अमेरिका से पंगा लेकर रूस की मदद, जानिए 'दोस्ती' निभाने किस हद तक आगे बढ़ चुकी है मोदी सरकार?

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत के दौरे पर हैं और रूस की तरफ से भारत के सामने ‘रुपया-रूबल’ व्यापार का प्रस्ताव रखा गया है और मॉस्को का यह प्रस्ताव नई दिल्ली को पश्चिमी देशों के साथ टकराव की राह पर ले जाएगा...

मॉस्को/नई दिल्ली, अप्रैल 01: अमेरिकी धमकियों को नजरअंदाज करते हुए भारत ने यूक्रेन युद्ध पर न्यूट्रल पॉलिसी के आधार पर ही आगे बढ़ने का फैसला किया है। लेकिन, भारत अपने सबसे विश्वसनीय 'दोस्त' रूस की पर्दे के पीछे से काफी मदद कर रहा है और भारत रूस के साथ रुपया-रूबल व्यापार समझौते पर विचार कर रहा है, जो अमेरिका के लिए बहुत बड़ा झटका है। हालांकि, अमेरिका और पश्चिमी देश इसके लिए भारत की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। ऐसे में आईये जानने की कोशिश करते हैं, कि दोस्ती निभाने के लिए मोदी सरकार किस हद तक आगे बढ़ चुकी है।

पश्चिम से टकराने को तैयार भारत?

पश्चिम से टकराने को तैयार भारत?

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत के दौरे पर हैं और रूस की तरफ से भारत के सामने 'रुपया-रूबल' व्यापार का प्रस्ताव रखा गया है और मॉस्को का यह प्रस्ताव नई दिल्ली को पश्चिमी देशों के साथ टकराव की राह पर ले जाएगा, लेकिन, रूस का यह एक ऐसा प्रस्ताव है, जो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ भारतीय अर्थव्यवस्था को बफर करने में मदद कर सकता है। भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के कड़े दबाव के बावजूद रूस के साथ अपने द्विपक्षीय व्यापार को जारी रखने के लिए हरी झंडी दे चुका है। भारत अपने हथियारों के लिए रूस पर बहुत अधिक निर्भर है और यूक्रेन के आक्रमण के बाद से कीमतों में बढ़ोतरी के समय सस्ता तेल आयात करने की संभावना देख रहा है। भारतीय व्यापार निकाय के अधिकारियों का कहना है कि द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्था अगले सप्ताह की शुरुआत में लागू की जा सकती है, हालांकि भारत के केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय ने अब तक इस मामले पर आधिकारिक रूप से टिप्पणी करने से परहेज किया है।

रुपया-रूबल व्यापार पर बातचीत तेज

रुपया-रूबल व्यापार पर बातचीत तेज

भारत के प्रमुख आर्थिक अखबार, इकोनॉमिक टाइम्स ने बताया कि रूसी केंद्रीय बैंक के अधिकारियों के अगले सप्ताह अपने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के समकक्षों के साथ एक नियामक ढांचे के निर्माण पर चर्चा करने की उम्मीद है जो द्विपक्षीय व्यापार और बैंकिंग संचालन को बनाए रखने में मदद करेगा। यूक्रेन पर मास्को के युद्ध के खिलाफ लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों से निपटने में भारत रूस के साथ कैसे व्यापार करे, इसपर भी बैठक में चर्चा की जाएगी। भारतीय वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया है कि, रुपया-रूबल व्यापार के तौर-तरीकों पर अभी तक विस्तार से काम नहीं किया गया है, लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, "रॅन्मिन्बी के जरिए रूसी बैंक द्वारा रुपये की अदला-बदली भारत में स्थित एक चीनी बैंक शाखा से" किए जाने की संभावना हो सकती है। यानि, रूस के साथ 'रुपया-रूबल' ट्रेड के लिए चीन की करेंसी 'युआन' का इस्तेमाल किए जाने की पूरी उम्मीद है। आपको बता दें कि, रॅन्मिन्बी चीन की करेंसी युआन को कहा जाता है और इस वक्त एक रॅन्मिन्बी का वैल्यू करीब 12 रुपये के बराबर है।

चीन की करेंसी बनेगा गेटवे?

