कोयला कैसे बनता है ? जानिए जो कोयले इस्तेमाल होते हैं वह कितने पुराने हैं
कोयला एक जीवाश्म ईंधन है। यह करोड़ों वर्षों में पौधों से तैयार होते हैं। इसकी एक लंबी प्रक्रिया है। आज की वास्तविकता यह है कि यह ग्लोबल वार्मिंग का बहुत बड़ा कारण है, जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है।

भारत में अभी भी ऊर्जा कंपनियां बिजली बनाने के लिए मुख्य तौर पर कोयले पर ही निर्भर हैं। यह जीवाश्म ईंधन है, इसलिए इनकी मात्रा लगातार घटती जा रही है। यह पृथ्वी पर सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा की तरह असीमित नहीं हैं। हम जिस रफ्तार में कोयले की खपत करते जा रहे हैं, एक दिन पृथ्वी पर मौजूद इसका स्टॉक खत्म हो जाएगा। यही नहीं यह ग्लोबल वॉर्मिंग का भी बहुत बड़ा कारण है, जिसके चलते जलवायु परिवर्तन हो रहा है। लेकिन, यहां हम यह जानेंगे कि धरती पर जो कोयला मौजूद है, वह कैसे बना है? इसके निर्माण में कितने साल लगे हैं?
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पौधों का जीवाश्म है कोयला
इंसान हजारों वर्षों से कोयला जला रहा है। औद्योगिक क्रांति के बाद से कोयला ऊर्जा का बहुत बड़ा स्रोत बना हुआ है, तो यह ग्लोबल वार्मिंग का भी बहुत बड़ा कारण भी बन चुका है। लेकिन, प्रश्न है कि कोयला बनता कैसे है ? यह जमीन के अंदर खदानों में कहां से आया है ? मूल बात यह है कि जो भी कोयले का हम इस्तेमाल करते हैं, वह लाखों वर्ष पहले पौधे रहे होंगे। यह धरती के अंदर दबे-दबे इन लाखों वर्षों में जीवाश्म में तब्दील हो चुके हैं। कोयला तब बनता है जब पौधे दलदली जमीन में दबकर, जमकर और गर्मी की वजह से चट्टानों में बदल जाते हैं, इस प्रक्रिया को भू-विज्ञान की भाषा में कोलिफिकेशन कहते हैं।

कोयले में बीते जमाने की पूरी लाइफ-हिस्ट्री मिलती है
लाइव साइंस के मुताबिक केंटकी यूनिवर्सिटी के एक पेट्रोलॉजिस्ट जेम्स होवर ने बताया, 'मूल रूप से कोयला जीवाश्म बन चुके पौधे हैं। ' उनका कहना है कि इस तरह के जीवाश्व पौधों के निर्माण में 'जियोलॉजी की कई दुर्घटनाएं ' शामिल होती हैं। कोयला निर्माण की प्रक्रिया जीवित पौधों से शुरू होती है। होवर ने बताया, 'जब पेड़ जिंदा ही रहते हैं, इन्हें जलने से नुकसान हो सकता है या कीड़ों द्वारा तबाह हो सकते हैं।' 'कोयले की रिकॉर्ड में ये सभी चीजें दिखेंगी।' उनके अनुसार कोयले में पराग, पत्तियों, जड़ों और यहां तक कि कीड़ों के मल तक के निशान मिलते हैं। इनके सहारे प्राचीन इकोसिस्टम को भी रिकंस्ट्रक्ट किया जा सकता है। जबकि, आग के निशान प्राचीन जलवायु का सुराग देते हैं।

कोयला निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है
लेकिन, पहाड़ी ढलानों के पौधे या मरुस्थल में जो पौधे होते हैं, उनसे कोयला निर्माण की संभावना नहीं के बराबर होती है, जबतक कि उन्हें भी दलदली जमीन ना मिल जाए। क्योंकि, उनके लिए वह उपयुक्त जलवायु नहीं है। होवर ने कहा, 'हम यहां जितने भी कोयले देखते हैं, उनमें से अधिकतर, ज्यादा से ज्यादा दलदली जगह से आए हुए हैं।।' क्योंकि एक पौधा जब गीली जमीन में मरते हैं, तो वह पानी में डूबे रहते हैं और ऑक्सीजन से सुरक्षित हो जाते हैं। इसका परिणाम ये होता है कि यह उतनी जल्दी नष्ट नहीं होते, जितनी जल्दी सूखी सतह पर हो सकते हैं। इसके बजाए दलदल के गीले तल में यह नरम कोयले की सतह में बदलने लगते हैं। यही नरम कोयला (peat) कई बार कोयले का पूर्ववर्ती होता है।

'कोयले की हर परत में हजारों वर्षों का इतिहास दबा है'
नरम कोयला (peat)का भी अपना एक लंबा इतिहास है। यह कीड़ों, फंगी, बैक्टीरिया का घर बन जाता है; और यह सब मिलकर पौधों को तोड़ने में मदद करते हैं, यह प्रक्रिया पीटिफिकेशन कहलाती है। उनका कहना है, 'कोयले की किसी भी परत को जो हम देखते हैं, वह दसों या सैकड़ों या हजारों वर्षों में तैयार होता है।' कोयले में पानी के माध्यम से या केमिकल रिएक्शन से खनिज भी जमा हो जाते हैं।

सबसे नया कोयला भी 6 करोड़ साल पुराना है
धरती पर उपलब्ध ज्यादातर कोयला 30 करोड़ वर्ष से लेकर 6 करोड़ वर्ष तक पुराने हैं। कोयले के ठोस बनने में दबाव का बहुत ही बड़ा रोल है। कोयले से कितनी ऊष्मा पैदा होती है या ऑक्सीजन और हाइड्रोजन निकलता है, यह निर्भर करता है पौधे में मौजूद कार्बोहाइड्रेट या सेल्युलोज जैसी चीजों पर। अगर बिजली उत्पादन के बाकी स्रोतों की तुलना कोयले से करें तो बाकी ग्लोबल वार्मिंग के लिए बहुत ही कम जिम्मेदार हैं।

ग्लोबल वार्मिंग का बहुत बड़ा कारण है कोयला
अमेरिका के ऊर्जा विभाग के मुताबिक आमतौर पर कोयला प्राकृतिक गैस की तुलना में प्रति किलोवॉट घंटा दोगुना कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करता है। वहीं पवन ऊर्जा की बात करें तो उसके मुकाबले यह (कोयला) 90 गुना ज्यादा Co2 उत्पादित करता है। होवर ने कहा, 'कोयले से उत्सर्जन और कोयले से जुड़ी औद्योगिक प्रक्रियाएं निश्चित तौर पर जलवायु के लिए सही नहीं है.........लेकिन, सच्चाई है कि हम उसी के साथ जी रहे हैं।'
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