Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

भारत-PAK का ही प्रदूषण से ऐसा क्यों होता है हाल, सबसे ज्यादा धुंआ निकालने वाले चीन-US क्यों रहते हैं बेअसर?

Delhi Pollution: देश की राजधानी दिल्ली गैस चैंबर बन गई है और ऐसा लगता है, और दिल्ली ऐसी दिख रही है, कि मानो किसी ने हवा में कालिख पोत दी है। हर तरफ सिर्फ काला धुआं है, जो किसी भी स्वस्थ इंसान को बीमार करने के लिए काफी है।

सबसे हैरान करने वाली बात ये है, कि तमाम सरकारी दावों के बावजूद हर साल प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता ही जाता है, और हर साल सवाल पूछे जाते हैं, दिल्ली-NCR (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में वायु प्रदूषण के मुख्य कारक कौन हैं? और चीन और अमेरिका जैसे देश, जो भारत की तुलना में काफी ज्यादा धुएं का उत्सर्जन करते हैं, वो साफ सुधरे क्यों दिखते हैं?

Delhi Pollution

भारत के साथ साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश का भी यही हाल है। पाकिस्तान में भी स्कूल कॉलेज बंद हैं और वहां भी प्रदूषण को लेकर जमकर राजनीति की जा रही है, लेकिन बीजिंग, जो लंबे समय से अपने धुंध के लिए कुख्यात रहा है, उसके आंकड़े बताते हैं कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हवा की गुणवत्ता इससे भी बदतर है।

तो दक्षिण एशिया इतना ज्यादा प्रदूषित क्यों है?

स्विस स्थित वायु-गुणवत्ता निगरानी समूह ने पाया है, कि 2023 में दिल्ली, दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी और मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है, कि 2024 में भी यही हाल रहने वाला है। IQAir ने कहा है, कि भारत, जिसकी राजधानी दिल्ली है, उसे पड़ोसी बांग्लादेश और पाकिस्तान के बाद दुनिया का तीसरा सबसे प्रदूषित देश माना गया है।

देश की हवा 2022 के मुकाबले काफी ज्यागा खराब हो गई है, जब यह आठवां सबसे प्रदूषित देश था।

कई भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण सबसे गंभीर समस्या है।

एक्सपर्ट्स का कहना है, कि तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण के साथ-साथ पर्यावरण कानूनों की कमजोर स्थिति ने देश में प्रदूषण बढ़ाने में भूमिका निभाई है। भारत ने पिछले कुछ दशकों में बहुत विकास किया है, लेकिन खराब औद्योगिक रेगुलेशन का मतलब है, कि कारखाने प्रदूषण नियंत्रण उपायों का पालन नहीं करते हैं। तेजी से निर्माण ने भी प्रदूषण के बढ़ते स्तर में योगदान दिया है।

IQAir की रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारत का PM2.5 का औसत स्तर - महीन कण पदार्थ जो फेफड़ों को बंद कर सकता है और कई बीमारियों का कारण बन सकता है, वो 54.4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।

वैश्विक स्तर पर, 12 से 15 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर PM2.5 वाली हवा को सांस लेने के लिए सुरक्षित माना जाता है, जबकि 35 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा मान वाली हवा को अस्वस्थ माना जाता है।

दिल्ली की एयर क्वालिटी, समूचे भारत की एयर क्वालिटी से काफी है और शहर में PM2.5 की रीडिंग 92.7 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर थी। दिल्ली साल भर खराब हवा से जूझती रहती है, लेकिन सर्दियों के दौरान हवा विशेष रूप से जहरीली हो जाती है।

ऐसा होने के पीछे कई वजहें हैं, जिसमें किसानों द्वारा पराली जलाना, इंडस्ट्रियल और गाड़ियों से होने वाला उत्सर्जन, हवा की कम गति और त्योहारों के दौरान पटाखे फोड़ना शामिल है। पिछले साल, सरकार ने जहरीली हवा के कारण लगातार कई दिनों तक स्कूल और कॉलेज बंद रखे थे।

Delhi Pollution

चीन से भी भारत की स्थिति क्यों है विकराल?

शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण आमतौर पर कई वजहों के मिश्रण से होता है, जिनमें ज्यादातर ट्रैफिक जाम, जीवाश्म ईंधन जलाने वाले बिजली संयंत्र और भारी उद्योग से निकलने वाली गंदी हवा शामिल होती है। चीन को भारत से अलग करने वाली बात यह है, कि भारत में अभी भी बहुत ज्यादा पराली जलाई जाती है, जब किसान अपने खेतों को साफ करते हैं।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सहायक प्रोफेसर थॉमस स्मिथ ने बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "इस प्रकरण में, सबसे बड़ी समस्या वास्तव में कृषि जलाना रही है। यह एक ऐसी चीज है, जिससे चीन निपट चुका है। पराली जलाना चीन में प्रतिबंधित कर दिया गया है और उसपर पूर्ण विराम लग चुका है।"

प्रोफेसर स्मिथ बताते हैं, कि "दिल्ली के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में आग की अत्यधिक असामान्य सांद्रता देखी जाती है। और आप यह कम करके नहीं आंक सकते कि कृषि अवशेष जलाना कितना महत्वपूर्ण है, भले ही लोग अक्सर कारों और भारी उद्योग को ही आग का कारण मानते हों।"

