• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

चीन सीमा पर तनाव के बावजूद गोली क्यों नहीं चलती?

By आदर्श राठौर - बीबीसी संवाददाता

भारत और चीन के सैनिक संयुक्त युद्धाभ्यास में
Getty Images
भारत और चीन के सैनिक संयुक्त युद्धाभ्यास में

भारत और चीन के बीच डोकलाम में गतिरोध बने हुए 2 महीने से ज़्यादा का वक़्त हो चुका है. दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं और नेताओं की तरफ़ से बयानबाज़ी भी चल रही है.

माहौल बेशक तनावपूर्ण है मगर अब तक दोनों देशों ने संयम बरता हुआ है. इतना तनाव होने के बावजूद किसी तरह की हिंसा की ख़बर नहीं है. रिश्तों में तल्ख़ी आ जाने के बावजूद भारत और चीन सीमा पर जिस तरह की चुप्पी है, वैसी ही पाकिस्तान सीमा पर क्यों नज़र नहीं आती?

भारत और पाकिस्तान की सीमा पर अक्सर फ़ायरिंग की खबरें आती हैं और आए दिन दोनों पक्षों के जवान भी मारे जाते हैं. जबकि चीन के साथ तनाव होने बावजूद बात हाथापाई से आगे नहीं बढ़ती. ऐसे में सवाल उठता है कि पाकिस्तान और भारत की सीमा पर सैनिकों में वह संयम क्यों नहीं दिखता जो चीन और भारत की सीमा पर दिखता है?

चीन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता बताते हैं कि भारत और चीन ने समझौतों के तहत तय किया है कि मतभेद कितने भी हों, बॉर्डर पर हम उत्तेजना पर काबू रखेंगे. उन्होंने बताया कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन आए थे, तब दोनों देशों ने आधारभूत राजनीतिक मापदंड तय किए गए थे, जिन्हें बाद में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दोहराया गया.

डोकलाम विवाद पर चीन ने जापान को धमकाया

सैनिकों की तैनाती के लिए तय हैं ख़ास नियम

सैबल बताते हैं, 'दोनों देशों ने यह तय किया है कि फ्रंटलाइन पर जो भी सैनिक तैनात होंगे, उनके पास या तो हथियार नहीं होंगे और अगर रैंक के हिसाब से अफ़सरों के पास बंदूक होगी तो उसका नोज़ल मोड़कर ज़मीन की तरफ़ किया गया होगा. इसीलिए आज आप देखें तो वीडियो में ये सैनिक कुश्ती करते नज़र आते हैं, मगर कभी गोली नहीं चलती.' उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई समझौता पाकिस्तान के साथ नहीं हुआ है.

1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद की एक तस्वीर
Getty Images
1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद की एक तस्वीर

भारत और चीन के सैनिकों के बीच जब कभी हाथापाई की नौबत आती भी है, तो उसमें कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखा जाता है. सैबल बताते हैं कि चीन और भारत के सैनिकों के जो वीडियो सामने आए हैं, उन्हें ध्यान देखा जाए तो वे बच्चों की तरह कुश्ती करते दिखते हैं. उन्होंने बताया, 'वे एक-दूसरे को धकेलते हैं, गिरते हैं, उठते हैं. आपने देखा होगा कि कोई किसी को थप्पड़ नहीं मारता. थप्पड़ मारना अपमान का प्रतीक होता है. इसलिए वे अपने हाथ को भी इस्तेमाल नहीं करते. अगर ऐसा हुआ तो वे गुस्से पर नियंत्रण खो देंगे.'

क्या भारत के पक्ष में हैं डोकलाम के हालात?

लगातार समझौते करते रहे हैं भारत और चीन

मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता बताते हैं कि 1975 में आख़िरी बार भारत और चीन के सैनिकों के बीच गोली चली थी. इसमें कोई नुकसान नहीं हुआ था मगर इसके बाद से अब तक ऐसी घटना नहीं दोहराई गई. वह बताते हैं कि लगातार समझौते करके भारत और चीन ने लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल पर समस्याओं को बैकबर्नर पर डाल दिया है.

वह बताते हैं, '1993 में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए मेनटेनेंस ऑफ पीस ऐंड ट्रैंक्विलिटी समझौते पर दस्तख़त हुए, उसके बाद 1996 में कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेज़र्स पर समझौता हुआ. इसके बाद 2003, 2005 में भी समझौते हुए. 2013 में बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट हुआ जो सबसे ताज़ा समझौता है.'

भारत और चीन के सैनिक
Getty Images
भारत और चीन के सैनिक

उनका कहना है कि जहां भारत और चीन की सीमा तय नहीं है, वहां पर दोनों शांति बनाए रखते हैं और इन समझौतों की वजह से ही कोई गोली नहीं चली है. उन्होंने कहा, 'दोनों देशों ने तय किया है कि जब हमारे आर्थिक और नागरिक संबंध अच्छे और परिवक्व हो जाएंगे, तब जाकर हम सीमाओं के मसले सुलझाएंगे.'

डोकलाम विवाद: क्या अमरीका से डर रहा है चीन?