चीन की करेंसी बनेगा गेटवे?

यानि, जो बातचीत चल रही है, उसके मुताबिक, रूसी बैंक भारतीय रुपये को चीन की करेंसी में ट्रांसफर कर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं, चीनी बैंक रुपये का उपयोग डॉलर खरीदने के लिए कर सकते हैं, क्योंकि चीन की बैंकों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। वहीं, कुछ दूसरे रिपोर्ट्स में सुझाव दिया गया है कि, योजना के मुताबिक, रूस के एसपीएफएस मैसेजिंग सिस्टम के माध्यम से रुपये-रूबल के बीच करेंसी वैल्यू तय कर दोनों देश भुगतान में शामिल हो सकते हैं, जो कि अधिक व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्विफ्ट सिस्टम का ही एक विकल्प है, जिसे अब सात रूसी बैंक प्रतिबंधों के बाद इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, सीएनबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, एक सरल तरीका यह भी अपनाया जा सकता है, जिसमें रूसी बैंक को सिर्फ एक भारतीय बैंक में खाता खोलने की आवश्यकता होगी और एक भारतीय बैंक को रूस में एक खाता खोलना होगा, जिसके माध्यम से रूस को उनके निर्यात के लिए डॉलर या यूरो के बजाय, भारतीय निर्यातकों को स्थानीय मुद्रा में भुगतान करने की सुविधा मिल सकेगी।

कैसे तय होगा रुपया-रूबल का मूल्य?

कैसे तय होगा रुपया-रूबल का मूल्य?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तरह की किसी व्यवस्था के लिए नई दिल्ली और मॉस्को को एक एक्सचेंज वैल्यू पर सहमत होना पड़ेगा और दोनों देशों की करेंसी को एक काल्पनिक वैल्यू का निर्धारण करना पड़ेगा, जो डॉलर या यूरो को आधार बनाकर तय किया जा सकता है और इसके जरिए भारतीय और रूसी मुद्राओं का मूल्य आंका जा सकेगा। रूस की करेंसी रूबल इस वक्त लगभग एक डॉलर के मुकाबले 85 रूबल पर कारोबार कर रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद 7 मार्च को रूसी मुद्रा 150 डॉलर तक गिर गई थी, इस खबर पर कि बाइडेन प्रशासन रूसी ईंधन के अमेरिकी आयात पर प्रतिबंध लगाएगा, लेकिन मॉस्को द्वारा ब्याज दरों में 20% की बढ़ोतरी और पूंजी नियंत्रण लागू करने के बाद रूबल ने फिर से जबरदस्त वापसी कर ली और 85 के आंकड़े पर पहुंच गया।

रूस की कैसे मदद कर रहा भारत?

रूस की कैसे मदद कर रहा भारत?

अमेरिकी धमकियों से बेपरवाह भारत ने अपना हित देखते हुए रूस से करीब 30 प्रतिशत की बंपर छूट के साथ तेल खरीदनी शुरू कर दी है, वहीं कोयले में भी रूस भारी छूट दे रहा है और भारत ने रूस से कोयले का आयात दोगुना बढ़ा दिया है, जिससे अमेरिका बुरी तरह से चिढ़ा हुआ है। इसके साथ ही रूस ने भारत से अनुरोध किया है, कि हथियारों की खरीद में जो बकाया है, उसका 1.3 अरब डॉलर शीघ्र भुगतान कर दे, ताकि रूस को इस वक्त राहत मिल सके और रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत इसके लिए तैयार हो चुका है। वहीं, ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में भारत सरकार के एक स्रोत के हवाले से संकेत दिया गया है कि, रूस यह भी चाहता है कि वीज़ा इंक. और मास्टरकार्ड इंक. के रूस में संचालन सस्पेंड करने के बाद भारतीय और रूसी बैंकों द्वारा जारी किए गए कार्डों के निर्बाध उपयोग के लिए भारत अपने एमआईआर भुगतान प्रणाली के साथ अपने एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस में प्लग इन करे।

भारत के कदम से वॉशिंगटन परेशान?

