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नाना जुल्फिकार ने खाई थी हजार साल तक लड़ने की कसम, मां बेनजीर भी नहीं थी कम.. बिलावल का भारत से 'नाता' समझिए

भारत और पाकिस्तान के अलावा, एससीओ के अन्य सदस्य देश चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं। इन आठ सदस्य देशों में वैश्विक जनसंख्या का लगभग 42% और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 25% हिस्सा है।

bilawal bhutto india trip

Bilawal Bhutto India Visit: पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो आज शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रहे हैं, लेकिन एक बात जो हर कोई समझ रहा है, कि उनके दौरे को लेकर बेतुकी उम्मीदों का माहौल बनाया जा रहा है।

कहते हैं, सियासत में भूलने की बीमारी होती है और बात अगर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की हों, तो भूलने की ये बीमारी और जबरदस्त हो जाती है। भारत में बिलावल भुट्टो के दौरे को उम्मीदों से जोड़ने वालों को भूलने की इसी बीमारी से जोड़कर देखना चाहिए।

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बिलावल भुट्टो की चार पीढ़ियां भारत से दुश्मनी निकालने में लगी रही और इसकी शुरूआत उनके परनाना शाहनवाज भुट्टो ने ही की थी, जिन्होंने 1931 में बंबई से सिंध को अलग करने की मुहिम चलाई थी और 1947 में जूनागढ़ की रियासत से जुड़ गये। कहा जाता है, कि जूनागढ़ के नवाब को पाकिस्तान में विलय करने का आइडिया बिलावल भुट्टो के परनामा शाहनवाज भुट्टो ने ही दी थी, हालांकि ये कोशिश कामयाब नहीं हो पाई, लेकिन शाहनवाज भुट्टो के हिस्से में हजारों एकड़ जमीन आई।

शाहनवाज भुट्टो ने तीन शादियां कीं, जिनमें से एक शादी उन्होंने नचनिया लखीबाई से की, दो बाद में मुस्लिम बन गईं और उन्ही के तीसरे बेटे थे जुल्फीकार अली भुट्टो, जिन्होने हजार साल तक भारत से जंग लड़ने का ऐलान किया था।

यही बात हमें युवा बिलावल भुट्टो जरदारी तक ले आती है। भारत की धरती पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री के आगमन को दुर्लभ पासिंग धूमकेतुओं से जुड़ी समान उल्लेखनीयता के साथ देखा जाता है। खासकर, अगर नाम के साथ टाइटल भुट्टो लगा हो, तो ये महत्व और बढ़ जाता है।

जुल्फीकार.. जिन्होंने हजार साल लड़ने की कसम खाई

1971 के युद्ध में भारत से करारी हार के बाद, बिलावल भुट्टो के नाना, जुल्फिकार अली भुट्टो, जो पाकिस्तान के नवोदित लोकतंत्र के अग्रदूत माने जाते थे, वो चौदह साल के सैन्य शासन की छाया से उभर कर भारत आए, जहां उन्होंने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए।

बिलावल भुट्टो की मां बेनजीर, जो तब एक किशोरी थीं, वो भी अपने पिता के साथ उस यात्रा पर भारत आईं थीं, जहां उनके पिता ने एक समझौता किया, जिसे पाकिस्तान में पाकिस्तान को बेच देने वाला समझौता माना गया, क्योंकि, शिमला समझौते के बाद भी भारत ने पाकिस्तान के 92 हजार सैनिकों को रिहा किया था।

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भारत में भी इस समझौते पर सवाल उठाए गये, कि बांग्लादेश के निर्माण के मुश्किल से छह महीने बाद भारत ने कश्मीर समझौते पर एक टिकाऊ समाधान के अवसर को कैसे गंवा दिया? सवाल उठे, कि युद्ध के मैदान में सेना ने जो हासिल किया था, उसे भारत बातचीत की मेज पर कैसे खो सकता है? ये परेशान करने वाले सवाल नहीं थे।

