पर जो निर्भरता थी वो अब चीन पर आ टिकी है. चीन पर जिस क़दर की निर्भरता है वो ख़तरनाक स्तर पर पहुंच गई है. यहां तक कि चीन पर पाकिस्तान में आम लोगों का भरोसा लगातार कम हो रहा है. किसी भी मुल्क को अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं डालने चाहिए लेकिन पाकिस्तान ने चीन के साथ ऐसा ही किया है. हमने अफ़ग़ानिस्तान में रूस के ख़िलाफ़ तालिबान को खड़ा किया और अब हमारे लिए ही ये नासूर बन गए हैं.''
पाकिस्तान में चीन निवेश इसलिए भी कर रहा है क्योंकि उसके व्यापक हित जुड़े हुए हैं. चीन ने दक्षिणी-पश्चिमी पाकिस्तान जिवानी में एक नेवी बेस बनाने में भी दिलचस्पी दिखाई है. जिवानी ग्वादर पोर्ट से 80 किलोमीटर दूर है. यह ईरान की सीमा से महज़ 15 मिल की दूरी पर है. और यह महज़ संयोग नहीं है कि ईरानी पोर्ट चाबाहर को ईरान, भारत और अफ़ग़ानिस्तान मिलकर विकसित कर रहे हैं.
जिवानी और चाबाहर की दूरी एक पत्थर फेंकने भर की है. जिवानी बेस चीन ने बना दिया तो वहां चीनी नेवी के पोत फ़ारस की खाड़ी और हिन्द महासागर में आसानी से आवाजाही कर सकेंगे.
पाकिस्तान में चीन की सैन्य मौजूदगी ख़ुद पाकिस्तान के भी हक़ में नहीं होगा. कहा जाता है कि इससे पाकिस्तान की संप्रभुता ख़तरे में आएगी.
अगर पाकिस्तानी ज़मीन पर चीन की सेना मौजूद रहती है तो चीन और भारत से टकराव की स्थिति में पाकिस्तान भी एक टारगेट रहेगा.
उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान में चीन की बढ़ती दिलचस्पी से भारत पहले से ही सतर्क है. ईरान में अगर चाबाहर पोर्ट भारत विकसित कर लेता है तो अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में एंट्री आसान हो जाएगी. ज़ाहिर है पाकिस्तान में चीन की बढ़ती मौजूदगी से इलाक़े में टकराव की आशंका बढ़ेगी.
पाकिस्तान चाहता है कि वो एक साथ चीन और अमरीका दोनों को साधे लेकिन ऐसा संभव नहीं है. पाकिस्तान से अमरीका का हित अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को ख़त्म करने से जुड़ा था लेकिन ये संभव नहीं हो पाया.
ट्रंप प्रशासन के आने के बाद से पाकिस्तान पर अमरीका का भरोसा और कम हुआ है. अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का समर्थन देने का आरोप पाकिस्तान पर लगाता रहा है. इसी को देखते हुए अमरीका ने पाकिस्तान की आर्थिक और सैन्य मदद पूरी तरह से बंद कर दी.
अमरीका पाकिस्तान को हर साल क़रीब 1.3 अरब डॉलर की मदद देता था.
लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को चीन के साथ क़रीबी दोस्ती के बावजूद अलग-थलग करने में थोड़ी बहुत कामयाबी हासिल की है.
पिछले दशक से भारत और अमरीका के संबंध इस मुकाम पर हैं कि अगर भारत और पाकिस्तान में कोई टकराव की स्थिति बनती है तो भारत अमरीका से मदद मांग सकता है लेकिन पाकिस्तान अभी ऐसी स्थिति में नहीं है.
क्या पाकिस्तान अब इस स्थिति में है कि वो चीन की हर मांग न माने?
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद ने चीन में वीगर मुसलमानों के अत्याचार पर बयान जारी किया तो लगभग सभी मुस्लिम देशों ने चीन का समर्थन किया और कहा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ चीन का यह ज़रूरी क़दम है. इसमें पाकिस्तान भी शामिल था.
इमरान ख़ान का अमरीकी दौरा और ट्रंप से मुलाकात इसी उम्मीद पर थी कि पाकिस्तान अमरीका के साथ अपने संबंधों को पुनर्जीवित कर सकेगा. पाकिस्तान अमरीका का सहयोगी 1947 में बनने के बाद ही बन गया था.
ऐसा इसलिए भी था कि जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका की साझेदारी को ख़ारिज कर दिया था. भारत सोवियत संघ के क़रीब रहा और पाकिस्तान ने अपना नफ़ा-नुक़सान देख ख़ुद को अमरीका के साथ रखा.
1954 से 1965 के बीच पाकिस्तान को अमरीका से एक अरब डॉलर के हथियार और रक्षा सहयोग मिले.
उस वक़्त यह बहुत बड़ी रक़म थी. सोवियत संघ ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो दोनों देश और क़रीब आए. इसराइल और मिस्र के बाद पाकिस्तान अमरीका की मदद पाने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया था.
पाकिस्तान और अमरीका में इतना कुछ होने के बावजूद अविश्वास कैसे बढ़ा?
1955 में पाकिस्तान ने सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन (CENTO) जॉइन किया था. अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइज़नहावर ने नेटो की तर्ज़ पर इसका गठन किया था.
पाकिस्तान और भारत में 1965 और 1971 में जब युद्ध हुए तो पाकिस्तान ने अमरीका से मदद की मांगी. लेकिन अमरीका ने ख़ुद को तटस्थ रखा. पाकिस्तान के नेताओं को लगा कि यह धोखा है. इसके बाद से ही दोनों देशों में कड़वाहट बढ़ने लगी.
पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने भी अमरीका से कड़वाहट बढ़ाने में भूमिका निभाई. पाकिस्तान ने 1955 में ही परमाणु कार्यक्रम शुरू कर दिया था और वो आइजनहावर प्रशासन में शांति के लिए परमाणु कार्यक्रम में शामिल हुआ था.
एक दशक बाद पाकिस्तान ने अमरीका की मदद से पहले परमाणु रिएक्टर की स्थापना की. पाकिस्तान ने अपनी महत्वकांक्षा छुपाए रखी कि वो परमाणु हथियार हासिल करना चाहता है. लेकिन 1965 में चीज़ें बदल गईं. इसी साल पाकिस्तानी नेता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने घोषणा की और कहा, ''अगर भारत बम बनाता है तो हम घास खाएंगे और यहां तक कि भूखे रह सकते हैं लेकिन हम अपना बम बनाएंगे. हमलोग के पास कोई और विकल्प नहीं रहेगा.''
पाकिस्तान ने परमाणु बम बना लिया लेकिन अफ़ग़ानिस्तान से तालिबान ख़त्म नहीं हुआ. यहां तक कि ओसामा बिन-लादेन को भी अमरीका ने पाकिस्तान में ही पकड़ा. आज पाकिस्तान अपने बनने के बाद से सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहा है लेकिन न उसे उबारने के लिए अमरीका आगे आ रहा है और न ही उसका सदाबहार दोस्त चीन.












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