ब्लॉग: 1967 से पहले मुस्लिम चरमपंथी थे कहां?

फ़लस्तीनी समर्थक

आज से आधी शताब्दी पहले यानी सात जून 1967 को दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक भयंकर दुख का दिन था.

उस दिन इसराइल ने छह दिन की लड़ाई के बाद मक्का और मदीना के बाद इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर क़ब्ज़़ा कर लिया था. इस तरह शहर सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के दोबारा क़ब्ज़े के बाद, पहली बार ये मुक़द्दस शहर मुस्लिम हाथों से निकल गया.

इससे दुनिया भर में मुसलमानों को एक ज़बरदस्त झटका लगा. अरब महिलाएं रोती, अपनी छातियां पीटती सड़कों पर निकल आईं. मर्दों ने बाजुओं में काली पट्टियां बांधी और काले झंडों के साथ प्रदर्शन किया. मेरे बड़े भाई के अनुसार उस समय मुस्लिम समुदाय को नपुंसक होने का एहसास सताये जा रहा था.

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येरुशलम

वर्तमान दौर में शायद पहली बार विश्व मुस्लिम समुदाय ने इतनी ज़बर्दस्त एकता दिखाई होगी. और शायद पहली बार इस क़दर बेबस महसूस किया होगा. इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की साझा फौजों को महज़ छह दिनों में अकेले मात दे दी और पूर्वी येरूशलम पर इतनी आसानी से क़ब्ज़ा कर लिया.

अब येरूशलम पर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के क़दम से एक बार फिर मुस्लिम देशों में एकता नज़र आई है. तुर्की में एक सम्मलेन में इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) ने पूर्वी येरुशलम को फ़लस्तीन की राजधानी के रूप में घोषित कर दिया है और ट्रंप के क़दम को "ख़तरनाक" बता कर खारिज कर दिया है.

लेकिन 50 साल बाद एक बार फिर मुसलामन खुद को बेबस महसूस कर रहा है. इस्लामिक देशों के सम्मलेन और बयानों को राष्ट्रपति ट्रंप ने बड़ी आसानी से ख़ारिज कर दिया.

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मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने चेतावनी दी है कि ट्रंप के एकतरफ़ा क़दम के परिणाम बहुत बुरे होंगे- एक बार फिर से ख़ून खराबा होगा और हिंसा बढ़ेगी. अब तक मुस्लिम समाज की मुख़ीलिफ़त फीकी रही है, मगर मुस्लिम बुद्धिजीविओं की बातों को ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

अगर इस्लामिक और मुस्लिम चरमंपथी हमलों के इतिहास पर नज़र डालें तो 1967 से पहले मुस्लिम चरमपंथी ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे. हाँ 1948 में इसराइल की स्थापना से पहले यहूदी चरमपंथी ज़रूर मौजूद थे.

पहला बड़ा चरमपंथी हमला जिसमें मुस्लिम शामिल थे 1972 के म्यूनिख ओलिंपिक के दौरान हुआ. हमलावर फ़लस्तीनी थे और इसराइली खिलाड़ी उनका निशाना थे. लेकिन ये सियासी अधिक और इस्लामिक कम था.

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इस्लामिक देशों के अनुसार ट्रंप ने पूर्वी येरूशलम को इसराइल की राजधानी मान कर जो ग़लती की है उससे अंतर्राष्ट्रीय क़ानून भी कमज़ोर होंगे जिसके अंतर्गत पूर्वी येरूशलम पर इसराइल का क़ब्ज़ा नाजायज़ माना जाता है.

दरअसल पिछले दो हज़ार सालों में और 1948 में इसराइल की स्थापना से पहले यहूदियों ने शहर पर कभी हुकूमत नहीं की है. हुकूमत या तो मुसलमानों की रही है ये फिर ईसाईयों की.

लिखित इतिहास के अनुसार 2000 साल पहले शहर पर रोमन साम्राज्य का शासन था. इसके बाद बीजान्टिन आए. इस्लाम ने जल्द प्रवेश किया और हज़रात उम्र ने शहर पर क़ब्ज़ा जमा लिया. इसके बाद शिया साम्राज्य भी आए.

उधर यूरोप में ईसाई इस शहर का दीदार करने के लिए तिलमिला रहे थे. उन्होंने ये शहर पहले कभी नहीं देखा था. मुसलमानों और यहूदियों की तरह उनके लिए भी शहर पवित्र था. शहर पर शासन मुसलमानों का था और मुस्लिम-यहूदी मिल जुल कर रहते थे.

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आख़िरकार 1099 में ईसाईयों की ख़ाहिश पूरी हो गई. यूरोप की ईसाई फ़ौज या कहें धर्मयोद्धाओं ने शहर पर कब्ज़ा करके अपना प्रशासन शुरू किया. इस लड़ाई में यरुशलम के 40,000 मुस्लिम और यहूदी तीन दिनों के अंदर क़त्ल कर दिया गए.

उसके बाद मुसलमानों को शहर पर क़ब्ज़ा वापस लेने के लिए लगभग 100 साल का लंबा इंतज़ार करना पड़ा. 1187 में ल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ईसाई फ़ौज को शिकस्त देकर हमेशा के लिए मुसलमानों का हीरो हो गया.

उसके बाद कई सौ सालों के बाद एक बार फिर शहर मुस्लिम शासन के हाथों से निकल गया जिसको 1967 में अंजाम दिया इसराइल ने.

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यरुशलम तीनों बड़े मज़हबों, यानी ईसाई, यहूदी और इस्लाम को जोड़ता भी है और उनके बीच हिंसा कर कारण भी बनता है.

इसका मतलब साफ़ है कि ये एक संवेदनशील मामला है और इसका समाधान वही कर सकता है जिसे इतिहास का ज्ञान हो और समय का परिप्रेक्ष्य जो ट्रंप के आलोचकों के अनुसार उनमें नहीं है.

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