manipur violence: यूरोपीय संसद ने मणिपुर हिंसा की निंदा की, स्ट्रासबर्ग में आज होगी ‘तत्काल बहस’, कल वोटिंग
मणिपुर 2 महीने से भी अधिक समय से जातीय संघर्ष की आग से झुलस रहा है। मैतेई और कुकी गुटों की हिंसा के बीच इस हिंसा में 142 लोगों की जान गई है और 40 हजार से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं।
इस बीच ये मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने लगा है। मणिपुर में हिंसा और केंद्र सरकार की ओर से देर से की गई कार्रवाई को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों ने अपनी चिंताएं जतानी शुरू कर दी हैं।

यूरोपीय संसद ने अपने प्रस्ताव में मणिपुर में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार पर लगे आरोपों को लेकर भी चिंता जताई है। इसी बीच यूरोपीय संसद आज बुधवार को स्ट्रासबर्ग में चल रहे अपने पूर्ण सत्र के दौरान मणिपुर में जारी जातीय हिंसा पर एक प्रस्ताव पर 'तत्काल बहस' करेगी।
मणिपुर में जातीय हिंसा को लेकर एक 'तत्काल बहस' आयोजित करने जा रही है। इसे लेकर यूरोपीय संसद ने चर्चा के लिए एक प्रस्ताव जारी किया है। प्रस्ताव के मुताबिक बहस के दौरान 'लोकतंत्र और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले- मणिपुर में कानून का शासन' पर चर्चा की जाएगी। अगले दिन यानी 13 जुलाई को इस प्रस्ताव पर मतदान किया जायेगा।
यह घटनाक्रम छह संसदीय समूहों द्वारा यूरोपीय संघ की संसद में एक प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद आया है, जिसमें वामपंथी, यूरोपीय सोशलिस्ट और ग्रीन्स से लेकर क्षेत्रीय दल, कंजर्वेटिव और केंद्र-दक्षिणपंथी राजनीतिक और क्रिस्टियन ग्रुप शामिल हैं।
इस प्रस्ताव में मणिपुर में चल रही हिंसा की निंदा की गई और भाजपा पार्टी के प्रमुख सदस्यों द्वारा की गई राष्ट्रवादी बयानबाजी की निंदा की गई है। यूरोपीय संसद ने भारत सरकार और स्थानीय अधिकारियों से प्रभावित लोगों को निर्बाध मानवीय सहायता की अनुमति देने और स्वतंत्र मॉनिटरों से जांच करने का आह्वान किया।
इस दौरान सभी पक्षों से संयम बरतने और राजनीतिक नेताओं से विश्वास को फिर से स्थापित करने और तनाव में मध्यस्थता करने के लिए निष्पक्ष भूमिका निभाने के लिए भड़काऊ बयान बंद करने का आग्रह किया गया है।
बता दें कि इससे पहले भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने मणिपुर हिंसा को मानवीय चिंता का विषय बताया था। अमेरिकी राजदूत कहा था कि मणिपुर में स्थिति से निपटने के लिए यदि कहा गया तो अमेरिका, भारत की मदद करने के लिए तैयार है। गार्सेटी ने कहा, हम जानते हैं कि ये एक आंतरिक मामला है और हम यहां जल्द से जल्द शांति होने की प्रार्थना करते हैं।
क्यों शुरू हुई हिंसा?
मणिपुर में आधी जनसंख्या मैतेई समुदाय के लोगों की है। ये सभी लोग राज्य के लगभग 10 फीसदी क्षेत्रफल में फैली इंफाल घाटी में रहते हैं। मैतेई समुदाय को राज्य के पहाड़ी इलाकों में बसने की इजाजत नहीं है।
मैतेई समुदाय के लोगों का तर्क है कि 1949 में भारतीय संघ में विलय से पूर्व उन्हें रियासतकाल में जनजाति का दर्जा प्राप्त था। उन्हें भी जनजाति का दर्जा मिले। मैतेई समुदाय का यह भी कहना है कि बीते 70 सालों में उनकी आबादी 62 फीसदी से घटकर 50 फीसदी से कम हो चुकी है। ऐसे में अब उन्हें भी अल्पसंख्यक के अधिकार मिलने चाहिए।
मैतेई समुदाय की मांग पर मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मैतेई समुदाय की डिमांड पर विचार करे और 4 महीने के भीतर केंद्र को रिकमेंडेशन भेजे। लेकिन नागा और कुकी जनजातियों को अब डर है कि एसटी वर्ग में मैतेई को आरक्षण मिलने से उनके अधिकारों में बंटवारा होगा।












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