Nawaz Sharif: सेना ने नवाज़ शरीफ को भारत से दोस्ती करने बुलाया? जानिए क्यों हैं उम्मीदें और आशंकाएं
Nawaz Sharif News: शहबाज शरीफ ने कई महीने पहले ही ऐलान कर दिया था, कि उनके बड़े भाई नवाज शरीफ ही उनकी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे और उन्होंने यकीन जताया, कि पाकिस्तान, नवाज शरीफ को ही अपना अगला प्रधानमंत्री चुनेगा।
लेकिन, दोबारा पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने से पहले नवाज शरीफ को कई कानूनी और चुनावी मुश्किलों से गुजरना पड़ सकता है। और उनके पास अपने देश को बहुसंकट से बाहर निकालने के लिए, कोई जादू की छड़ी भी नहीं है। फिर भी, शनिवार रात लाहौर में एक बड़ी सभा को अपने संबोधन में उन्होंने भारत पर पाकिस्तान के घरेलू विमर्श को फिर से एक नई दिशा देने की कोशिश की है।

शनिवार को अपने संबोधन में नवाज़ शरीफ ने इस बात पर जोर दिया, कि कोई भी देश अपने पड़ोसियों के साथ लड़ते हुए प्रगति नहीं कर सकता और तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके नवाज शरीफ ने भारत के साथ नए सिरे से जुड़ाव के लिए एक मजबूत सार्वजनिक मामला पेश किया। जाहिर है, नवाज़ शरीफ चुनाव में जाने से पहले ही भारत की तरफ नरम रूख करके बड़ा रिस्क ले रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का मानना है, कि नवाज़ शरीफ देश में इस बात पर चर्चा चाहते हैं, कि क्या 'भारत से दुश्मनी के रास्ते चलकर पाकिस्तान प्रगति कर सकता है?'
लेकिन, असल सवाल ये है, कि क्या भारत को नवाज शरीफ पर भरोसा करना चाहिए?
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए नवाज़ शरीफ ने बताया, कि पाकिस्तान अपने पड़ोसियों से कितना पीछे रह गया है। उन्होंने बांग्लादेश में आर्थिक प्रगति का खास तौर पर जिक्र किया, जो 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था।
आज पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति जीडीपी (लगभग 1500 डॉलर) बांग्लादेश की तुलना में लगभग 1000 डॉलर कम है। पिछले कुछ हफ्तों में, नवाज शरीफ ने भारत के चंद्रमा पर उतरने और पाकिस्तान का कर्ज के लिए दुनिया में भटकने की बात को बार बार उठाया है।

नवाज़ शरीफ की छवि भारत को लेकर सकारात्मक रही है और उन्होंने भारत के प्रधानमंत्रियों के साथ हमेशा रिश्ता बनाए रखा।
लेकिन, भारत के साथ रिश्ते की नई शुरुआत की शरीफ की बात, दिल्ली में काफी संदेह पैदा करती है। भारत-पाक शांति प्रक्रिया के निराशाजनक रिकॉर्ड को देखते हुए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। निश्चित रूप से, सीमा पार आतंक को समाप्त करने के लिए दिल्ली की अब अपनी रख्त शर्तें हैं।
प्रधानमंत्री बनने के लिए नवाज़ शरीफ का चौथा प्रयास कितना सफल होगा, इस पर दिल्ली की उम्मीदें टिकी रहेंगी, लेकिन उनकी वापसी पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। जब नवाज़ शरीफ़, भारत के साथ बातचीत की बात करते हैं तो कुछ हद तक विश्वसनीयता भी लाते हैं।
एक बात तो यह है, कि जब नवाज़ शरीफ, चार साल के निर्वासन के बाद पाकिस्तान का नेतृत्व दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, तो उनके पास भारत के साथ बातचीत को अपने राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर रखने का कोई कारण नहीं है। पाकिस्तान में भारत के साथ शांति चाहने का कोई राजनीतिक लाभ नहीं है, बल्कि इसका नुकसान होने की संभावना ज्यादा है, लिहाजा नवाज़ शरीफ ने भारत से शांति की बात अभी क्यों की है, ये दिलचस्प बात है।
खासकर नवाज़ शरीफ को लेकर पाकिस्तान में एक राय रही है, कि नवाज शरीफ भारत के साथ अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं।

