चीन के 'सुपर प्लान' को मात देने की यूरोप की तैयारी, कितनी मिलेगी सफलता
यूरोपीय संघ एक ऐसी वैश्विक निवेश योजना की घोषणा करने वाला है जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है.
सूत्रों का कहना है कि इस व्यापक योजना में डिजिटल, परिवहन, जलवायु और ऊर्जा योजनाओं पर 'ठोस' क़दम शामिल होंगे. इसे अफ़्रीका और अन्य जगहों पर चीनी प्रभाव का मुकाबला करने के पश्चिम के प्रयासों के तौर पर देखा जा रहा है.
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यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन बुधवार इसी 'ग्लोबल गेटवे' इनिशिएटिव को दुनिया के सामने पेश करेंगी. यूरोपीय संघ देख रहा है कि वो कैसे अपने सदस्य देशों, वित्तीय संस्थानों और निजी क्षेत्र के अरबों यूरो का फ़ायदा उठा सकता है.
वॉन डेर लेयेन ने सितंबर में अपने 'स्टेट ऑफ़ द यूनियन' भाषण में कहा था, "हम दुनिया भर में उच्च गुणवत्ता वाले बुनियादी ढांचे में निवेश करना चाहते हैं ताकि लोगों को सामान (गुड्स) और सेवाओं (सर्विसेज़) से जोड़ा जा सके.
बुधवार को जारी होने वाले 14 पन्नों के दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से खुद को चीन की रणनीति के प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करने की संभावना नहीं है. मंगलवार को भी इस योजना के बारे में पूछे जाने पर यूरोपीय आयोग ने चीन का उल्लेख तक करने से भी परहेज़ किया.
लेकिन जर्मन मार्शल फंड के एक वरिष्ठ ट्रान्साटलांटिक फेलो एंड्रयू स्मॉल का कहना है कि संकेत साफ़ हैं, "अगर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव नहीं होता तो 'ग्लोबल गेटवे' भी नहीं होता."
एंड्रयू स्मॉल कहते हैं, "ये यूरोप की ओर से उन देशों के लिए एक विकल्प की तरह होगा. जो चीन से लोन लेते हैं उनके पास एक और विकल्प होगा. ये यूरोप की पहली गंभीर कोशिश है."
चीन का BRI
बेल्ट एंड रोड चीन की विदेश नीति का केंद्र बिंदु रहा है. इसके तहत चीन ने नई सड़कें, बंदरगाहें, रेलवे और पुलों में पैसा लगाकर अपने व्यापारिक संबंधों को दुनिया भर में विकसित किया है.
चीन की ये रणनीति एशिया, इंडो-पैसिफिक, अफ्रीका और यहां तक कि यूरोपीय संघ के पड़ोस तक पहुंच गई है. चीन की इस नीति को 'कर्ज़े का फंदा' और 'ऋण के जाल में फंसाना' जैसी संज्ञाएं दी गई हैं.
लेकिन कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तस्वीर दरअसल इससे कहीं अधिक जटिल है क्योंकि एक बड़ी रकम उधार लेना, जोखिम-मुक्त नहीं होता. इसके अलावा चीन इन देशों की एक ऐसी ज़रूरत पूरी कर रहा है जो दुनिया के दूसरे देश नहीं कर रहे.
जो भी हो, पश्चिम के साथ तनाव बढ़ने के साथ-साथ दुनिया भर में चीन के आर्थिक और भू-राजनीतिक पदचिह्न बढ़ रहे हैं.
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यूरोप की क्या है मंशा
इस क़दम से यूरोपीय संघ अपने दबदबे और संसाधनों को एक दिशा देने का प्रयास करेगा. एंड्रयू स्मॉल कहते हैं कि यह एक बड़ी परीक्षा होगी
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूरोप वास्तव में इस भू-राजनीतिक क्षेत्र के ज़रिए, चीन को चुनौती दे सकता है. स्मॉल कहते हैं, "सवाल ये भी है कि क्या यूरोपीय संघ आंतरिक नौकरशाही की लड़ाई में बहुत अधिक फंस गया है? अगर यूरोप इस प्रयास में असफल होता है, तो यह एक बड़ी चूक होगी."
एक राजनयिक ने बीबीसी को बताया, "आख़िरकार यूरोप इस मुद्दे पर अपनी छाप छोड़ने का प्रयास कर रहा है. यह एक अच्छा संकेत है. साथ ही ये हमारे मित्र देशों - अमेरिका और ब्रिटेन के साझा हितों से भी मेल खाता है."
लेकिन सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के सीनियर फेलो स्कॉट मॉरिस के अनुसार- इस क़दम से प्रतिस्पर्धा और अधिक बढ़ सकती है. अमेरिका ने भी पिछले साल जून में "बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड" पहल लॉन्च की थी. मॉरिस कहते हैं, "यह एक बहुत ही भीड़भाड़ वाला बाज़ार है जहां बहुत सारे ब्रांड एक-दूसरे से कंमीट करते हैं."
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हालांकि स्कॉट मॉरिस को उम्मीद है कि ग्लोबल गेटवे इनिशिएटिव सफल होगा. मॉरिस कहते हैं, चीन को टक्कर देने से अधिक महत्वपूर्ण बात ये है कि यूरोप उन विकासशील देशों की मदद कर सकता है जिन्हें अपनी स्थिति सुधारने के लिए कर्ज़ चाहिए.
बुधवार को जब यूरोपीय संघ की 'कॉलेज ऑफ कमिश्नर्स' इस योजना को मंज़ूरी दे देगा, तो इसे उर्सुला वॉन डेर लेयेन दुनिया के सामने पेश कर देंगी.
यूरोपीय संघ ने अपने मूल्य पर आधारित और पारदर्शी दृष्टिकोण पर स्पष्ट रूप से ज़ोर दिया है. उनका तर्क है कि वे देशों से रिश्ते क़ायम करना चाहते हैं उन्हें 'यूरोप पर निर्भर' नहीं बनाना चाहते.
लेकिन ये सारे प्रयास अपना प्रभाव बढ़ाने की दिशा में भी हैं. यूरोपीय संघ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी ताक़त दिखाना चाहता है और साथ ही ये भी जानने की कोशिश कर रहा है कि वो दरअसल उसकी ताक़त का कितना असर होता है.
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