कोरोना: कितने ख़तरनाक हैं यूके, दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील के वैरिएंट्स?

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कोरोना वायरस के ऐसे नए वैरिएंट्स उभर रहे हैं जो कि अपने मूल वायरस के मुकाबले कहीं ज्यादा संक्रामक हैं.

यूके के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि इस बात के कुछ प्रमाण हैं कि देश में प्रभावी हो रहा कोरोना का वैरिएंट शायद ज़्यादा ऊंची मृत्यु दर वाला है.

वैज्ञानिक इन बदले हुए कोरोना वायरस के रूपों के अध्ययन में लग गए हैं और इस बात का अंदाजा लगा रहे हैं कि ये कितने ख़तरनाक हैं.

ये नए वैरिएंट्स क्या हैं?

एक्सपर्ट्स फिलहाल कोरोना वायरस के कम संख्या में नए वैरिएंट्स पर फोकस कर रहे हैं. इनमें से कुछ ये हैः

  • यूके वैरिएंट जो कि ब्रिटेन के ज्यादातर हिस्से के अलावा दुनिया के 50 से ज़्यादा देशों में भी फैल चुका है.
  • दक्षिण अफ्ऱीकी वैरिएंट जो कि यूके समेत दुनिया के कम से कम 20 दूसरे देशों में भी पाया गया है.
  • ब्राज़ील का वैरिएंट

वायरस के नए वैरिएंट्स के विकसित होने में नया जैसा कुछ भी नहीं है. सभी वायरस म्यूटेट करते हैं और वे फैलने और आगे बढ़ने के लिए नई प्रतियाँ बनाते हैं.

कोरोना वायरस के कई हज़ार अलग-अलग वर्जन या वैरिएंट्स इस वक्त फैल रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर के बदलाव ज़्यादा गहरे असर वाले नहीं हैं. यहां तक कि कुछ वैरिएंट्स तो ख़ुद वायरस के जीवित रहने के लिए नुकसानदायक हैं. लेकिन, कुछ वैरिएंट्स ज्यादा संक्रामक और ख़तरनाक भी हैं.

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क्या नए वैरिएंट्स ज्यादा खतरनाक हैं?

फिलहाल इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि इनमें से किसी वैरिएंट के कारण ज़्यादा गंभीर बीमारी हो.

जैसा कि मूल वर्जन के साथ था, ये वैरिएंट्स भी उम्रदराज़ या पहले से बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए ज्यादा जोख़िम भरे हैं.

नए यूके वैरिएंट के बारे में कुछ रिसर्च में कहा गया है कि इसके कारण मौत होने का ज़्यादा ख़तरा है.

हालाँकि ब्रिटेन में विशेषज्ञों का कहना है कि ये साक्ष्य ज्यादा मज़बूत नहीं है और इस बारे में डेटा भी अभी तक अनिश्चित है.

हाथ धोने, अन्य लोगों से दूरी बनाए रखने और चेहरे को ढँककर रखने जैसे उपायों से संक्रमण को रोकने में निश्चित ही मदद मिलेगी.

चूँकि नए वैरिएंट्स में आसानी से फैलने की क्षमता दिखाई दे रही है, ऐसे में लोगों को ज्यादा सतर्कता बरतने की ज़रूरत है.

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वायरस में क्या बदलाव आ रहे हैं?

ब्रिटेन, दक्षिण अफ्ऱीका और ब्राज़ील के वैरिएंट्स कहीं ज्यादा संक्रामक हो सकते हैं या अपने पिछले वर्जन के मुकाबले तेज़ी में फैलने वाले हो सकते हैं.

इन सभी में स्पाइक प्रोटीन में बदलाव हुए हैं. यह वायरस का वह हिस्सा होता है जो कि मानवीय कोशिकाओं के साथ जुड़ता है.

इसके परिणामस्वरूप ये वैरिएंट्स कोशिकाओं को संक्रमित करने और फैलने में ज़्यादा सक्रिय हो गए हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिटेन या 'केंट' स्ट्रेन का उभार सितंबर में हुआ था और यह 70 फ़ीसदी ज्यादा संक्रामक है.