पाकिस्तान में ऐसा माना जाता है, कि साल 2017 में नवाज़ शरीफ के सत्ता से बाहर होने का पहला कारण प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ने का उनका उत्साह था। पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की सलाह के विरुद्ध, नवाज़ शरीफ़ मई 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे।
इसके अलावा,साल 2015 में नवाज़ शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में जो बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कश्मीर का जिक्र सीधे तौर पर नहीं किया था और ऐसा माना जाता है, कि जुलाई 2015 में रूस के उफा में पीएम मोदी और नवाज शरीफ की जो द्विपक्षीय बैठक हुई थी, उसी का नतीजा था। लेकिन, यूएन में कश्मीर का जिक्र नहीं करना, पाकिस्तान में उनके खिलाफ गया।
डॉन अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016 के अंत में नवाज़ शरीफ ने देश के सैन्य नेतृत्व से आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने का आह्वान किया था और उन्होंने कहा था, कि ये आतंकी, पाकिस्तान की क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को भारी नुकसान पहुंचा रहे थे, लेकिन इससे सैन्य नेतृत्व में गुस्सा भर दिया।
और इसके बाद से ही नवाज़ शरीफ को हटाने का प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया गया।
लेकिन, दूसरा सवाल ये उठता है, कि अगर नवाज़ शरीफ वाकई भारत के साथ बातचीत करना चाहते हैं और वो अच्छे संबंध बनाने के इच्छुक हैं, तो पिछले 3 दशकों में उन्होंने जो प्रयास किए, वो फेल क्यों हुए?
नवाज़ शरीफ के पास साल 1990 के बाद से भारत के सभी प्रधानमंत्रियों के साथ बातचीत करने का अनूठा अवसर रहा है। पिछले तीन दशकों और उससे अधिक समय में प्रधान मंत्री के रूप में उनके तीन कार्यकालों में शरीफ ने भारत के साथ बातचीत की, जिनमें चंद्र शेखर, पीवी नरसिम्हा राव, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी शामिल रहे हैं।
लिहाजा इससे अहम सवाल उठता है, कि अगर सेना ने हमेशा नवाज़ शरीफ की भारत के साथ दोस्ती करने पर अड़ंगा लगाया है, तो फिर सेना इस बार भी नवाज़ शरीफ को भारत के करीब आने की इजाज़त क्यों देगी।
सभी संकेत यही हैं, कि नवाज़ शरीफ की पाकिस्तान वापसी सेना के साथ एक समझौते का हिस्सा है। 2017 में शरीफ से छुटकारा पाने के बाद सेना ने उन्हें वापस क्यों आने दिया? सेना नेतृत्व, जिसने 2018 के आम चुनावों में धांधली की और इमरान खान को सत्ता में स्थापित किया, वो इस बार नवाज़ शरीफ पर मेहरबान क्यों है?

लिहाजा सवाल ये उठ रहे हैं, कि
क्या नवाज़ शरीफ को वापस लाने का मतलब यह है, कि रावलपिंडी अब नई दिल्ली के साथ समझदार रिश्ते के पक्ष में है? आवश्यक रूप से नहीं। लेकिन तथ्य यह है, कि जनरल मुनीर के पूर्ववर्ती जनरल क़मर जावेद बाजवा ने फरवरी 2021 में मोदी सरकार के साथ युद्धविराम समझौते पर बातचीत की थी।
इसके अलावा, बाजवा के कहने पर प्रधामंत्री मोदी को पाकिस्तान आने का न्योता दिया जाने वाला था, लेकिन इमरान खान ने वीटो कर दिया था। बाजवा ने कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत की और बाजवा के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान में जो पहला नेशनल डिफेंस कार्यक्रम जारी हुआ, उसमें यही कहा गया, कि पाकिस्तान अगले सौ सालों तक भारत से जंग नहीं करेगा।
लिहाजा, क्या यह मान लेना उचित है, कि जनरल मुनीर ने अपने पूर्ववर्ती के इस तर्क को मान लिया है कि समय आ गया है कि पाकिस्तान अनुचित भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के बजाय आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करे? और क्या नवाज़ शरीफ को इसलिए पाकिस्तान बुलाया गया है, ताकि पाकिस्तान भारत के साथ संबंधों को सुधारकर देश की आर्थिक स्थिति की बेहतरी की दिशा में कदम उठाए?












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