राष्ट्रपति बन सकते थे शरद पवार? अब NDA में जाने के मूड में हैं दिग्गज नेता, विधायक पाला बदलने की लाइन में

Maharashtra Politics Sharad Pawar NDA: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नेता को लेकर है तो वह हैं शरद पवार। पिछले कुछ दिनों में उनकी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से हुई मुलाकातों ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले का एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि अगर शरद पवार 2014 में NDA में शामिल हो गए होते तो आज देश के राष्ट्रपति भी बन सकते थे।

दूसरी तरफ उनकी पार्टी NCP (SP) के कुछ विधायकों के पाला बदलने की चर्चाएं भी तेज हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या महाराष्ट्र की राजनीति किसी बड़े बदलाव की तरफ बढ़ रही है या फिर यह सिर्फ सियासी अटकलें हैं। आइए पूरा मामला समझते हैं।

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देश के राष्ट्रपति बनते-बनते भी रह गए शरद पवार?

मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने एक बड़ा दावा करके महाराष्ट्र की राजनीति का पारा चढ़ा दिया है। अठावले ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि उन्होंने पहले भी कई बार शरद पवार को एनडीए में आने का न्योता दिया था।

केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा, "शरद पवार महाराष्ट्र के बहुत बड़े और सम्मानित नेता हैं। मैंने खुद उन्हें कई बार एनडीए में शामिल होने का ऑफर दिया था। अगर वे साल 2014 में ही एनडीए के साथ आ जाते, तो आज वे देश के राष्ट्रपति बन चुके होते। उस वक्त उन्होंने मना कर दिया था, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। शरद पवार के हर पार्टी में दोस्त हैं, इसलिए वे किसके साथ बैठ रहे हैं, यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए।"

हालांकि, इस समय (साल 2026 में) शरद पवार की उम्र 85 साल हो चुकी है। साल 2022 के राष्ट्रपति चुनाव के समय भी विपक्ष उन्हें साझा उम्मीदवार बनाना चाहता था लेकिन बीजेपी के पास भारी बहुमत होने के कारण पवार ने खुद ही इस रेस से पैर पीछे खींच लिए थे। अब अगले राष्ट्रपति चुनाव में काफी वक्त है, ऐसे में अठावले का यह बयान पवार की मौजूदा राजनीतिक हैसियत को रेखांकित करने के लिए काफी है। लेकिन अब शरद पवार के राष्ट्रपति बनने की उम्मीद कम है।

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क्या सचमुच NDA के करीब पहुंच रहे हैं शरद पवार?

रामदास आठवले ने दावा किया कि उन्होंने कई बार शरद पवार को NDA में शामिल होने का न्योता दिया था। पहले वो नहीं माने लेकिन अब समय बदल चुका है, राजनीतिक हालात बदल चुके हैं, ऐसे में हो सकता है कि भविष्य में शरद पवार NDA में आ जाए।

हालांकि इस दावे पर अभी तक शरद पवार या उनकी पार्टी की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं आया है जिससे यह माना जाए कि उन्होंने NDA में जाने का फैसला कर लिया है। इसलिए फिलहाल इसे राजनीतिक बयान और अटकलों के तौर पर ही देखा जा रहा है।

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राजनीति में कोई भी मुलाकात बिना वजह नहीं होती। कुछ दिन पहले शरद पवार ने पहले बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस और फिर अगले ही दिन अचानक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के दफ्तर जाकर उनसे मुलाकात की। शिंदे तो अपनी कैबिनेट बैठक बीच में छोड़कर पवार का स्वागत करने पहुंचे। हालांकि इसे महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद की हाई-पावर कमेटी से जुड़ी एक 'शिष्टाचार भेंट' बताया गया, लेकिन इस मुलाकात के तुरंत बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा तय हो गया, जहां वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि पवार अपने भतीजे अजीत पवार की तरह ही एनडीए का दामन थाम सकते हैं।

इसी दौरान एकनाथ शिंदे के दिल्ली दौरे और गृह मंत्री अमित शाह से संभावित मुलाकात की खबरों ने भी राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी। हालांकि शाह-शिंदे बैठक को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

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NCP-SP में टूट की तैयारी, 5 विधायक लाइन में

एक तरफ शरद पवार के एनडीए में जाने की अटकलें हैं, तो दूसरी तरफ उनकी पार्टी एनसीपी-एसपी के भीतर विधायकों की छटपटाहट बढ़ गई है। पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले भले ही इन खबरों को बकवास बता रही हैं लेकिन सूत्रों का कहना है कि पार्टी के 10 विधायकों में से 5 विधायक पाला बदलने की फिराक में हैं।