भारत के कदम से वॉशिंगटन परेशान?

वहीं, एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक, द विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया के वरिष्ठ सहयोगी माइकल कुगेलमैन ने कहा कि, "रूस के साथ गैर-डॉलर-आधारित व्यापार व्यवस्था की तलाश करने का भारत का निर्णय वाशिंगटन को परेशान कर सकता है, लेकिन यह बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं है और बहुत हद तक भारत की नीति के मुताबिक ही है।" उन्होंने कहा कि, "नई दिल्ली का मास्को के साथ एक विशेष संबंध है जो एक लंबे समय से चली आ रही दोस्ती पर निर्भर है। यह भारत को रूस के साथ काम करने के तरीके खोजने के लिए एक प्रोत्साहन देता है, यहां तक कि अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का पालन न करने का ख्याल रखते हुए, भारत एक करीबी साथी की तरह रूस की मदद कर रहा है'। माइकल कुगेलमैन का मानना है कि, 'रुपया-रूबल' ट्रेड स्थापित कर भारत उस स्थिति में खुद को देख रहा है, जहां वो मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच न्यूट्रल है।

भारत के सामने हैं चुनौतियां?

भारत के सामने हैं चुनौतियां?

कुगेलमैन ने यह भी कहा कि भारत की रूसी हथियारों पर बहुत अधिक निर्भरता है, ऐसे समय में जब उसे पाकिस्तान और चीन दोनों से दोतरफा सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। और ऐसे समय में सस्ते रूसी तेल का ऑफर भी भारत को मिला है, जो भारत के लिए फायदे की बात है। उन्होंने कहा कि, असल में रुपया-रूबल व्यापार व्यवस्था रूस को शक्तिशाली प्रोत्साहन तो देता ही है, कि भारत जैसा मजबूत देश पर्दे के पीछे से उसके साथ खड़ा है, इसके साथ साथ भारत को भी इससे काफी फायदा मिल रहा है। वहीं, भारत के प्रख्यात रणनीतिक विचारक, लेखक, टिप्पणीकार, ब्रह्म चेलानी ने हाल के एक ट्वीट में उन विचारों को प्रतिध्वनित करते हुए कहा कि, "यूक्रेन पर रूस-नाटो गतिरोध पर भारत की तटस्थता ने इजरायल की तटस्थता की तुलना में अधिक ध्यान आकर्षित किया है। इसी तरह, जबकि यूरोप अभी भी रूसी ऊर्जा पर निर्भर है, मास्को के साथ एक संभावित भारतीय तेल सौदा ध्यान आकर्षित कर रहा है, हालांकि, व्हाइट हाउस के प्रवक्ता भी कह चुकी हैं, कि भारत का यह कदम प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं करेगा।

भारत-रूस व्यापार

भारत-रूस व्यापार

आधिकारिक भारतीय व्यापार आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के दौरान रूस-भारत व्यापार 8.1 अरब अमेरिकी डॉलर था। जिसमें भारत ने रूस को 2.6 अरब डॉलर का सामान बेचा, जबकि रूस से भारत ने 5.48 अरब डॉलर का सामान खरीदा। यूक्रेन युद्ध से 2 महीने पहले दिसंबर 2021 में जब रूस के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आए थे, तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने पर सहमति जताई गई थी और दोनों देशों ने तय किया था, कि साल 2025 तक भारत और रूस की कोशिश आपसी व्यापार को बढ़ाकर 50 अरब डॉलर तक ले जाया जाए। लेकिन, अब जबकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस प्रतिबंधों के जाल में बंधा हुआ है, देखना दिलचस्प होगा, कि व्यापार बढ़ाने पर भारत क्या फैसला करता है।

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