अमेरिका के निकलते ही अफगानिस्तान पर 'कब्जे' की तैयारी में है चीन, भारत के लिए बढ़ गई मुश्किल

काबुल, 5 जुलाई: अगानिस्तान से अमेरिका के निकलते ही चीन ने युद्धग्रस्त अफगानिस्तान पर कब्जे की तैयारी शुरू कर दी है। दो दशक तक वहां तालिबान और अल-कायदा के साथ लड़ने के बाद बीते शुक्रवार को अमेरिकी सैनिक ने बगराम एयरबेस भी खाली कर दिया। अब चीन की कोशिश है कि 20 साल बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सैनिकों के जाने के बाद खाली हुई जगह को भर दे। चीन की यह तैयारी उसकी बहुत दूर की सोच का हिस्सा है। लेकिन, हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान पर चीन का किसी तरह से कब्जा होना भारत के हित में नहीं है।

अफगानिस्तान में 'दाखिल' होना चाहता है चीन

अफगानिस्तान में 'दाखिल' होना चाहता है चीन

अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के बाद चीन अपने बेल्ट एंड रोड (बीआरआई) प्रोजेक्ट के बहाने वहां घुसने की ताक में जुट गया है। इसके लिए वह सालों से ताक में लगा हुआ था। जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान सरकार भी बदले माहौल में चीन की अति-महत्वाकांक्षी बीआरआई परियोजना का ही हिस्सा माने जाने वाले 6,200 करोड़ डॉलर के चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का अपने देश तक विस्तार के लिए बातचीत में जुट गई है। इसके तहत पाकिस्तान और चीन के साथ अफगानिस्तान तक हाइवे, रेलवे और तेल और गैस पाइपलाइन का निर्माण होना है। जानकारी तो यहां तक है कि बीजिंग और काबुल के बीच सबसे पहले जिस खास प्रोजेक्ट पर बात हो रही है, वह पाकिस्तानी शहर पेशावर से लेकर काबुल तक हाइवे का निर्माण है, जो पहले से ही सीपीईसी रूट से जुड़ा है।

अमेरिका की वजह से अफगानिस्तान तक फटक नहीं पा रहा था चीन

अमेरिका की वजह से अफगानिस्तान तक फटक नहीं पा रहा था चीन

तथ्य ये है कि पर्दे के पीछ ही सही, अमेरिकी सैनिकों के बोरिया-बिस्तर समेटते ही अफगान सरकार चीन की शी जिनपिंग सरकार के सामने पूरी तरह से बिछती नजर आ रही है। दरअसल, चीन करीब पांच वर्षों से अफगानिस्तान सरकार से कह रहा था कि वह उसके बीआरआई प्रोजेक्ट में शामिल हो जाए। लेकिन, चाहते हुए भी अफगानिस्तानी सरकार अमेरिका की नाराजगी के डर से अभी तक इसकी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। सूत्रों की मानें तो अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी की सरकार को बेसब्री से एक ऐसे सहयोगी की दरकार है, जिसके पास संसाधन हो, जिसका दबदबा हो और जो उसे सैन्य सहायता भी उपलब्ध करवा सके। यही वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जैसे ही अपनी सेना को वहां से पूरी तरह से निकालने का ऐलान किया, चीन ने खुलकर अपने इरादे जाहिर करने शुरू कर दिए और गनी सरकार की भी हिचकिचाहट खत्म होनी शुरू हो गई।

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    अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर नजर

    अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर नजर

    गौरतलब है कि बीआरआई रणनीति के तहत चीन 2049 तक एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जमीन और समंदर के नेटवर्क के जरिए जोड़कर तकरीबन 60 देशों पर भविष्य में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है। इस मेगा प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 4,00,000 करोड़ डॉलर है। भौगोलिक तौर पर अफगानिस्तान ऐसे इलाके में है, जहां से चीन को दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में अपना रणनीतिक दबदबा काम करने में मदद मिल सकता है। यह मिडिल ईस्ट,सेंट्रल एशिया से लेकर यूरोप तक व्यापार के लिए भी अहम है और सामरिक दृष्टिकोण से भी चीन की ताकत में इजाफा कर सकता है। चीन का तजुर्बा कहता है कि अफगानिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालात के चलते वहां के लोग भी उसकी योजनाओं को हाथों-हाथ लेंगे, क्योंकि इससे आर्थिक गतिविधि बढ़ने के आसार हैं। सच तो ये है कि चीन की नजर अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर भी अटकी हुई है।

    भारत के लिए बढ़ गई मुश्किल

    भारत के लिए बढ़ गई मुश्किल

    कुछ जानकारों का मानना है कि बीआरआई के नाम चीन तालिबान को भी अपने साथ ज्यादा आसानी से जोड़ सकता है। क्योंकि, उनका मानना है कि अगर विकास परियोजना से उसका राष्ट्रीय हित सधता है तो वो उसका समर्थन कर सकते हैं। हालांकि, तालिबान जैसे आतंकी संगठन के लिए इतनी जल्दी किसी नतीजे पर पहुंचना जोखिम से खाली नहीं है। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों ने पाकिस्तान को भी बेहतर हालात में ला दिया है, क्योंकि वह चीन का अटूट रणनीतिक सहयोगी बना हुआ है। उसे एकबार फिर से अफगानिस्तान में एंट्री का रास्ता भी मिल सकता है। लेकिन, अफगानिस्तान में तेजी बदल रही स्थिति निश्चित ही भारत के हक में नहीं मानी जा सकती। भारत ने वहां अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है, कई प्रोजेक्ट में भी उसकी मदद की है। ऊपर से वहां तालिबान, अल-कायदा, चीन और पाकिस्तान का दबदबा बढ़ने की आशंका है, जो सामरिक तौर पर भी भारत के अनुकूल नहीं है।

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