साथ मिलकर रूस का रेस्क्यू कर पाएंगे भारत और चीन? यूरोप के खिलाफ काम करेगा पुतिन का ‘एशिया प्लान’?

यूरोप के मजबूत इरादों ने राष्ट्रपति पुतिन को अपने डेस्क पर हथियार रखने और प्लान एशिया पर फौरन काम शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है।

नई दिल्ली, अप्रैल 26: यूक्रेन युद्ध का काफी ज्यादा लंबा खींचना और पश्चिमी देशों का अत्यंत कड़ा रूख... इन दो बातों ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने इस नतीजे को साफ कर दिया है, कि रूस के लिए अब यूरोप में तेल बेचना आसान नहीं होगा और जो पुतिन यह सोचते थे, कि थक-हारकर यूरोप को तेल और गैस रूस से ही खरीदना होगा, यूरोप के रूख ने उनके इरादे को बदल दिया है। लिहाजा अब पुतिन अपने दो सबसे खास दोस्तों की तरफ देख रहे हैं और उन्होंने अपने अधिकारियों से प्लान एशिया पर फौरन काम शुरू करने को कहा है। लेकिन, सवाल ये है, कि क्या भारत और चीन मिलकर रूस को बचा पाएगा, या फिर बचाने का इरादा भी रखता है? और पुतिन का प्लान एशिया क्या है, आइये समझते हैं।

पुतिन का प्लान एशिया

पुतिन का प्लान एशिया

यूरोप के मजबूत इरादों ने राष्ट्रपति पुतिन को अपने डेस्क पर हथियार रखने और प्लान एशिया पर फौरन काम शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस महीने की शुरुआत में देश के ऊर्जा क्षेत्र के नेताओं को एक ‘कुरकुरा' संदेश दिया था, कि उन्हें अपना ध्यान यूरोप से एशिया में ट्रांसफर करके पश्चिमी आयात में आई गिरावट को भरने के लिए फौरन काम शुरू करना चाहिए। क्रेमलिन के नजरिए से देखें, तो यह निर्देश समझ में आता है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही रूसी ऊर्जा के आयात पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। और यूरोप के कई देशों पर रूसी तेल और गैस खरीदने पर प्रतिबंध लगाने का भारी दवाब है।

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    क्या एशिया कर पाएगा भरपाई?

    क्या एशिया कर पाएगा भरपाई?

    एशिया के ज्यादातर देश पहले से ही सऊदी अरब, ईरान, इराक और वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीददारी करते हैं, जिसमें भारत और चीन भी शामिल है और बाकी बचे देशों में ज्यादातर देशों की राजनीतिक स्थिति और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकाल ऐसी है, कि उनके लिए रूस से तेल खरीदना आसान नहीं होगा। इसके साथ ही एशियाई बाजारों में ऊर्जा आपूर्ति की मांग सीमित देशों के पास ही है, लिहाजा सवाल ये है, कि क्या एशायाई देश रूस से तेल खरीदकर उसके घाटे की भरपाई कर पाएंगे? अगर ब्रसेल्स में रूसी ऊर्जा आयात पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पास हो जाता है, तो फिर पुतिन के लिए ये अब तक का सबसे बड़ा झटका होगा, क्योंकि रूस की कुल ऊर्जा आयात का दो तिहाई हिस्सा सिर्फ यूरोप के विकसित देश खरीद लेते है और अगर यूरोप में रूसी ऊर्जा आयात पर बैन लगता है, तो फिर पुतिन क्या करेंगे?

    यूरोप को ध्यान में रखकर पाइपलाइन

    यूरोप को ध्यान में रखकर पाइपलाइन

    ज्यादातर रूसी पाइपलाइन भौगोलिक रूप से यूरोपीय बाजारों की डिमांड को पूरा करने के लिए बनाई गई हैं, जिनसे एशियाई देशों को तेल की आपूर्ति नहीं की जा सकती हैं। रूस के दो सबसे बड़े एशियाई ग्राहक, जापान और दक्षिण कोरिया है, जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के सबसे बड़े सहयोगियों में से एक है, जिन पर ऊर्जा आयात में किसी भी वृद्धि से बचने के लिए अमेरिका के तीव्र दबाव का सामना करने की संभावना है। चीन, रूसी तेल का सबसे बड़ा आयातक जरूर है, लेकिन कोविड-19 लॉकडाउन के कारण चीन खुद आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है और ऊर्जा के लिए चीन की भूख फिलहाल कम ही रहने वाली है, क्योंकि अभी भी चीन में सख्त लॉकडाउन लगाए जा रहे हैं।

    अगर यूरोप ने लगा दिया पूर्ण प्रतिबंध, फिर...

    अगर यूरोप ने लगा दिया पूर्ण प्रतिबंध, फिर...

    विल्सन सेंटर के ग्लोबल फेलो हरि शेषशायी ने अल जज़ीरा को दिए गये एक इंटरव्यू में बताया कि, ‘अगर यूरोपीय संघ रूसी ऊर्जा आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देता है, तो मुझे नहीं लगता कि एशियाई बाजार उस मांग को कैसे पूरा कर पाएंगे।" उन्होंने कहा कि, ‘रूस को 2022 के अंत तक अपने तेल उत्पादन को 30 प्रतिशत तक कम करने की आवश्यकता हो सकती है।‘ फिलहाल, यूरोपीय संघ के पास रूसी ऊर्जा के खिलाफ किसी भी प्रतिबंध पर "एकसमान विचार" नहीं है। जर्मन अखबार डाई वेल्ट ने सोमवार को ब्लॉक के शीर्ष राजनयिक जोसेप बोरेल के हवाले से इसकी तस्दीक भी की है। जर्मनी और हंगरी उन देशों में शामिल हैं, जो रूसी तेल और गैस खरीदना बंद कर देते हैं, तो ऊर्जा लागत में भारी वृद्धि हो सकत है और ये देश इस बात को लेकर काफी चिंतित हैं। इस बीच, यूरोपीय संघ एक भुगतान तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जिससे रूस के खिलाफ लगाए गये अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन ना हो सके।

