Diplomacy: रूस की दोस्ती की बराबरी की सोच भी नहीं सकता अमेरिका, जानिए मोदी-पुतिन मुलाकात के मायने
Modi Russia Visit: भारतीय परिवारों में जब 1971 के युद्ध की कहानी एक पीढ़ी दूसरे पीढ़ी को सुनाती है, तो गर्व से बताया जाता है, कि कैसे रूस ने भारत की मदद की थी और रूस की वजह से कैसे अमेरिका को पीछे हटना पड़ा था और कैसे, अगर रूस भारत की मदद नहीं करता, तो शायद भारत का भविष्य कुछ और हो सकता था।
इन कहानियों का असर ये है, कि भारत का बच्चा बच्चा रूस से प्यार करता है, रूस को अपना बहुमूल्य दोस्त मानता है और अमेरिका भले ही भारत को क्रिटिकल टेक्नोलॉजी दे, लेकिन रूस की बराबरी कोई नहीं कर सकता।

हालिया समय में अमेरिका और भारत ने बार बार एक दूसरे को स्ट्रैटजिक पार्टनर और सहयोगी करार दिया है और इंडो-पैसिफिक में लगातार भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी आखिर वो कौन सी वजह है, कि अमेरिका, भारत के लिए रूस की जगह नहीं ले सकता?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने रूस जा रहे हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से दोनों नेताओं की कुल 16 बार मुलाकात हो चुकी है, लेकिन फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद से कोई द्विपक्षीय मुलाकात नहीं हुई है, जिसके कारण पश्चिमी देशों ने उस पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए थे।
प्रधानमंत्री मोदी पिछली बार सितंबर 2019 में व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक के लिए रूस गए थे और व्लादिमीर पुतिन, पिछली बार दिसंबर 2021 में वार्षिक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के लिए भारत आए थे।
मोदी का रूस दौरा, पश्चिम को संदेश?
लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली द्विपक्षीय यात्रा के लिए रूस को चुनकर मोदी ने एक और खास परंपरा को तोड़ा है। अभी तक देखा गया है, कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय नेता भारत के पड़ोसी देशों की यात्रा करते रहे हैं, लेकिन मोदी ने परंपरा को तोड़ते हुए पहले दौरे के लिए रूस को चुना है। मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के बाद भूटान का दौरा किया था, जबकि 2019 में दूसरी बार चुनाव जीतने के बाद वो मालदीव और श्रीलंका गये थे। हालांकि, इस बार पीएम मोदी ने पिछले महीने इटली की यात्रा की थी, लेकिन वह G7 नेताओं की बहुपक्षीय बैठक के लिए थी।
लिहाजा, मोदी की रूस की यात्रा इस बात का बयान है, कि नई दिल्ली मास्को के साथ अपने संबंधों को कितना महत्व देती है, और भारत की विदेश नीति के लिए रूस कितना मायने रखता है। मोदी और पुतिन लगभग उसी समय मिलेंगे, जब उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के 32 देशों के नेता 9 से 11 जुलाई को वाशिंगटन डीसी में रूस विरोधी सैन्य गठबंधन के 75 साल पूरे होने का जश्न मनाने के लिए जमा होंगे।
रूस के साथ भारत के रिश्ते सात दशक पुराने हैं, लेकिन अभी भी भारतीय नीति निर्माताओं के मन में USSR की उदारता और मित्रता की यादें ताजा हैं और भारत में अभी भी रूस के साथ दोस्ती के किस्से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी सुनाई जाती है।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे भारत ने बहुध्रुवीय दुनिया में अपने रिश्तों में विविधता लाई है, भारत-रूस संबंध कुछ क्षेत्रों में स्थिर हो गए हैं और कई क्षेत्रों में कमजोर पड़ गए हैं। डिफेंस सेक्टर, अब तक की रणनीतिक साझेदारी का सबसे मजबूत स्तंभ है, जिसमें परमाणु और अंतरिक्ष सहयोग भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भारत-रूस डिफेंस पार्टनरशिप
शीत युद्ध के दशकों के दौरान USSR भारत के रक्षा उपकरणों का मुख्य आपूर्तिकर्ता था, और अब भी, भारत के 60 से 70 प्रतिशत रक्षा उपकरण रूसी और सोवियत मूल के ही हैं। दोनों देशों के रक्षा सहयोग, समय के साथ खरीदार-विक्रेता ढांचे से विकसित होकर संयुक्त रिसर्च एवं डेवलपमेंट, को-डेवलपमेंट और संयुक्त उत्पादन से जुड़ा हुआ हो गया है।
भारत और रूस ने S-400 ट्रायम्फ मोबाइल सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, मिग-29 लड़ाकू विमान और कामोव हेलीकॉप्टर की आपूर्ति और टी-90 टैंक, एसयू-30एमकेआई लड़ाकू विमान, एके-203 असॉल्ट राइफल और ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारतीय नौसेना के दो एयरक्राफ्ट कैरियर में से एक INS विक्रमादित्य पूर्व सोवियत और रूसी युद्धपोत एडमिरल गोर्शकोव है।
लेकिन, पिछले 25 सालों में भारत ने हथियार खरीदने के लिए अलग अलग देशों का रूख किया है, जिसमें अमेरिका, इजराइस, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश शामिल हैं। हालांकि, इसके बाद भी भारत, पूरी तरह से रूस से मुंह नहीं मोड़ सकता है। भारत के लिए रूस से उपकरणों और पुर्जों की नियमित और विश्वसनीय आपूर्ति होना जरूरी है, और भारत को ये भी सुनिश्चित करना होगा, कि मास्को अपनी संवेदनशील रक्षा तकनीकों को बीजिंग के साथ शेयर नहीं करे।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष और रूस में भारत के पूर्व राजदूत पी एस राघवन ने 2022 में लिखा था, कि "राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है, कि रूस भारत के साथ शेयर की गई सैन्य टेक्नोलॉजी को किसी अन्य देश को ट्रांसफर नहीं करता है। और भारत को इस बात की तहकीकात करते रहनी चाहिए, कि रूस, चीन के साथ गोपनीय सैन्य जानकारियां शेयर ना करे।"

