हिमालय के ग्लेशियर 2010 के बाद 65% तेजी से पिघलने लगे हैं, ICIMOD की रिपोर्ट है डरावनी
हिमालय के पूरे हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला में ग्लेशियर अप्रत्याशित रूप से पिघल रहे हैं। हालात इतने भयावह होने की आशंका नहीं थी, जितनी की मंगलवार को आई एक रिपोर्ट में बताई गई है। यह रिपोर्ट काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपेंट (ICIMOD) ने जारी की है।
एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट में इस संस्था के हवाले से बताया गया है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बहुत ही ज्यादा कम नहीं किया गया तो इसी सदी में हिमालय के ग्लेशियर 80% तक पिघल जाएंगे।

एशिया की करीब 2 अरब आबादी के सामने संकट
ICIMOD की रिपोर्ट की में चेतावनी दी गई है कि आने वाले वर्षों में अचानक आने वाली बाढ़ और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ने वाली हैं। यही नहीं इसका असर एशिया की करीब 2 अरब आबादी पर पड़ने वाला है, जिनके सामने पानी का संकट खड़ा हो सकता है। यह वो जनसंख्या है, जो इन पहाड़ों से निकलने वाली 12 नदियों के दायरे में रहती है।
16 देशों से होकर गुजरती हैं हिमालय की नदियां
हिंदू कुश हिमालय पर्वत श्रृंखला पर मौजूद बर्फ इन नदियों के पानी का मुख्य स्रोत है। ये नदियां एशिया के 16 देशों से होकर गुजरती हैं। ये नदियां पहाड़ों में रहने वाली 24 करोड़ लोगों के ताजे पानी का स्रोत हैं, तो मैदानी इलाकों में रहने वाले 165 करोड़ लोगों को भी पानी उपलब्ध कराती हैं।
जिनका कोई रोल नहीं, उन्हीं के सामने ज्यादा जोखिम
माइग्रेशन एक्सपर्ट और इस रिपोर्ट की एक लेखक अमीना महाराजन ने कहा, 'इन पहाड़ों में रहने वाले लोग जिनका ग्लोबल वार्मिंग में लगभग कोई रोल नहीं है, वह जलवायु परिवर्तन की वजह से सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।' 'अभी के सारे प्रयास पूरी तरह से अपर्याप्त हैं और हमें बहुत ज्यादा चिंता है कि बिना व्यापक सहयोग के ये लोग इसका सामना करने में असमर्थ होंगे।'
माउंट एवरेस्ट ग्लेशियर की 2,000 वर्षों की बर्फ पिछले 30 वर्षों में पिघली-रिपोर्ट
कई रिपोर्ट में बताया गया है कि पृथ्वी के जो क्षेत्र हिम और बर्फ से ढके (cryosphere) हुए हैं, वह जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए हाल की रिसर्च में पाया गया है कि माउंट एवरेस्ट ग्लेशियर से 2,000 वर्षों की बर्फ सिर्फ पिछले 30 वर्षों ही पिघल चुकी है।
हिमालय के ग्लेशियर 2010 के बाद से 65% तेज गति से पिघले-रिपोर्ट
इस नई रिपोर्ट की सबसे बड़ी खोज यह है कि पिछले दशकों की तुलना में हिमालय के ग्लेशियर 2010 के बाद से 65% तेज गति से पिघलने लगे हैं। इस शोध में हिमालय के पहाड़ों में मौजूद 200 ग्लोशियर झीलों को खतरनाक माना गया है। इनकी वजह से सदी के अंत तक ग्लेशियर फटने की घटनाओं में भयानक बढ़ोतरी हो सकती है, जो कि तबाही वाली बाढ़ के कारण बन सकते हैं।
'अभूतपूर्व और काफी हद तक अपरिवर्तनीय'
शोध से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन का जो कहर पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों को भुगतना होगा, वह दुनिया के बाकी हिस्सों से ज्यादा होगा। इसके मुताबिक हिंदू कुश हिमालय पर्वत क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर और बर्फ में जो बदलाव हो रहे हैं, वे 'अभूतपूर्व और काफी हद तक अपरिवर्तनीय' हैं।
पिघलने के बाद बर्फ का फिर से जमना बहुत मुश्किल-वैज्ञानिक
इस रिपोर्ट में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के धंसने की घटना को भी शामिल किया गया है, जो हिमालय में ही बसा हुआ है। इंटरनेशनल क्रायोस्फियर क्लाइमेट इनिशिएटिव की डायरेक्टर पैम पीअर्सन ने कहा, 'इन क्षेत्रों में एक बार बर्फ पिघल जाती है तो उसे फिर से जमी हुई स्थिति में वापस करना बहुत मुश्किल है।' वह भी इस शोध में शामिल हैं।
उनका कहना है कि 'यह समुद्र में एक बड़े जहाज की तरह है। एक बार बर्फ पिघलनी शुरू हो गई, तो इसे रोकना बहुत मुश्किल है। इसलिए ग्लेशियर, खासकर के हिमालय के विशाल ग्लेशियर एक बार पिघलने शुरू हो गए तो यह बहुत लंबे समय तक चलता रहेगा, जबतक कि यह रुकेगा।'
उनका कहना है कि इन विषम परिस्थितियों को रोकने के लिए यह बहुत जरूरी है कि 2015 के पेरिस क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस के करार के हिसाब से ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर दिया जाए। लेकिन, उन्होंने चिंता जताई है कि ज्यादातर नीति निर्माता इस लक्ष्य को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
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