    रूसी तेल व्यापार पर होगा असर

    रूसी तेल व्यापार पर होगा असर

    नई दिल्ली स्थिति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वरिष्ठ साथी लिडिया पॉवेल ने अलजजीरा से इस बाबत बात करते हुए कहा कि, ‘अब ये समय की ही बात है, कि कितने वक्त में यूरोपीय देश रूसी तेल खरीदना बंद करने पर विचार लेते हैं'। उन्होंने कहा कि, ‘वैश्विक कच्चे तेल के बाजार से प्रति दिन चार मिलियन बैरल की कटौती हो सकती है'। मॉस्को को इन खतरों के बारे में पता है और वो लगातार पश्चिमी देशों पर अपनी निर्भरता को खत्म करने की कोशिश में लगा है। 2012 में राष्ट्रपति पुतिन ने पूर्वी साइबेरिया-प्रशांत महासागर तेल पाइपलाइन का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य चीन और जापान को कच्चे तेल की आपूर्ति करना था। 2019 में लॉन्च की गई पावर ऑफ साइबेरिया पाइपलाइन चीन को 38 अरब क्यूबिक मीटर रूसी गैस की आपूर्ति कर सकती है। फरवरी में, युद्ध शुरू होने से कुछ हफ्ते पहले पुतिन की बीजिंग यात्रा के दौरान, चीन और रूस ने एक और गैस पाइपलाइन की योजना की घोषणा की थी। लेकिन, विश्लेषकों का मानना है कि, ये परियोजनाएं राष्ट्रों के बीच तेल और गैस व्यापार शुरू करने या बढ़ाने में शामिल जटिलताओं को ही उजागर करती हैं।

    एशिया में इन्फ्रांस्ट्रक्चर का विकास कम

    एशिया में इन्फ्रांस्ट्रक्चर का विकास कम

    यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के प्रतिबंध विशेषज्ञ फिलिप मेडुनिक ने अल जज़ीरा को बताया कि, ‘तेल के व्यापार में सबसे महत्वपूर्ण है, उसका ट्रांसपोर्टेशन और रूस अभी तक एशियाई बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन सुविधा को विकसित नहीं कर पाया, जैसा उसने यूरोपीय देशों के साथ कर रखा है'। उन्होंने कहा कि, भारत के साथ ही यही दिक्कत है। भारत रियायती दर पर रूस से कच्चा तेल खरीदना तो चाहता है, लेकिन रूस से कच्चे तेल की परिवहन की लागत ही काफी ज्यादा आएगी। विश्लेषकों मुताबिक, रूसी तेल को भारत तक लाना काफी मुश्किल काम है और भले ही भारत ने रियायदी दरों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया है, लेकिन भारत के लिए ये सौदा उतना मुफीद भी साबित नहीं हो रहा है। रूसी और भारतीय अधिकारियों ने पिछले हफ्ते भारतीय स्टील निर्माताओं को कोकिंग कोल की शिपिंग पर एक गतिरोध को दूर करने की कोशिश करने के लिए मुलाकात की, जो कि मार्च के बाद से भुगतान और रसद जटिलताओं के कारण गिरावट आई है। रॉयटर्स ने सोमवार को एक व्यापार स्रोत और भारत सरकार के स्रोत का हवाला देते हुए सूचना दी है।

    भारत-रूस तेल व्यापार में दिक्कतें

    भारत-रूस तेल व्यापार में दिक्कतें

    रियायती दर में तेल देने के ऑफर के बाद भी साल 2020 से भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात सिर्फ 1.4 प्रतिशत ही है, जिसका अर्थ यह है, कि भारत से पुतिन को ज्यादा मदद मिलने की संभावना बेहद कम है। इसके अलावा, विभिन्न देश अलग-अलग घनत्व के कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं, और भारत की पुरानी सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों के लिए मध्य पूर्वी, अमेरिकी और लैटिन अमेरिकी तेल से अचानक रूसी तेल की तरफ मुड़ जाना आसान नहीं होगा। वहीं,कई निजी रिफाइनरियां भी रूसी कच्चे तेल का उपयोग करके अपने पश्चिमी ग्राहकों को नाराज करने की कोशिश नहीं करेंगी।

    भारत नहीं करेगा पश्चिम को नाराज

    भारत नहीं करेगा पश्चिम को नाराज

    स्टॉकहोम स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट पॉलिसी के निदेशक निकलास स्वानस्ट्रॉम ने अल जज़ीरा को बताया कि, ऐसे समय में, जब भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है, रूस से ऊर्जा खरीद में वृद्धि उन रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकती है। लिहाजा, भारत से ज्यादा मदद की उम्मीद लगाना रूस के लिए सही नहीं होगा। वहीं, चीन अपने कंधे पर रूस को ढोना नहीं चाहेगा, क्योंकि चीन का यूरोपीय संघ से व्यापार रूस के कई गुना ज्यादा है और चीन कतई भी यूरोप को नाराज कर रूस के पल्ले में नहीं जाना चाहेगा। लिहाजा, संभावना बेहद कम हैं, कि भारत और चीन मिलकर भी आने वाले वक्त में संकट में फंसे रूस का रेस्क्यू कर पाएंगे।

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