विकराल स्थिति को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के आस-पास के राज्यों में पराली जलाने पर रोक लगाने का आदेश दिया। लेकिन शहर की स्थिति सर्दियों की ठंडी हवा के कारण और भी खराब हो गई है। प्रोफेसर स्मिथ यह भी बताते हैं, कि "जबकि भारत काफी हद तक प्रतिक्रियात्मक है, बीजिंग समस्याओं को पहले से ही रोकने की कोशिश करने के लिए ज्यादा सक्रिय रहा है"।

यूरोप से भारत की तुलना

आज यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में प्रदूषण का स्तर, भारत में पिछले कुछ दिनों में दर्ज किए गए चरम स्तर से काफी कम है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। उदाहरण के लिए, लंदन 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में अपने प्रदूषण के लिए कुख्यात था।

1952 के आखिर में 'ग्रेट स्मोग' ने लंदन को प्रदूषण की एक मोटी जहरीली परत से ढक दिया था, जिससे शहर कई दिनों तक लगभग ठहर सा गया था, ठीक वैसा ही, जैसा कि आज दिल्ली में है। ऐसा माना जाता है कि इसके कारण हजारों लोगों की मौत हुई थी।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लंदन में प्रदूषकों का मिश्रण अलग था, लेकिन "संभवतः यह दिल्ली में वर्तमान में हो रहे प्रदूषकों से बहुत अलग नहीं था।" उस समय, टेम्स के किनारे स्थित बिजलीघर ब्रिटिश राजधानी में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते थे। वास्तव में - वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में आज हम जो कुछ भी जानते हैं, वह उन वर्षों के दौरान लंदन में छाए धुंध के अनुभवों से जुड़ा है।

Delhi Pollution

अमेरिका ने प्रदूषण पर कैसे लगाई लगाम?

1960 के दशक में अमेरिका में भी, औद्योगिक गतिविधि, फैक्ट्री प्रदूषण और ऑटोमोबाइल की वजह से प्रदूषित पानी और हवा में दिखाई देते थे। पीले रंग का धुआं और गिरती राख ने अमेरिकी शहरों को ढक दिया था। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क शहर की हवा इतनी प्रदूषित थी, कि आप उसे छू सकते थे। 1950 और 60 के दशक में न्यूयॉर्क में सैकड़ों लोग वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से मर गए।

जिसके बाद पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं और बढ़ती शिक्षा ने कार्यकर्ताओं और राजनेताओं को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया और आखिरकार आधुनिक पर्यावरण आंदोलन शुरू हुए। अगले दशक की शुरुआत, 1970, ने पहला पृथ्वी दिवस मनाया, जिसके तुरंत बाद देश में आज तक के सबसे महत्वपूर्ण वायु प्रदूषण रेगुलेशन के कुछ रूप सामने आए।

20वीं सदी में अमेरिका ने प्रदूषण से निपटने के लिए कई कदम उठाए, जिसका असर प्रमुख शहरों में हवा और अमेरिकियों के स्वास्थ्य दोनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन कानूनों ने 50 वर्षों में अनुमानित 230,000 अकाल मौतों को रोका। और कानून निर्माताओं ने पिछली सदी की नीतियों पर काम करना जारी रखा है। 2022 में ही, कांग्रेस ने मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम पारित किया, जिसने एयर क्वालिटी की निगरानी बढ़ाने सहित स्वच्छ वायु उपायों में 270 मिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया।

20वीं सदी में अमेरिका में फैक्ट्रियों को रेगुलेट किया गया है और कारों, यहां तक कि बिजली संयंत्रों को भी स्वच्छ बनाया गया। जंगल की आग रोकने के लिए कई कदम उठाए गये।

कितना खतरनाक था अमेरिका में प्रदूषण?

साल 1945 के बाद, जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुआ था, तो अमेरिका में जनसंख्या में तेजी से इजाफा होना शुरू हुआ और 1940 में 13 करोड़ की लोगों की आबादी से बढ़कर 1960 में 18 करोड़ की आबादी हो गई। इसके साथ ही, अमेरिका में तेजी से शहरीकरण और औद्योगिकीकरण हुए। 1945 में, अमेरिकी सड़कों पर 26 मिलियन ऑटोमोबाइल थे। 1960 के दशक के अंत तक, 100 मिलियन वाहन थे।

1950 और 60 के दशक के दौरान, कार के धुएं, बिजली संयंत्र प्रदूषण और लैंडफिल से संबंधित धुंध ने लॉस एंजिल्स और न्यूयॉर्क शहर सहित तट से तट तक अमेरिकी शहरों को ढक दिया। अमेरिका में, मानव निर्मित स्रोतों ने 1970 में हवा में नाइट्रोजन ऑक्साइड, गैर-मीथेन वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों और सल्फर डाइऑक्साइड के 92 मिलियन टन से अधिक उत्सर्जन किया। वायु प्रदूषण, विशेष रूप से इस गंभीर स्तर पर, श्वसन संक्रमण, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकता है। यह विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा जैसी पहले से ही बीमार लोगों के लिए खतरनाक है।

लेकिन, अमेरिका सही समय पर जाग गया और अब अमेरिकी शहर साफ हो चुके हैं। धुंध का दौर खत्म हो चुका है और भारत को भी सख्त कदम उठाने की जरूरत है, ताकि शहर में फैला स्याह हवा साफ हो सके और तभी, लोगों की जान बचाई जा सकती है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+