Explainer: 'घर में घुसकर मारेंगे' की नीति ने फंसाया? क्या भारत से संबंध बिगाड़ने की हिम्मत अमेरिका में है?

India-US Ties: अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमंट ने न्यूयॉर्क में खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने की असफल साजिश में भारत सरकार के एक अधिकारी की भूमिका का आरोप लगाने के बाद, भारत और अमेरिका एक बड़ी राजनयिक मुश्किल स्थिति का सामना कर रहे हैं। ये एक ऐसा मामला है, जिसपर अमेरिका गंभीर बनने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन अमेरिका इस स्थिति में भी नहीं है, कि वो भारत के खिलाफ कोई सख्त एक्शन ले पाए।

जस्टिस डिपार्टमेंट के विस्फोटक आरोप, भारत और अमेरिका के संबंधों पर असर डाल सकते हैं, भले ही दोनों पक्षों ने अब तक नपी-तुली प्रतिक्रियाएं दी हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है, कि अभी तक भारत की प्रतिक्रिया कनाडा के मामले से "काफी अलग" रही है, जब तीन महीने पहले की कनाडा के प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारतीय सरकारी एजेंसियों को खालिस्तान अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से जोड़ा था।

india us Gurpatwant Singh Pannun conflict

लेकिन, क्या अमेरिका ऐसी स्थिति में है, कि वो भारत से संबंध खराब करने की स्थिति तक जा पाए और इस मुद्दे को लेकर भारत और अमेरिका के बीच के संबंधों में तनाव किस हद तक जाएगा, आइये समझते हैं।

अमेरिका ने क्या लगाया है आरोप?

बुधवार (29 नवंबर) को खोले गए जस्टिस डिपार्टमेंट के अभियोग के मुताबिक, मैनहट्टन संघीय अदालत में अभियोजकों ने 52 साल के निखिल गुप्ता नाम के एक भारतीय नागरिक पर एक भारतीय अधिकारी के निर्देश पर जून में खालिस्तानी अलगाववादी पन्नुन की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया। अमेरिका ने इस भारतीय अधिकारी की पहचान गोपनीय रखी है और उसका कोडवर्ड में नाम CC-1 दिया है, जिसे अमेरिका ने मुख्य साजिशकर्ता करार दिया है।

रॉयटर्स के मुताबिक, अभियोजकों ने आरोप लगाया है, कि भारतीय अधिकारी, जिनकी जिम्मेदारियों में सुरक्षा और खुफिया जानकारी शामिल थी, उन्होंने हत्या की साजिश रचने के लिए मई में निखिल गुप्ता को काम पर रखा था।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है, कि अमेरिकी न्याय विभाग के अभियोग में इस भारतीय अधिकारी को पहले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में कार्यरत और "युद्ध शिल्प" और "हथियारों" में "अधिकारी प्रशिक्षण" प्राप्त करने के रूप में संदर्भित किया गया है।

अभियोग का हवाला देते हुए, द वाशिंगटन पोस्ट ने रिपोर्ट किया है, कि "जून में, भारत सरकार के कर्मचारी ने निखिल गुप्ता को पन्नून के घर का पता, उसके फोन नंबर और उसके दैनिक आचरण के बारे में जानकारियां दी थी, जिसमें निगरानी तस्वीरें भी शामिल थीं, जिसे निखिल गुप्ता ने गुप्त डीईए (ड्रग एन्फोर्समेंट) को दिया, जो एक अंडरकवर अमेरिकी एजेंट था।"

मैनहट्टन में शीर्ष संघीय अभियोजक डेमियन विलियम्स ने कहा, कि "प्रतिवादी ने भारत से यहीं न्यूयॉर्क शहर में भारतीय मूल के एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रची, जिसने सार्वजनिक रूप से सिखों के लिए एक संप्रभु राज्य की स्थापना की वकालत की है।"

निखिल गुप्ता को जून में चेक गणराज्य में गिरफ्तार कर लिया गया और अमेरिका उसके प्रत्यर्पण के लिए चेक गणराज्य से बात कर रहा है।

इस अभियोग से पहले क्या सब हुआ?

मामले की जानकारी रखने वाले एक भारतीय अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया, कि अमेरिका ने अप्रैल में भारत सरकार के सामने चिंता जताना शुरू कर दिया था।

अधिकारी के मुताबिक, यह मुद्दा तब भी उठा, जब अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने 10 नवंबर को 2+2 वार्ता के लिए नई दिल्ली में विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी।

इस सप्ताह की शुरुआत में वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट से पता चला, कि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन और सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) के निदेशक विलियम बर्न्स ने जून में वैंकूवर उपनगर में निज्जर की हत्या के बाद जवाबदेही की मांग करने के लिए अपने भारतीय समकक्षों से मुलाकात की थी।

इसके अलावा, अमेरिका के एनएसए जैक सुलिवन ने इस मुद्दे पर भारतीय एनएसए अजीत डोभाल से भी बात की थी।

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अमेरिका और भारत के मूड क्या हैं?

