Deep sea mining: समुद्र की अथाह गहराइयों में होगी खुदाई, इंसानी लालच का सबूत है डीप सी माइनिंग, जानें क्या है?
What is Deep Sea Mining: यूनाइटेड नेशंस की एक शाखा, अंतर्राष्ट्रीय सीबेड अथॉरिटी...जो दुनिया के महासागरों के तल को नियंत्रित करती है, वो महासागरों के तल की खुदाई कर उससे खनिज पदार्थ निकालने के लिए जल्द ही परमिट जारी करने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूनाइटेड नेशंस की ये संस्था परमिट जारी करने से पहले बैठक करने वाली है, जिसके बाद खनन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीबेड को खोला डजा सकता है।
इसका मकसद हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण सामग्री को समुद्र के तल की खुदाई कर बाहर निकालना है, ताकि प्रदूषण को कंट्रोल किया जा सके। समुद्र तल की खुदाई को लेकर ये बातचीत पिछले कई सालों से चलती आ रही है और अब ये बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचती हुई दिखाई दे रही है, जहां प्राधिकरण को जल्द ही खनन परमिट आवेदन स्वीकार करना शुरू करना होगा।

समुद्र की अथाह गहराइयों में की जाएगी खुदाई
हालांकि, डीप सी माइनिंग का मकसद जलवायु परिवर्तन को रोकना है, लेकिन अगर ऐसा शुरू होता है, को फिर समुद्री पारिस्थितिक तंत्र और गहरे समुद्र में रहने वाले जलीय जीवों के आवासों को काफी गहरा नुकसान होगा।
दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियों ने डीप सी माइनिंग को लेकर दिलचस्पी दिखाई है और परमिट हासिल करने के लिए ये कंपनियां आवेदन भी कर रही हैं, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों ने डीप सी माइनिंग को लेकर गहरी चिंता जताई है और कहा है, कि हवा खराब करने के बाद अब इंसान समुद्र को भी बर्बाद करने जा रहा है।
गहरे समुद्र में खनन क्या है?
डीप सी माइनिंग, यानि गहरे समुद्र में तल की खुदाई करना और फिर समुद्र तल के नीचे छिपे खनिज भंडार और धातुओं को बाहर निकालना है। इस तरह के खनन तीन प्रकार के होते हैं, समुद्र तल से जमा-समृद्ध पॉलीमेटेलिक नोड्यूल को निकालना, समुद्र तल में बड़े पैमाने पर जमा सल्फाइड का खनन करना और समुद्री चट्टानों से कोबाल्ट क्रस्ट को अलग करना।
समुद्र के अंदर का वो भाग, जहां की गहराई 200 मीटर से ज्यादा है, उसे डीप सी कहा जाता है और इस क्षेत्र से खनिज पदार्थ निकालने की प्रक्रिया को गहरे समुद्र में खनन कहा जाता है। डीप सी माइनिंग के जरिए समुद्र तल से निकेल, दुर्लभ अर्थ मैटेरियल, कोबाल्ट के साथ साथ और भी बहुत सारे धातुओं को बाहर निकालना है, जिनसे बैट्री और सेमिकंडक्टर चिप का निर्माण होता है।
गहरे समुद्र में खनन के लिए उपयोग की जाने वाली इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी अभी भी विकसित हो रही हैं। कुछ कंपनियां बड़े पैमाने पर पंपों का उपयोग करके समुद्र तल से सामग्री को वैक्यूम करना चाह रही हैं। वहीं, अन्य लोग आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी आधारित तकनीक भी विकसित कर रहे हैं, जो गहरे समुद्र के रोबोटों को फर्श से गांठें निकालना सिखाएंगी।
कुछ कंपनियां और वैज्ञानिक, एडवांस मशीनों का उपयोग करना चाह रहे हैं, जो विशाल पानी के नीचे के पहाड़ों और ज्वालामुखियों से खनिज सामग्री का खनन कर सकें। कंपनियां और सरकारें इन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संसाधनों के रूप में देखती हैं, जिनकी दुनिया को जरूरत होने वाली है, क्योंकि धरती पर मौजूद ये पदार्थ अब खत्म हो रहे हैं और इनकी डिमांड लगातार बढ़ रहे हैं।
जंगल के बाद समुद्री आवास उजाड़ने की कोशिश
लेकिन, डीप सी माइनिंग से गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों के आवास नष्ट हो जाएंगे और उनका पारिस्थितिक तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। यानि, जंगल को उजाड़ने वाला इंसान, अब समुद्री आवास को उजाड़ने की जोर-शोर से तैयारी कर रहा है।
जीव वैज्ञानिकों का कहना है, कि डीप सी माइनिंग के बाद समुद्र का पानी जहरीला हो सकता है, वहीं खनन उपकरणों के चलने से, उनके कंपन से और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जहरीले उत्पाद उत्पन्न होंगे, जिससे व्हेल मछलियां, टूना और शार्क जैसी मछलियों के अस्तित्व पर संकट मंडराना शुरू हो जाएगा।
डीप सी माइनिंगे के जानकारों के मुताबिक, गहरे समुद्र तल का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही अभी तक खोजा गया है और संरक्षणवादियों को चिंता है, कि खनन से पारिस्थितिक तंत्र को गहरा नुकसान होगा, खासकर बिना किसी पर्यावरणीय प्रोटोकॉल के।
खनन से होने वाले नुकसान में शोर, कंपन और प्रकाश प्रदूषण, साथ ही खनन प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले ईंधन और अन्य रसायनों के संभावित रिसाव और फैलाव शामिल हो सकते हैं, जिससे जलीय जीव खत्म हो सकते हैं। हालांकि, यूएन ने डीप सी माइनिंग को लेकर कई नियम बनाए हैं और उस आधार पर परमिट देने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, लेकिन इतना तो यह है, कि इंसान अपनी लालच में अब समुद्री जीवों की बस्ती उजाड़ने निकल पड़ा है।
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