रेचेप तैय्यप अर्दोआन: तुर्की के उस नेता की कहानी, जो देश बांटकर सबसे ज्यादा ताकतवर बन गया
तुर्की का चुनावी परिणाम, एक राजनीतिक चौराहे पर खड़े देश में गहरे ध्रुवीकरण को दर्शाता है। वोट से पता चलता है, कि अर्दोआन के पक्ष में ज्यादा लोगों ने वोट डाला है, और तुर्की के लोगों को अर्दोआन की राजनीति पसंद है।

रेचेप तैय्यप अर्दोआन: तुर्की में इस बार होने वाले चुनाव को लेकर माना जा रहा था, कि ये चुनाव बदलाव लाने वाला चुनाव हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
रेचेप तैय्यप अर्दोआन फिर से चुनाव जीत चुके हैं और अगले पांच सालों के लिए देश के शासन की बागडोर उनके हाथों में फिर से आ गई है। हालांक, जीतने के बाद अंकारा में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए अर्दोआन ने अपनी जीत को '8 करोड़ तुर्की के लोगों की जीत' बताया है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
क्योंकि, विपक्षी नेता कमाल कलचदारलू ने अर्दोआन पर चुनाव में भारी धांधली करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, कि हाल के वर्षों में तुर्की में हुआ ये सबसे बड़ा चुनावी धांधली है और उन्होंने सरकार तंत्र का भयानक इस्तेमाल किया है।
क्या कहते हैं चुनावी नतीजे?
तुर्की में इस साल दूसरे चरण के मतदान के बाद रेचेप तैय्यप अर्दोआन को पूर्ण बहुमत मिला है। लेकिन, इस चुनाव ने ये साफ कर दिया है, कि तुर्की अपने नेता को लेकर दो हिस्सों में बंटी हुई है।
14 मई को पहले दौर के चुनाव में रेचेप तैय्यप अर्दोआन को जहां 49.5 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं विपक्षी उम्मीदवार कमाल कलचदारलू को 44.79 प्रतिशत वोट मिले थे। लिहाजा, अर्दोआन जीतने में कामयाब नहीं हो पाए और चुनाव का फैसला दूसरे राउंड पर आ टिका।
दूसरे राउंड का चुनाव 28 मई को हुआ, जिसमें अर्दोआन को 52.16 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि कमाल कलचदारलू को 47.84 प्रतिशत वोट मिले हैं। जिसका मतलब ये हुआ, कि देश की करीब करीब आधी आबादी ने अर्दोआन के खिलाफ मतदान किया है और उन्हें अर्दोआन के अधिनायकवादी शासन पद्धति रास नहीं आई है।

अर्दोआन की 'फूट डालो राज करो' नीति
रेचेप तैय्यप अर्दोआन, जिनकी उम्र 69 साल है, उनकी राजनीतिक परवरिश एक रूढ़िवादी राजनीतिक परंपरा के बीच में हुई है और अर्दोआन ने तुर्की की उदार राजनीति में सालों से चली आ रही धर्मनिरपेक्ष परंपरा को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
तुर्की के जिस समाज को 1920 के दशक में मुस्तफा केमल अतातुर्क ने काफी मुश्किलों से लड़कर उदारवादी बनाया था, जहां की राजनीति को मजहब से बिल्कुल अलग कर दिया था, उसे अर्दोआन ने खत्म कर दिया। तुर्की की राजनीति में अब मजहब फिर से लौट आई है।
अलजजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 20 सालों की अपनी ताकतवर राजनीति के दौरान अर्दोआन की छवि एक बांटने वाले नेता के तौर पर विकसित हुई है। कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अर्दोआन की भविष्य की राजनीति में भी कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिलेंगे।
अर्दोआन पहले सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहे और फिर राष्ट्रपति बन गये। उन्होंने 20 सालों तक लगातार सत्ता के शीर्ष पर रहकर मुस्तफा केमल अतातुर्क के 15 सालों तक लगातार राज करने के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। 2014 में, वह लोकप्रिय वोट से चुने गए पहली बार देश के राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने देश की संसद को राष्ट्रपति शासन केन्द्रित कर दिया और प्रधानमंत्री की सारी शक्तियों को खत्म कर दिया।
यानि, तु्र्की की संसदीय राजनीति परंपरा काफी कमजोर हो गई और राष्ट्रपति प्रणाली की शुरूआत हो गई।

