चीन और तालिबान के बीच मल्टी-मिलियन ऑयल कॉन्ट्रैक्ट, क्या अफगानों की किस्मत खोलेगा चीनी प्रोजेक्ट?
अफगानिस्तान के दुर्लभ खनिज पर भी चीन की नजर है, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि तालिबान देश की शासन व्यवस्था को पूरी तरह से कंट्रोल नहीं कर पा रहा है।

Chinese Investment In Afghanistan: अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद चीन ने काफी कौतुहल होकर तालिबान शासकों की तरफ दोस्ती के हाथ बढ़ाए और तालिबान के सत्ता में आने के बाद पिछले दो सालों में चीन ने खुद को अफगानिस्तान में स्थापित करने की हर संभव कोशिश की है, जिसके तहत पिछले महीने चीन की एक कंपनी ने अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण विदेशी निवेश करते 25 सालों के लिए मल्टी-मिलियन डॉलप प्रोजेक्ट साइन किए हैं। इसके साथ ही अफगानों की धरती से बहुमूल्य दुर्लभ खनिज पदार्थों को निकालने के लिए भी चीन लालायित है, लेकिन क्या चीन का ये निवेश प्लान कामयाब हो पाएगा, या फिर रूस और अमेरिका के बाद एक और बड़ी शक्ति अफगानिस्तान से पराजित होकर लौट जाएगी?

अफगानिस्तान में चीनी प्रोजेक्ट
अफगानिस्तान पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों को लगता है, कि चीनी प्रोजेक्ट्स कामयाब हो सकती हैं और अफगानिस्तान के लोगों के लिए रोजगार के विकल्प उपलब्ध करवा सकती हैं और उन्हें इनकम हो सकता है, हालांकि अभी तक का रिकॉर्ड खराब रहा है। 6 जनवरी को, तालिबान ने चीन की झिंजियांग सेंट्रल एशिया पेट्रोलियम एंड गैस कंपनी (CAPEIC) के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है, जो चीनी राज्य के स्वामित्व वाली चाइना नेशनल पेट्रोलियम कंपनी (CNPC) की सहायक कंपनी है। ये कॉन्ट्रैक्ट अमु दरिया बेसिन से तेल निकालने का अनुबंध है, जो मध्य एशियाई देशों और अफगानिस्तान में लगभग 4.5 वर्ग किलोमीटर (1.73 वर्ग मील) में फैला है। तालिबान के एक प्रवक्ता ने ट्विटर पर कहा है, कि इस सौदे में पहले साल अफगानिस्तान में 15 करोड़ डॉलर और अगले तीन साल में 54 करोड़ डॉलर का निवेश होगा।

चीनी प्रोजेक्ट्स से उत्साहित तालिबान
तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने एक ट्वीट में कहा है, कि "तेल निष्कर्षण की दैनिक दर 1,000 से 20,000 टन होगी।" उन्होंने कहा, कि तालिबान इस सौदे में 20 प्रतिशत भागीदार होगा, जिसे बाद में 75 प्रतिशत तक बढ़ाया जाएगा। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग विशेषज्ञ और खनन और पेट्रोलियम मंत्रालय में अफ़ग़ान पेट्रोलियम प्राधिकरण के पूर्व महानिदेशक अब्दुल जलील जुमरेनी उन लोगों में से एक हैं, जो इस प्रोजेक्ट को आशा के साथ देख रहे है और उन्होंने कहा, कि "अभी की स्थिति को देखते हुए, जिस तरह से हमारे लोग संघर्ष कर रहे हैं, मेरी राय में, यह परियोजना राजस्व का एक स्रोत हो सकता है जो आर्थिक राहत प्रदान कर सकता है, लिहाजा ये अफगानों को अपने संसाधनों से लाभ उठाने के लिए एक मौका देता है। उन्होंने कहा, कि "भले ही इसका एक बड़ा हिस्सा सरकार को जाता है, लेकिन, वहां नौकरियां पैदा होंगी और कुछ अफगान विशेषज्ञता का उपयोग किया जाएगा, और यह एक अच्छी बात है।" लेकिन, उन्होंने ये भी कहा, कि "यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कैसे लागू किया जाता है।"

अफगानिस्तान में इतिहास नहीं है अच्छा
हालांकि, अफगानिस्तान में चीनी निवेश की घोषणा शुरूआती तौर पर अफगानों के लिए खुशी लाई है, लेकिन पुराने अफगान इस निवेश को लेकर ज्यादा आशा रखने के बजाए सतर्क दिख रहे हैं। ऐसा इसलिए नहीं, क्योंकि चीन अभी तक देश के खनन क्षेत्र में अपने किसी भी निवेश के माध्यम से नहीं देख रहा है, बल्कि इसलिए कि यह विशेष सौदा बिल्कुल वैसा ही लगता है, जैसा पिछली अफगान सरकार ने प्रोजेक्ट को भ्रष्टाचार के कारण बंद कर दिया था। पिछली अफगान सरकार के तहत, अफगानिस्तान और चीन के बीच साल 2011 में एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन साझा करने को लेकर चीन सरकार की स्वामित्व वाली CNPC और अफगानिस्तान की वतन समूह कंपनी के बीच "काशकारी ब्लॉक" समझौता हुआ था, जो तीन ब्लॉकों में से एक है, जो अब हालिया अमु दरिया निविदा का हिस्सा है। जुम्रैनी ने कहा, कि "यह सरकार के लिए एक बड़ी जीत थी, क्योंकि सीएनपीसी एक बहुत बड़ी कंपनी है और चीन वर्तमान में इस क्षेत्र में सबसे बड़ा तेल और गैस खरीदार है।"

क्यों खराब हो गया था पिछला प्रोजेक्ट?
चीन तुर्कमेनिस्तान से चार पाइपलाइनों के जरिए गैस आयात करता है, जिनमें से तीन उज़्बेकिस्तान और एक ताजिकिस्तान के माध्यम से पारगमन करता है। अफगानिस्तान को चौथी पाइपलाइन का हिस्सा बनने का अवसर दिया गया था। उन्होंने कहा, कि "अफगान सरकार ने उस समय सीएनपीसी को निविदा प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए कहा था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। यदि चीन निष्पक्ष निविदा प्रक्रिया के लिए सहमत होता, तो अफगानिस्तान के लिए अपने पेट्रोलियम क्षेत्र को विकसित करने का यह एक बड़ा मौका था।

अफगानिस्तान ने बड़ा मौका गंवाया
पिछले सौदे में भी, 25 सालों के लिए, 87 मिलियन बैरल तेल निकालने के लिए 400 मिलियन डॉलर का संभावित प्रारंभिक निवेश रखा गया था, जिससे अफगानिस्तान सरकार को कम से कम 7 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त होता। जम्रेनी ने कहा, कि अफगानिस्तान में तेल और गैस के लिए महत्वपूर्ण क्षमता है। उन्होंने कहा, कि "अफगानिस्तान तुर्कमेनिस्तान के माध्यम से सोवियत संघ के प्रमुख निर्यातकों में से एक था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में पर्याप्त अन्वेषण नहीं हुआ है, जिसके लिए अरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता है।" उन्होंने कहा, कि पिछली सरकार ने उम्मीद की थी, कि चीन तांबा, तेल और गैस सहित अफगान निष्कर्षण क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण निवेशक होगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि नया कॉन्ट्रैक्ट अफगानों की किस्मत बदलने का रास्ता हो सकता है, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि क्या तालिबान, चीन को सुरक्षा दे पाएगा और तालिबान के लिए ऐसा करना टेढ़ी खीर साबित होगा।












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