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PM प्रचंड की बीजिंग यात्रा से पहले नेपाल को बेइज्जत कर रहा चीन! कहीं 'जहरीला फल' ना खा ले भारत का 'छोटा भाई'?

Nepal PM China Visit: हाल के दिनों में नेपाल में चीन के राजदूत चेन सोंग ने नेपाल को बार बार ये असहास दिलाने की कोशिश की है, कि नेपाल भारत पर निर्भर रहा है। उन्होंने यहां तक कहा है, कि भारत जैसा पड़ोसी पाना नेपाल का दुर्भाग्य है।

दूसरी तरफ, नेपाल के प्रधान मंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' कल चीन के दौरे पर जा रहे हैं और उनका ये दौरा काफी लंबा, एक हफ्ते का होने वाला है। उइस दौरान वो चीन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। लिहाजा, पिछले दो महीने से नेपाल में चीनी राजदूत का नेपाल का उपहास उड़ाने वाले बयान पर काफी विवाद भी हुआ है।

Nepal PM China Visit

चीनी राजदूत का बयान स्पष्ट तौर पर नेपाल के आंतरिक मामलों के साथ साथ उसकी संप्रभुता और उसकी विदेश नीति में दखल है।

लेकिन, चूंकी चीन बदनाम वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाता है, लिहाजा सवाल ये उठ रहे हैं, कि नेपाली प्रधानमंत्री की बीजिंग यात्रा से पहले चीनी राजदूत नेपाल का बार बार अपमान कर बड़ा जोखिम ले रहे हैं, या फिर ये चीन की सोची समझी रणनीति है, आइये समझते हैं।

नेपाल-चीन संबंधों में आई है दूरी

साधारण नजरों से भी देखने पर स्पष्ट तौर पर पता चलता है, कि नेपाल के साथ चीन के संबंधों में हाल के महीनों में गिरावट आई है और दोनों देशों के संबंध में तनाव भी बढ़ा है, जिसमें नेपाल में बीआरआई परियोजनाओं पर सार्थक प्रगति करने में चीन की विफलता, राजनीतिक हस्तक्षेप के असफल प्रयास शामिल है।

इसके अलावा, बीजिंग उन शर्तों पर अड़ा हुआ है, जसकी वजह से पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश बर्बाद हुए हैं और उन शर्तों से नेपाल डरा हुआ है।

क्या नेपाली कम्युनिस्टों को लुभाने की चीन की कोशिश नाकाम हो रही है?

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की मुख्य कार्रवाई नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों को बढ़ावा देना है। सीसीपी स्पष्ट है, कि नेपाल में कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली सरकार उसी तरह से चीन की सारी बातों को माने, जैसे पाकिस्तान की सरकारें करती हैं। पाकिस्तान की सरकारें चीन की 'नियम और शर्तों' पर चलती हैं।

यह अनुमान लगाने वाली रिपोर्टों में स्पष्ट है, कि चीन ने 2018 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) बनाने के लिए नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) को एक करने में अहम भूमिका निभाई थी। और दोनों पार्टियों ने एक होकर नेपाल में पूर्ण बहुमत की सरकार भी बना ली, लेकिन चीन की ये कोशिश उस वक्त नाकाम हो गई, जब दोनों पार्टियां फिर से झगड़े के बाद अलग हो गईं और सरकार का पतन हो गया।

दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को करने में नेपाल में चीन के पूर्व राजदूत होउ यंगी ने काफी अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन काठमांडू में कम्युनिस्ट सरकार का पतन होने के बाद नेपाल में फिर से चुनाव हुए, जिसके बाद प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने, चीन की जगह पहला आधिकारिक दौरे के लिए भारत को चुना।

प्रचंड का भारत आना, बीजिंग के लिए बहुत परेशान करने वाला था। जिससे गुस्साए चीन ने इस साल जनवरी में राजदूत होउ को फौरन बदल दिया और उनकी जगह पुर राजदूत चेन को काठमांडू भेजा गया।

इन कोशिशों के जरिए सीसीपी ने काठमांडू पर नियंत्रण के दौरान होने वाले नुकसान को उलटने की कोशिश की थी।

लेकिन, ये हैरान करने वाला है, कि नेपाल में चीन के वर्तमान राजदूत, नेपाल की अर्थव्यवस्था में कमजोरियों को उजागर करने के साथ साथ, नेपाल की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों तरह की आर्थिक नीतियों की आलोचना कर रहे हैं और इसके साथ साथ भारत-नेपाल संबंधों के प्रति खुलेआम नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, और हैरानी की बात ये है, कि इन सब कामों को करने के लिए उन्होंने इस वक्त को क्यों चुना है, जबकि नेपाल के प्रधानमंत्री का चीन दौरा होने वाला है।

दूसरी हैरान करने वाली बात ये रही, कि चीनी राजदूत ने बिना आंकड़ा देखे भारत को नेपाली बिजली निर्यात की आलोचना कर दी और नेपाल का मजाक उड़ाया, जबकि ये परियोजना नेपाल के लिए गर्व का प्रोजेक्ट होने के साथ फायदेमंद रहा है, लिहाजा संकेत ये मिल रहे हैं, कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कहीं ना कहीं नपाल के बदलते रवैये से परेशान है और वो नेपाल को प्रेशर में लाने के लिए ऐसा कर रहा है।

नेपाल में चीन की जलविद्युत परियोजनाएं

नेपाली मीडिया की हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले दशक में, नेपाल में स्थापित जलविद्युत उत्पादन 2012 में 1,050 मेगावाट से बढ़कर 2023 में 2,700 मेगावाट हो गया है, और अगले दस वर्षों में ये बढ़कर 9000 मेगावट तक पहुंचने की उम्मीद है, क्योंकि 235 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स प्लान किए गये हैं।