अर्दोआन ने तुर्की को कैसे बदला?
अर्दोआन ने अपने शासनकाल के दौरान तुर्की की एक बड़ी आबादी को ये यकीन दिलाने की कोशिश की, कि इस्लामिक देशों का असल नेतृत्व तुर्की के पास होना चाहिए।
अर्दोआन के वोटर्स उनके 'इस्लामिक खलीफा' बनने के कंसेप्ट को काफी पसंद करते हैं, जिसे पाकिस्तान ने और भी बढ़ाया है। तुर्की को पाकिस्तान और मालदीव जैसे देशों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन पूरी तरह से नहीं, क्योंकि पाकिस्तान को पैसे तो सऊदी अरब से चाहिए।
अर्दोआन भले ही इस्लामिक खलीफा बनने की बात करते हैं, लेकिन उनके शासनकाल में तुर्की की आर्थिक स्थिति काफी खराब हुई है। देश एफएटीएफ के ग्रे-लिस्ट में जा चुका है और एक्सपर्ट्स का कहना है, कि आर्थिक संकट से तुर्की को निकालने के लिए अर्दोआन के पास कोई रोडमैप नहीं है।
वहीं, इसी साल 6 फरवरी को आए विनाशकारी भूकंप ने अर्दोआन के लिए और भी ज्यादा मुसीबतें बढ़ा दी हैं। भूकंप ने देश के अरबों डॉलर के इन्फ्रास्ट्रक्चर को ध्वस्त कर दिया है और भूकंप प्रभावितों का पुनर्वास कतई आसान नहीं होने वाला है।

अर्दोआन की मजहबी राजनीति
तुर्की के रीजे शहर में काला सागर तट के पास जन्म लेने वाले अर्दोआन का बचपन मजहबी वातावरण में ही बीता और जब वो 13 साल के थे, तो उनके पिता इंस्ताबुल में शिफ्ट हो गये।
हालांकि, अर्दोआन की बचपन की जिंदगी उतनी आसान नहीं थी और कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि पैसे कमाने के लिए अर्दोआन ने रास्ते पर नींबू पानी बेचा। वहीं, अर्दोआन जवानी के दिनों में प्रोफेशनल फुटबॉल प्लेयर भी रह चुके हैं। लेकिन, उन्होंने अपना कैरियर फुटबॉल में नहीं, बल्कि राजनीति में चुना।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की के सबान्सी यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर बर्क एसेन ने कहा, कि "धार्मिक कट्टरवाद ने अर्दोआन के शक्तिशाली होने में काफी बड़ी भूमिका निभाई है"। उन्होंने कहा, कि "समर्थकों की नजर में अर्दोआन के एक मजबूत नेता हैं।"
तुर्की, जो साल 1923 में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की अगुवाई में एक धर्म निरपेक्ष देश बना था, वहां पर 2003 में पहली बार इस्लामिक जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी ने अर्दोआन के नेतृत्व में चुनाव जीता था। उसके बाद से अर्दोआन को सत्ता से कोई नहीं हटा पाया। तीन बार प्रधानमंत्री बनने के बाद साल 2014 में अर्दोआन ने तुर्की में राष्ट्रपती शासन प्रणाली की स्थापना की और खुद राष्ट्रपति बन गये।

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प्रोफेसर बर्क एसेन ने कहा, कि "अर्दोआन ने तुर्की के गणतंत्र की तस्वीर पूरी तरह से बदल दी है।" उन्होंने कहा, कि "तुर्की की मीडिया अर्दोआन के अधीन है, अखबारों और टीनी चैनलों के मालिक अर्दोआन के समर्थक हैं, लिहाजा अर्दोआन की नीतियों की आलोचना तुर्की की मीडिया में नहीं की जाती है।"
लिहाजा, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि तीसरी बार भी राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले अर्दोआन तुर्की में मजहबी उन्माद को और हवा देंगे और खलीफा बनने की चाहत में अर्दोआन, इस्लामिक देशों का समर्थन हासिल करने के लिए तेजी से काम करेंगे, जिसकी वजह से सऊदी के साथ तनाव बढ़ सकता है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अर्दोआन के जीतने से सिर्फ तुर्की की जनता का ही बंटवारा नहीं हुआ है, बल्कि इस्लामिक देशों में भी नये सिरे से बंटवारा होगा। जिसमें एक गुट तुर्की का, तो दूसरा गुट सऊदी अरब का होगा।
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