चीन और रूस में बनी 'अटूट' दोस्ती से अमेरिका परेशान, भारत के लिए भी हो सकता है खतरा?
चीन रूस के बहाने अमेरिका पर भी प्रेशर बनाने की कोशिश रहा है और चीन की जनता ने यूक्रेन युद्ध में खुले तौर पर रूस का समर्थन किया है।

China Russia America: पिछले साल नवंबर महीने में इंडोनेशिया के बाली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी, तो ऐसा लगा, कि दोनों महाशक्तियों के बीच के तनाव में कुछ कमी आ सकती है। लेकिन, उस तनाव में तो कोई कमी नहीं आई है, मगर चीन और रूस की 'अटूट' दोस्ती ने अमेरिका की पेशानी पर बल ला दिए हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन इसी हफ्ते चीन की यात्रा करने वाले हैं और बाइडेन से राष्ट्रपति बनने के बाद ये पहला मौका है, जब अमेरिकी विदेश मंत्री चीन जा रहे हैं, लेकिन एंटनी ब्लिंकन की चीन यात्रा के मायने काफी अलग होने वाले हैं।

चीन-रूस में अटूट हो गई दोस्ती!
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले साल बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक से पहले इन्हीं दिनों रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बीजिंग में स्वागत किया था और पुतिन के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था और उस दौरान दोनों देशों के बीच दोस्ती की 'कोई सीमा नहीं' साझेदारी की घोषणा की गई थी और उसके ठीक दो हफ्ते बाद जब रूसी बम यूक्रेन में बरसने लगे और अब एक साल होने के करीब पहुंचने के बाद भी, जब यूक्रेन आधा तबाह हो चुका है, चीनी नेता ने रूस की आलोचना नहीं की है। हालांकि, बीजिंग ने संघर्ष में निष्पक्षता का दावा किया और रूस की मंशा के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं होने की बात कही, लेकिन फिर भी बीजिंग ने मॉस्को की निंदा नहीं की। वहीं, चीन लगातार यूक्रेन को हथियार उपलब्ध करवाने के लिए अमेरिका की निंदा करता रहा है। वहीं, चीन ने यूक्रेन में संघर्ष भड़काने के लिए नाटो को जिम्मेदार ठहराया है। लिहाजा, यूक्रेन युद्ध के एक साल होने के करीब है और जब एंटनी ब्लिंकन चीन की यात्रा करने वाले हैं, तो उनके मन में रूस और चीन के बीच बनी इस दोस्ती को लेकर सौ सवाल जरूर होंगे।

क्या चीन का रूख पड़ रहा है नरम?
विश्लेषकों का कहना है, कि अपनी सख्त कोविड पॉलिसी से पीछे हटने के बाद आर्थिक तौर पर परेशान होने की वजह से बीजिंग ने पश्चिमी देशों की तरफ अपनी आक्रामकता में कमी की है और पश्चिमी सरकारों की तरफ अपनी कूटनीतिक कदम को बढ़ाया है। फरवरी की शुरुआत में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन चीन की यात्रा करने वाले हैं और एंटनी ब्लिंकन की यात्रा के साथ ही कुछ पश्चिमी सरकारों ने भी इस बात को लेकर संकेत दिए हैं, कि आने वाले महीनों में कई विदेश मंत्री चीन की यात्रा कर सकते हैं। वहीं, माना ये भी जा रहा है, कि चीनी समकक्षों के साथ तनाव के शांतिपूर्ण समाधान की तरफ भी बात हो सकती है, लेकिन असल मामला रूस को लेकर अटक जाता है, कि आखिर रूस को लेकर चीन का रूख कैसा रहने वाला है?

क्या रूस के लिए जारी रहेगा चीन का समर्थन?
रूस को दिए जाने वाले व्यापारिक, राजनीतिक और सैन्य समर्थन की जब बात आती है, तो फिर चीन की एक अलग कहानी सामने आती है। उन मेट्रिक्स से पता चलता है, कि पिछले एक साल में चीन ने अपनी "कोई सीमा नहीं" साझेदारी को रूस के साथ आगे ही बढ़ाया है और हाल के महीनों में इन संबंधों में और तेजी ही आई है। चीन ने इस दौरान यही कोशिश की है, कि अमेरिका का प्रभाव जितना संभव हो, उसे कम किया जाए। वहीं, कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के एक वरिष्ठ साथी अलेक्जेंडर गैब्यूव ने कहा, कि "चीन अपनी जनता के लिए नई कहानी बनाने में काफी माहिर है।"

अमेरिका ने दी थी चीन को चेतावनी
यूक्रेन में युद्ध के शुरुआती दिनों में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने पुतिन के आक्रमण के लिए किसी भी भौतिक समर्थन के लिए संभावित परिणामों की चीनी सरकार को चेतावनी दी थी। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने लगातार कहा है, कि उनके पास ऐसे कोई सबूत तो नहीं हैं, जिससे पता चले, कि चीन रूस को घातक हथियार प्रदान कर रहा है, लेकिन अमेरिका ने हाल ही में चीन को लेकर चिंता जताई थी, कि राज्य के स्वामित्व वाली चीनी कंपनियों ने रूस को गैर-घातक उपकरण बेचे हैं, हालांकि, बीजिंग ने इन आरोपों से जोरदार इनकार किया है। वहीं, अमेरिका ने इसके बदले में कई चीनी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। वहीं, कई चीनी कंपनियों ने इस तरह से भी रूस को मदद पहुंचाने की कोशिश की है, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन ना हो सके। वहीं, बीजिंग ने लंबे समय से जोर दिया है, कि वह संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में एक "रचनात्मक भूमिका" निभाना चाहता है, और सितंबर की एक बैठक के दौरान, पुतिन ने स्वीकार किया था, कि बीजिंग ने संकट के बारे में "सवाल और चिंताएं" उठाई हैं।

क्या भारत के लिए भी हैं चिंताएं?
भारत को चीन को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसी बात को लेकर है, कि भारत अपने हथियारों को लेकर रूस पर काफी ज्यादा निर्भर रहा है। अभी भी भारत के 60 प्रतिशत से ज्यादा उपकरण रूस निर्मित हैं, लिहाजा चीन के साथ तनाव की स्थिति में रूस का कदम क्या होगा, ये भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाला है। हालांकि, भारत को लेकर अभी तक रूस ने अपने किसी भी स्टैंड में परिवर्तन नहीं किया है, लेकिन एक्सपर्ट्स इस बात पर जरूर चिंता जताते हैं, कि चीन के साथ तनाव की स्थिति में क्या चीन की मदद के बोझ में दबे रूस, क्या भारत की मदद से इनकार तो नहीं कर देगा?












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