अमेरिकी आरोपों के जवाब में, भारत ने कहा है, कि उसने "मामले के सभी प्रासंगिक पहलुओं" की जांच के लिए 18 नवंबर को एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया था। इससे कुछ दिन पहले, नई दिल्ली ने कहा था कि वह पन्नून की हत्या की कथित साजिश पर अमेरिका द्वारा दिए गए इनपुट की जांच कर रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इस समिति में संभवतः विदेश मंत्रालय (एमईए) के एक नामित व्यक्ति के साथ खुफिया, जांच और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के भारतीय अधिकारी शामिल हैं।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, अरिंदम बागची ने गुरुवार (30 नवंबर) को एक मीडिया ब्रीफिंग में अमेरिकी आरोपों को "चिंता का विषय" बताया था।

उन्होंने कहा, कि "हम ऐसे सुरक्षा मामलों पर कोई और जानकारी साझा नहीं कर सकते। जहां तक एक व्यक्ति के खिलाफ अमेरिकी अदालत में कथित तौर पर एक भारतीय अधिकारी से संबंध जोड़ने का मामला दर्ज किया गया है, यह चिंता का विषय है। हमने कहा है, यह सरकारी नीति के विपरीत है।"

वहीं, व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता, जॉन किर्बी ने अभियोग का जिक्र करते हुए गुरुवार को कहा, कि अमेरिका "इसे बहुत गंभीरता से लेता है"।

हालांकि उन्होंने ये भी कहा, कि "इससे भारत और अमेरिका के रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।" एएनआई ने उनके हवाले से कहा गया है, कि "भारत एक रणनीतिक साझेदार बना हुआ है और हम भारत के साथ उस रणनीतिक साझेदारी को बेहतर बनाने और मजबूत करने के लिए काम करना जारी रखेंगे।"

जबकि, अमेरिका के विदेश मंत्री ब्लिंकन ने तेल अवीव में इसी तरह की टिप्पणी करते हुए कहा, कि अमेरिकी सरकार इस मुद्दे को "बहुत गंभीरता से" लेती है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होने कहा, कि "हममें से कई लोगों ने पिछले हफ्तों में इसे सीधे भारत सरकार के समक्ष उठाया है और हम जांच के नतीजों पर पहुंचने के लिए उत्सुक हैं।"

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भारत-अमेरिका संबंधों पर कितना असर?

अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एंड इंडो-पैसिफिक मामलों के जानकार और प्रोफेसर डेरेक जे. ग्रॉसमैन ने कहा है, कि "मुझे नहीं लगता, कि इस मुद्दे की वजह से दोनों देशों के बीच के संबंधों पर कोई असर पड़ेगा। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा, कि "आज की विस्फोटक खबर के बाद भारत को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। वास्तविकता यह है, कि चीन का मुकाबला करने के लिए बाइडेन प्रशासन की इंडो-पैसिफिक रणनीति के कारण वॉशिंगटन को नई दिल्ली की कहीं ज्यादा आवश्यकता है।"

हालांकि, उन्होंने आगे ये भी कहा, कि "लेकिन अमेरिकी छूट असीमित नहीं है और अधिक बुरे व्यवहार से हाल के लाभ पर असर पड़ सकता है।"

कई और विदेश नीति विशेषज्ञ नहीं मानते, कि कथित हत्या की साजिश से अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते खराब होंगे। जुलाई में अमेरिका द्वारा कथित हत्या की साजिश का पर्दाफाश करने के बावजूद दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बैठकें और सहयोग का विस्तार जारी है।

हालांकि, यह सब सामान्य व्यवसाय नहीं था। दिप्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के दो वरिष्ठ अधिकारी - सैन फ्रांसिस्को में रॉ स्टेशन के प्रमुख और लंदन में इसके संचालन के दूसरे-कमांड - को इस गर्मी की शुरुआत में निष्कासित कर दिया गया था। जून में रॉ के प्रमुख के सेवानिवृत्त होने के बाद, भारत सरकार को वाशिंगटन में रॉ के स्टेशन प्रमुख को बदलने की भी अनुमति नहीं मिली।"

बाइडन की विदेश नीति एशिया में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार के साथ संबंध मजबूत करने की रही है। विल्सन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगेलमैन ने द वाशिंगटन पोस्ट को बताया, कि चीन फैक्टर अमेरिका और भारत के बीच संबंधों को खराब नहीं होने देगा।

उन्होंने कहा, कि "ज्यादातर मामलों में, अगर वाशिंगटन किसी विदेशी सरकार पर अपनी धरती पर हत्या कराने का आरोप लगाता है, तो उस सरकार के साथ अमेरिकी संबंध संकट में पड़ जाएंगे। लेकिन भारत के साथ संबंध एक विशेष मामला है। ...यह उल्लेखनीय है, कि एक बार जब बाइडेन प्रशासन को पता चला, तो उसने भारत के साथ जुड़ाव कम नहीं किया। बल्कि, उच्च स्तरीय बैठकें तय कार्यक्रम के अनुसार हुईं।''

नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय विदेश नीति विशेषज्ञ हैप्पीमोन जैकब ने रॉयटर्स को बताया, "भारत, कनाडा के साथ रणनीतिक साझेदारी साझा नहीं करता है, जो वह अमेरिका के साथ करता है।" उन्होंने कहा, कि "अमेरिका और भारत दोनों को एहसास है, कि उन्हें एक-दूसरे की जरूरत है, शायद अमेरिका को भारत से कुछ ज्यादा।"

ब्लूमबर्ग से बात करते हुए, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में यूएस-इंडिया नीति अध्ययन के अध्यक्ष रिचर्ड रोसो ने कहा, कि "इस बैकग्राउंड में दोनों सरकारों ने बैठकों के साथ आगे बढ़ने और रणनीतिक सहयोग के नए क्षेत्रों का निर्माण करने का फैसला किया।"

कुल मिलाकर स्थिति ये है, कि यह रिश्ता दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इन संबंधों में "पन्नून-आकार की समस्या" से बचने के लिए, नई दिल्ली को "पारदर्शी" होना होगा और अपनी अंतर्राष्ट्रीय शाख बचाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।

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