तालिबानी लीडरों ने पाकिस्तान में क्या खूब माल बनाया !
इस्लामाबाद, 30 अगस्त। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान। ये पाकिस्तान दो प्रांत हैं जो उत्तर पश्चिम में अवस्थित हैं। खैबर पख्तूनख्वा राज्य को नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर भी कहा जाता है। इन दोनों राज्यों की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। खैबर पख्तूनख्वा की राजधानी है पेशावर। इस राज्य का एक खूबसूरत शहर है पाराचिनार। यह शहर पाकिस्तान के कुर्रम जिले का मुख्यालय है।

पाराचिनार का प्राकृतिक सौन्दर्य बिल्कुल कश्मीर की तरह है। पाराचिनार की सीमा अफगानिस्तान के लोगर और नांगरहार (जहां अनेरिका ने ड्रोन हमला किया) प्रांत से मिलती है। खैबर पख्तूनख्वा के ठीक नीचे यानी दक्षिण पश्चिम में अवस्थित है बलूचिस्तान। बलूचिस्तान की राजधानी है क्वेटा। इस राज्य एक का शहर है 'चमन'। चमन, 'किला अब्दुल्ला' जिले का मुख्यालय है। पाकिस्तानी शहर चमन की सीमा अफगानिस्तान के कंधार प्रांत से मिलती है। यहां पाकिस्तान के भूगोल का जिक्र इस लिए क्यों कि इस भूगोल में ही छिपा है तालिबान का रक्तरंजित इतिहास। पाराचिनार और चमन में ही पाकिस्तान ने वो ट्रेनिंग कैंप बना रखे हैं जहां तालिबान के आतंकी प्रशिक्षण लेते थे। अगर पाकिस्तान नहीं होता तो तालिबान का वजूद न होता। अगर होता भी तो वक्त के हाशिये पर कहीं पिद्दी सा पड़ा होता। अमेरिका ने उसकी कमर तोड़ दी थी। लेकिन पाकिस्तान ने उसे पाल-पोस कर खूंखार बना दिया।

पाराचिनार में तालिबान का ट्रेनिंग कैंप
कुछ साल पहले की बात है। अफगानिस्तान के लोगर प्रांत के एक गांव से 20 साल का वहाब अचानक गायब हो गया। बाद में उसके घर वालों को पता चला कि वहाब जेहादी बन कर पाकिस्तान चला गया है। वह पाराचिनार के एक तालिबानी कैंप में ट्रेनिंग ले रहा है। वहाब के साथ स्कूल में पढ़ने वाले उसके दोस्त ने उसे तालिबान के साथ जोड़ा था। वहाब के घर वाले ये जान कर भी चुप रहे। उन्हें डर था कि अगर अफगानी फौज (गनी सरकार) जान गयी तो उनका जीना मुहाल हो जाएगा। उन्हें इस बात का भी डर था कि अगर तालिबानियों को शक हो गया तो वे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। खतरा दोनों तरफ से था। इसलिए वहाब के मात-पिता ने होंठ सिल लिये। लेकिन उन्हें इस बात की तकलीफ थी आज पाकिसतान की वजह से ही अफगानिस्तान बर्बाद हो रहा है।

“तालिबान तो पाकिस्तान के नौकर की तरह है”
वहाब के पिता डर से अपना नाम भी नहीं बताते। वे कहते हैं, तालिबान को पनाह दे कर पाकिस्तान ने अफगानों की जिंदगी में जहर घोल दी। अफगानिस्तान के आम नागरिक तालिबानियों से या तो डरते हैं या फिर नफरत करते हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि जिहाद के नाम पर उनके बच्चों के हाथों में बंदूक थाम दी गयी जब कि तालिबानी लीडरों के बच्चे पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ते रहे। तालिबान कमांडर पाकिस्तान में एशोआराम की जिंदगी जीते रहे जब कि उनके बच्चे जान हथेली पर लेकर जंगल और पहाड़ की गुफाओं में खानाबदोश की तरह जीते रहे। कीड़े-मकोड़ों की तरह मरते रहे। कुछ दिनों पहले हेरात के रहने वाले इस्माइल खान ने मीडिया से कहा था, यह लड़ाई तालिबान और अफगानिस्तान के बीच नहीं है। यह वह लड़ाई है जिसे पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ छेड़ी है। तालिबान तो पाकिस्तान के नौकर की तरह है जिन्हें लड़ने के लिए पैसा और असलहा मिलता है। अफगानी फौज के साथ लड़ाई में जब तालिबानी लड़ाके घायल होते हैं तो उनका इलाज पाकिस्तान (चमन) के अस्पतालों में होता है। चमन घायल तालिबानियों की शरणस्थली है। जिनकी हालत ज्यादा खराब होती है उन्हें क्वेटा भेज दिया जाता है। क्वेटा में कई तालिबानी लीडरों के घर भी हैं।