हालाँकि, पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड की हालिया रिसर्च में इसे 30 फ़ीसदी से 50 फ़ीसदी के बीच रखा गया है.

इसी वैरिएंट की वजह से ब्रिटेन में हालिया लॉकडाउन लगाए गए हैं.

वहीं, दक्षिण अफ्ऱीकी वैरिएंट का उभार अक्टूब में हुआ था और इसमें ब्रिटेन के वैरिएंट के मुकाबले स्पाइक प्रोटीन में कहीं ज्यादा संभावित अहम बदलाव देखे गए हैं.

इसमें ब्रिटेन के जैसा ही एक म्यूटेशन और साथ ही दो और म्यूटेशन भी हैं. इनके बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि ये वैक्सीन की प्रभावी क्षमता के साथ और दख़ल दे सकते हैं.

इनमें से एक एंटीबॉडीज वाले इम्यून सिस्टम के हिस्से से बचने में वायरस को सफल बना सकते हैं. कुछ रिसर्च से इस बात का पता चल रहा है.

ब्रिटेन ने दक्षिण अफ्ऱीका से सीधी उड़ानों पर बैन लगा दिया है और दक्षिण अफ्ऱीका जाने वाले विमानों पर भी पाबंदियां लगाई हैं.

दक्षिण अफ्ऱीका की हाल में यात्रा करने वालों या उनके संपर्क में आने वालों को तुरंत क्वारंटीन होने के लिए कहा गया है.

ब्राज़ील वैरिएंट का उभार जुलाई में हुआ था और इसके स्पाइक प्रोटीन में तीन अहम बदलाव देखने को मिले हैं. इनके कारण यह दक्षिण अफ्ऱीकी वैरिएंट जैसा लग रहा है.

ब्रिटेन सरकार ने इसके चलते दक्षिण अमरीका और पुर्तगाल से फ्लाइट्स पर बैन लगा दिया है.

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क्या वैक्सीन काम करेगी?

इस बात का पता लगाने के लिए अध्ययन किए जा रहे हैं और कुछ शुरुआती नतीजों से पता चला है कि फाइजर की वैक्सीन नए यूके वैरिएंट से सुरक्षा देने में सफल है.

मौजूदा वैक्सीन्स पिछले वैरिएंट्स के इर्द-गिर्द तैयार की गई थीं. लेकिन, वैज्ञानिकों का मानना है कि इन्हें नए वैरिएंट्स के खिलाफ भी प्रभावी साबित होना चाहिए. हालाँकि शायद ऐसा न भी हो.

वैक्सीन शरीर को वायरस के कई हिस्सों पर हमला करने के लिए तैयार करती है, हालाँकि, इसमें स्पाइक प्रोटीन के केवल ये हिस्से ही शामिल नहीं होते हैं.

भविष्य में कुछ ऐसे वैरिएंट्स भी उभर सकते हैं जो ज्यादा अलग हों. एक्सपर्ट्स का कहना है कि वैक्सीन को हफ़्तों या महीनों के भीतर दोबारा से डिज़ाइन करने की ज़रूरत पड़ सकती है.

फ़्लू वैक्सीन में हर साल नया शॉट दिया जाता है ताकि फ़्लू वायरस में होने वाले बदलावों का सामना किया जा सके. ऐसा ही कोरोना वायरस की वैक्सीन के साथ भी करना पड़ सकता है.

क्या किया जा रहा है?

कोरोना के ज़्यादा वैरिएंट्स का उभार होगा.

पूरी दुनिया के वैज्ञानिक अलर्ट हैं और अहम वैरिएंट्स का गहनता से अध्ययन और मॉनिटर किया जा रहा है.

ब्रिटेन के वैक्सीन डेवेलपमेंट मिनिस्टर का कहना है कि ज़रूरत पड़ने पर वैक्सीन्स की एक और खेप उत्पादित करने के लिए उपाय किए जा रहे हैं.

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