लिहाजा, इन प्रोजेक्ट्स को देखते हुए भारत, नेपाल से अगले दशक में 10 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली खरीदने पर सहमत हुआ है। सिर्फ पिछले वित्तीय वर्ष में ही, भारत ने नेपाल से 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिजली खरीदी है, जिसमें इस साल और आने वाले सालों में भारी इजाफा होने की उम्मीद है।

इसके विपरीत, नेपाल ने सीमा पार 400KV ट्रांसमिशन लाइन विकसित करने के लिए 2018 से चीन के साथ बातचीत करनी शुरू की थी, जिसपर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। इसके अलावा, चीन तिब्बत में अपनी मेगा-पनबिजली परियोजनाओं की योजना बना रहा है, और चीन नेपाल से तो बिजली खरीदेगा नहीं चीन चाहता है, कि नेपाल उससे बिजली खरीदे। यानि, नेपाल से फायदा ही लेने की फिराक में चीन लगा हुआ है।

लिहाजा, यह नेपाल के 756-मेगावाट तमोर जलविद्युत परियोजना में लगातार हो रही देरी से समझा जा सकता है, जिस पर 2019 में नेपाल और चीन के बीच एक संयुक्त उद्यम के रूप में सहमति हुई थी। शायद चीनी राजदूत, काठमांडू को यह स्पष्ट कर रहे थे, कि बीजिंग केवल उन परियोजनाओं में रुचि रखता है जो चीन के उद्देश्यों को पूरा करती हैं।

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BRI को लेकर नेपाल के मन में शंकाएं

एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र जहां नेपाल-चीन संबंधों के फलने-फूलने की उम्मीद थी, वह था चीनी और नेपाल के बीच किया गया BRI इनिशिएटिव। हालांकि, 2017 में नेपाल के BRI पर हस्ताक्षरकर्ता बनने के बावजूद, वादा की गई परियोजनाओं पर प्रगति स्थिर बनी हुई है।

चीन अपनी इन परियोजनाओं के जरिए नेपाल में राजमार्गों का निर्माण करने के साथ साथ आर्थिक कॉरिडोर का निर्माण करना चाहता था। चीनी राजदूत सॉन्ग ने हाल ही में यह भी दावा किया था, कि उद्घाटन किया गया पोखरा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा BRI ढांचे के तहत बनाया गया था।

लेकिन, राजदूत के बयान के बाद बीजिंग को उस वक्त काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी, जब नेपाली सरकार ने बताया, कि हवाईअड्डे को बीआरआई समझौते में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि यह एक द्विपक्षीय व्यवस्था से था, जो बीआरआई से पहले की थी। बताया गया है कि नेपाल में नौ बीआरआई परियोजनाओं में से एक में भी काम शुरू नहीं हुआ है।

इसके अलावा, नेपाल के प्रधान मंत्री अपने कल से शुरू होने वाले चीन दौरे के दौरान, बीआरआई शिखर सम्मेलन में बीआरआई परियोजनाओं के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ तंत्र की मांग करेंगे। वर्तमान वैश्विक आर्थिक मंदी में भविष्य की परियोजनाओं पर विचार करते समय आर्थिक स्थिरता एक महत्वपूर्ण चिंता है।

बीजिंग से क्यों डरा हुआ है काठमांडू?

नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, अर्जेंटीना समेत दर्जन भर से ज्यादा देशों की स्थिति देखकर डरा हुआ है। लिहाजा, नेपाल कम शर्तों और कम ब्याज दरों पर चीन से ऋण चाहता है, वहीं नेपाल के आर्थिक विशेषज्ञ बार बार जनता को यह बता रहे हैं, जब वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक कम शर्तों पर लोन देने के लिए तैयार हैं, तो फिर नेपाली ऋण लेने की कोशिश क्यों की जा रही है।

लिहाजा, नेपाल की सरकार पर दबाव है, कि वो चीन को इन बैंकों की शर्त पर पारदर्शी तरीक से ऋण देने के लिए तैयार करे। इसके अलावा, नेपाल बीआरआई प्रोजेक्ट्स में अनुदान भी चाहता है।

लेकिन, शी जिनपिंग का महत्वाकांक्षी BRI प्रोजेक्ट में कोई अनुदान नहीं है और नेपाल या श्रीलंका की समस्याएं बीजिंग की नहीं हैं, जैसा कि हाल के दिनों में देखा गया है। लिहाजा, माना जा रहा है, कि अगर नेपाल चीन की शर्तों पर तैयार नहीं हुआ, तो फिर दोनों देशों में खटास भी आ सकती है।

लिहाजा, एक्सपर्ट्स प्रधानमंत्री प्रचंड को सलाह दे रहे हैं, वो चीन के जहर वाले फल को चखने की कोशिश ना करे। पिछले कुछ वर्षों के आधार पर, यह साफ पता चलता है, कि शी जिनपिंग की दिलचस्पी, नेपाल को सिर्फ और सिर्फ एक ग्राहक राज्य की तरह ट्रीट करना और भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना है, लेकिन नेपाली एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं, कि श्रीलंकाई और पाकिस्तानी अर्थव्यवस्थाओं की खस्ता हालत नेपाल के लिए एक पर्याप्त चेतावनी होनी चाहिए, ऐसा न हो, कि वे चीन के ऋण जाल में फंसने की कतार में अगले देश बन जाएं।'

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