पाकिस्तान के साथ नहीं है ऐसा कोई समझौता

अशोक मेहता कहते हैं कि पाकिस्तान से 1949 के आख़िर में कराची समझौते के तहत सीज़फ़ायर लाइन मार्क की गई थी. 1965 साल की लड़ाई में भी इस लाइन में कोई तब्दीली नहीं आई मगर 1971 में जब भारत के पास पाकिस्तान के 90 हज़ार सैनिक युद्धबंदी थे, तब सीज़फ़ायर लाइन को लाइन ऑफ़ कंट्रोल बनाया गया. उन्होंने कहा कि इस लाइन पर सीज़फ़ायर को लेकर कोई अग्रीमेंट नहीं रहा.

उन्होंने कहा, 'जब मुशर्रफ प्रेसीडेंट और आर्मी चीफ़ थे, तब नवंबर 2003 में पाकिस्तान की तरफ से एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग आया कि लाइन ऑफ़ कंट्रोल के ऊपर सीज़फायर होना चाहिए. और मुशर्रफ साहब जब तक प्रेजिडेंट थे, वह सीज़फायर कायम रहा और 80 फ़ीसदी कामयाब भी रहा. मगर 2008 में वह प्रेसीडेंट नहीं रहे और समझौते का महत्व घटता चला गया. आज हालात ये हैं कि लाइन ऑफ कंट्रोल आज लाइन ऑफ नो कंट्रोल बन गया है. यहां पर सीज़फायर नहीं है.'

मुशर्रफ़ और वाजपेयी
AFP
मुशर्रफ़ और वाजपेयी

वहीं पाकिस्तान को लेकर वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता बताते हैं कि नवाज़ शरीफ और नरेंद्र मोदी ने तमाम मसलों के बावजूद पहल तो की थी. मगर पाकिस्तान और भारत में कुछ ऐसे तत्व हैं, खासकर टीआरपी के पीछे पड़ा रहने वाला मीडिया, जो आग लगाने में लगा रहता हैं. इससे भी शांति बने रहने की संभावना कम हो जाती है. उन्होंने कहा, 'पाकिस्तान हमारे लिए ऑब्सेशन है और कश्मीर पाकिस्तानियों के लिए. इसके बाहर वे सोच नहीं सकते.'

नज़रिया: डोकलाम विवाद पर चीन क्यों है बैकफ़ुट पर?

मगर अब टूटता दिख रहा है संयम

पिछले दिनों लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच कथित पत्थरबाज़ी का एक वीडियो सामने आया था. क्या दोनों देशों के सैनिकों का संयम टूट रहा है? इस बारे में सैबल चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं, 'अगर वाकई ऐसा हुआ है तो शांति का सिलसिला टूट रहा है और भयानक परिस्थिति की तरफ़ हम जा रहे हैं. इतिहास देखें तो हर बार राजा युद्ध नहीं करवाते. युद्ध कई बार ग़लती से होते हैं.'

भारत और चीन के सैनिक
Getty Images
भारत और चीन के सैनिक

उन्होंने कहा, 'चीन और भारत की तरफ से जो सैनिक तैनात हैं, वे 21-22 साल से युवा लड़के हैं. उनके भी परिवार हैं, जो रेडियो सुनते हैं, टीवी देखते हैं. मीडिया उत्तेजना फैला रहा है, जिसका असर उनपर भी पड़ता है. उनकी सरकार कितना भी कहे कि शांति बनाए रखो, मगर संयम टूट सकता है और ग़लती हो सकती है.'

चीनी मीडिया ने गिनाए भारत के 'ये सात पाप'

कैसे बनी रह सकती है शांति?

सैबल बताते हैं कि रिस्क बढ़ता जा रहा है क्योंकि गतिरोध दो महीनों से ज़्यादा वक़्त हो गया है. उनका मानना है कि इन हालात से निपटने के लिए तात्कालिक कदम उठाने चाहिए. उन्होने कहा, 'सीमा विवाद को हल करना लंबी कहानी है और चलती रहेगी. मगर अभी इस तनाव को दूर करना ज़रूरी है कि कहीं गोली न चली जाए.'

उन्होंने कहा, 'दोनों देशों के शीर्ष नेताओं, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐलान करें कि बॉर्डर पर चाहे कुछ भी हो रहा हो, हम दोनों देशों का रिश्ता हमारे लिए मायने रखता है. इससे तैनात सैनिकों तक यह बात पहुंचेगी कि हमारे लिए ये रिश्ते अहमियत रखते हैं, बेशक आज गहमागहमी हो रही है तो इसका मतलब यह नहीं कि हम लड़ मरें.'

नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग
Getty Images
नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग

सैबल बताते हैं कि जिनपिंग और मोदी ने इस दिशा में कोशिश तो की है मगर उन्होंने ऐसा कुछ साफ़ संदेश नहीं दिया है. उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि दोनों नेता एक बड़ी राजनीतिक गलती करने जा रहे हैं और इससे भयानक हालात पैदा हो सकते हैं.

भारत-चीन सीमा पर कौन क्या बना रहा है?

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Despite the tension on China border, Why doesn't become firing?
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X