ये विधायक विपक्ष में बैठकर अपनी सियासी जमीन कमजोर नहीं करना चाहते। उनका मानना है कि अगर वे सत्ताधारी महायुति (NDA) सरकार का हिस्सा बनते हैं, तो उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्रों के लिए अच्छा विकास फंड और प्रशासनिक मंजूरियां आसानी से मिल जाएंगी।

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कांग्रेस का अलग प्लान, शरद पवार की बढ़ी मुश्किलें

शरद पवार की पार्टी में इस भगदड़ की एक वजह कांग्रेस का अंदरूनी गेम प्लान भी माना जा रहा है। महाराष्ट्र कांग्रेस के बड़े नेता नहीं चाहते कि शरद पवार की पार्टी का सीधे कांग्रेस में विलय हो। कांग्रेस की रणनीति यह है कि वे एनसीपी-एसपी के विधायकों और सांसदों को अलग-अलग मौकों पर अपनी पार्टी में शामिल कराएं ताकि दोनों सदनों में कांग्रेस की अपनी ताकत बढ़े।

अगर पूरी पार्टी का विलय होता है, तो कांग्रेस को शरद पवार के बड़े नेताओं को संगठन में बड़े पद देने पड़ेंगे। इससे कांग्रेस के पुराने नेता पीछे छूट जाएंगे। यही वजह है कि कांग्रेस केवल चुनिंदा चेहरों पर ही डोरे डाल रही है, जिससे एनसीपी-एसपी के बाकी विधायक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

संजय राउत के बयान पर भड़की NCP

शरद पवार और एकनाथ शिंदे की इस नजदीकी ने महाविकास अघाड़ी के सहयोगियों के कान खड़े कर दिए हैं। उद्धव ठाकरे गुट के नेता संजय राउत ने इस पर तीखा हमला बोला। शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने नाराजगी जताते हुए कहा "शरद पवार एक बहुत ही सीनियर नेता हैं। लेकिन जब वे उस गद्दार (एकनाथ शिंदे) के केबिन में जाकर मीटिंग करते हैं जिसने हमारी सरकार गिराई, तो इससे उनकी विश्वसनीयता कम होती है। यह गद्दारों को बढ़ावा देने जैसा है। हमारा दिल इतना बड़ा नहीं है कि हम गद्दारों के दफ्तर में जाकर अपनी बैठकें करें।"

इस बयान पर पलटवार करने में एनसीपी (एसपी) के प्रवक्ता अमोल मातेले ने कहा,

"संजय राउत को राजनीति की बुनियादी समझ होनी चाहिए। एकनाथ शिंदे एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं। सूखा, आरक्षण और विकास जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री से बात करना एक सीनियर नेता की जिम्मेदारी है। अगर एक मुलाकात से हमारा गठबंधन डगमगा जाता है, तो साफ है कि इसकी नींव बहुत कमजोर है।"

अब जान लीजिए वो कहानी, जब पीएम बनते-बनते रह गए शरद पवार

यह पहली बार नहीं है जब शरद पवार देश के सर्वोच्च पद पर बैठते-बैठते रह गए हों। इससे पहले साल 1991 में वे देश के प्रधानमंत्री बनने की बेहद मजबूत स्थिति में थे। लोकसभा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में नए नेता की तलाश थी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर दमदार प्रदर्शन करने वाले शरद पवार पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस नेताओं ने पीवी नरसिम्हा राव के पक्ष में माहौल बना दिया। पवार ने अपनी किताब 'लाइफ ऑन माई टर्म्स' में दावा भी किया है कि सोनिया गांधी के मन में यह डर बैठा दिया गया था कि अगर पवार पीएम बने तो वे कभी इस कुर्सी को नहीं छोड़ेंगे। नतीजा यह हुआ कि उन्हें सिर्फ रक्षा मंत्री के पद से संतोष करना पड़ा।

साल 1996 में जब संयुक्त मोर्चा की सरकार बन रही थी, तब भी पवार का नाम रेस में था लेकिन बाजी एचडी देवेगौड़ा मार ले गए। इसके बाद 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर पवार ने कांग्रेस छोड़ दी और एनसीपी बनाई। इस एक फैसले ने उनके राष्ट्रीय स्तर पर पीएम बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए। 2004 में भी यूपीए की सरकार तो बनी लेकिन कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और पवार को कृषि मंत्रालय संभालना पड़ा।

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