भारत और रूस में बढ़ा कारोबार
यूक्रेन में युद्ध की शुरुआत के बाद से, भारत कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के मुद्रास्फीति प्रभाव को कम करने के लिए बड़ी मात्रा में रूसी तेल को भारी डिस्काउंट पर खरीद रहा है। अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का सामना करते हुए भी, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नवंबर 2022 में अपनी मास्को यात्रा के दौरान दोहराया, कि भारत भारतीय उपभोक्ताओं के हित में रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा।
रूसी कच्चे तेल की खरीद ने द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा को उम्मीदों और लक्ष्यों के पार कर दिया है। युद्ध से पहले, 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य 30 अरब डॉलर निर्धारित किया गया था। लेकिन वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार 65.70 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि व्यापार संतुलन काफी हद तक रूस के पक्ष में है और भारत ने रूस से 61.44 अरब डॉलर के सामान खरीदे हैं।
पश्चिम और चीन पर भारत की नजर
मोदी की रूस यात्रा भारत और पश्चिमी देशों के बीच कई बैठकों के कुछ दिनों बाद हो रही है। जी-7 में मोदी ने यूक्रेन के नेता के अलावा पश्चिमी देशों के नेताओं से भी मुलाकात की थी। उसके बाद अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने नई दिल्ली का दौरा किया था। इसके बाद कांग्रेसी माइकल मैककॉल और पूर्व अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी के नेतृत्व में अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने धर्मशाला में दलाई लामा और शीर्ष भारतीय नेतृत्व से मुलाकात की थी।
भारत के नजरिए से, मोदी की यात्रा दोनों देशों के नेताओं के बीच 2000 से चल रही वार्षिक द्विपक्षीय शिखर बैठकों की श्रृंखला का हिस्सा है। रणनीतिक साझेदारी में सर्वोच्च संस्थागत संवाद तंत्र, 21 शिखर सम्मेलन अब तक भारत और रूस में हो चुके हैं।
दिसंबर 2021 में अपने आखिरी शिखर सम्मेलन के बाद से, मोदी और पुतिन ने द्विपक्षीय सहयोग पर प्रगति की समीक्षा करने और आपसी हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए कम से कम 10 बार टेलीफोन पर बात की है।
इसके अलावा, पीएम मोदी रूस के दौरे के साथ अमेरिका को भी संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी CIA खालिस्तान का खुला समर्थन कर रही है और भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में मदद दे रही है। वहीं, मानवाधिकार को लेकर भी बाइडेन प्रशासन भारत को आंखे दिखा रहा है और मोदी चाहते हैं, कि अमेरिका दोस्ती की बराबरी के सिद्धांत का पालन करे, ना कि गैर-बराबरी रिश्ता कायम करने की कोशिश करे।












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