तालिबानी लीडर की पाकिस्तान में सम्पत्ति
दिसंबर 2020 में इंग्लैंड के प्रतिष्ठित अखबार 'द संडे टाइम्स' में एक रिपोर्ट छपी थी। इसके मुताबिक तालिबान के पूर्व सरगना मुल्ला अख्तर मंसूर न केवल पाकिस्तान में रहता था बल्कि उसने वहां सम्पत्तियां भी खड़ी कर ली थी। पेशावर और क्वेटा में उसदी दो शानदार हवेलियां थीं। कराची में उसकी पांच प्रोपर्टी थी। इसकी कीमत करीब एक करोड़ 46 लाख रुपये आंकी गयी थी। यहां तक कि उसने नाम बदल कर पाकिस्तानी की सरकारी बीमा कंपनी की पॉलिसी भी ले रखी थी। इसका खुलासा पकिस्तान की एक अदालती सुनवाई के दौरान हुआ था। 2016 में मंसूर की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत हो गयी थी। उसकी मौत के पहले से ही कराची के एंटीटेररिज्म कोर्ट में उसके खिलाफ टेरर फंडिग केस की सुनवाई चल रही थी। इस सुनवाई के दौरान जब कोर्ट को मंसूर की इंश्योरेंस पॉलिसी की जानकारी मिली तो बीमा कंपनी को सब कुछ बताना पड़ा। मंसूर तब तालिबान का चीफ था। वह अफीम-होराइन की तस्करी और दूसरी आपरधिक गतिविधियों से तलिबान का आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर रहा था। इस दौरान उसने अपने नाम पर भी सम्पत्ति बनायी।

जब मुल्ला मंसूर ने पाकिस्तान में खरीदी थी इंश्योरेंस पॉलिसी
मुल्ला मंसूर की अमीरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी पाकिस्तानी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के लिए तीन लाख का प्रीमियम दे रहा था। 2015 में उसे तालिबन की कमान मिली थी। पाकिस्तान ने आतंकी सरगना मुल्ला उमर को पनाह दे रखी थी लेकिन उसने दुनिया को दिखाने के लिए ढोंग किया। पाकिस्तानी अदालत के आदेश के बीमा कपंनी ने मंसूर के साढ़े तीन लाख रुपये सररेंडर कर दिये। कराची प्रशासन मंसूर की पांच सम्पत्तियों को केवल 92 लाख रुपये नीलाम कर दिया। ये बोली तालिबान समर्थकों ने लगायी थी। तालिबान लीडरों की सम्पत्ति को पाकिस्तानी सरकार छू भी नहीं सकती थी। पाकिस्तान ने मंसूर को 2005 में राष्ट्रीय पहचानपत्र भी जारी किया था। 21 मई 2016 को अमेरिका ने तालिबानी आतंकियों पर ड्रोन हमला किया तो मंसूर अफगानिस्तान की सीमा पर बलूचिस्तान में मारा गया था। मंसूर ना रहा तो क्या हुआ ? तालिबान को जिंदा रखने की तो पाकिस्तान ने कसम उठा रखी थी। तालिबान और मजबूत हुआ। इसका नतीजा आज पूरी दुनिया देख रही है।












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