जुल्फीकार अली भुट्टो 1971 का जंग हारकर भारत आए थे और ये हार उन्हें बर्दाश्त नहीं थी, क्योंकि 1965 की जंग में जब पाकिस्तान की हार हुई थी, तब जुल्फीकार अली भुट्टो ने काफी शोर मचाया था। साल 1967 में जुल्फीकार अली भुट्टो ने एक रैली में कहा, 'हम भूखे रहेंगे, लेकिन 1000 साल तक भारत से लड़ेंगे।' जुल्फीकार अली भुट्टो का ये बयान आग की तरह पाकिस्तान में फैला और वो पाकिस्तानी अवाम के नये नायक बन गये। देश ने जनरल अयूब के सैन्य शासन के खत्म होते ही जुल्फीकार अली भुट्टो को देश का प्रधानमंत्री बना दिया, लेकिन 1971 की लड़ाई में हार और पाकिस्तान के विभाजन ने जुल्फीकार के इमेज को तहस-नहस कर दिया था।

हालांकि, 1972 में शिमला समझौता होने के बाद जुल्फीकार अली भुट्टो अपने बयान से पलट गये थे।

पाकिस्तान की रगों में अभी भी भुट्टो का जहर

जुल्फीकार अली भुट्टो भले ही बाद में अपने बयान से पलट गये थे, लेकिन पाकिस्तान की अवाम की नसों से वो जहर अभी तक नहीं निकला है और पाकिस्तान ने उसके बाद भी बार बार शिमला समझौते का उल्लंघन किया। पाकिस्तान अपनी शक्ति का एक बड़ा हिस्सा, भारत को नुकसान पहुंचाने में खर्च करता रहा।

पाकिस्तान, 1971 की लड़ाई में मिली जबरदस्त हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था और सीधी लड़ाई छोड़कर जिदाह और आतंकवाद के रास्ते पर चल निकला। पाकिस्तानी अवाम के दिलों में भारत के खिलाफ इतनी नफरत भरी गई, कि वो हर भारतीय को अपना दुश्मन मानने लगे। जो पाकिस्तान तरक्की के रास्ते पर जा सकते थे, वो भारत से दुश्मनी करते करते आज कंगाली के दरवाजे पर खड़ा है।

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दुश्मनी को आगे बढ़ातीं बेनजीर

बेनजीर जब शिमला समझौते के वक्त भारत पहुंची थीं, तो उस वक्त वो सिर्फ 19 साल की थीं, लेकिन पिता की विरासक संभालने के बाद उन्होंने कश्मीर के खिलाफ काफी जहरीले बयान दिए। कहा जाता है, कि कश्मीर में जिहाद का बीज बोने का अभियान बेनजीर भु्ट्टो के इशारे पर ही चलाया गया था।

1990 में बेनजीर भुट्टो ने कहा था, "कश्मीर के लोग मौत से नहीं डरते, क्योंकि वो मुसलमान हैं और उनके अंदर मुजाहिदीन खून है।" बेनजीर भुट्टो ने ही कश्मीर के लोगों के मन में 'आजादी' और भारत से नफरत का बीज बोया था। और उसी का नतीजा रहा, कि हजारों लोग मारे गये। कहा जाता है, कि कश्मीर में आतंकवाद फैलाने में बेनजीर का बहुत बड़ा योगदान था, हालांकि खुद बेनजीर भी 2007 में आतंकी हमले में ही मारी गईं।

बिलावल भुट्टो भी उसी भुट्टो परिवार के वंशज हैं और अपने नाना की तरह ही जहरीले बोल बोलने में माहिर हैं। बिलावल भुट्टो ने राजनीति में कदम रखने के साथ ही भारत के खिलाफ जहरीली बयानबाजी शुरू कर दी थी और उनका ताजा बयान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अमर्यादित और आपत्तिजनक टिप्पणी था।

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    बिलावल भुट्टो ने दिसंबर 2022 में कहा था, पीएम मोदी को 'बूचर ऑफ गुजरात' कहा था, जिसको लेकर पाकिस्तान के भीतर भी उनकी आलोचना की गई। लिहाजा, बिलावल के भारत दौरे से किसी भी तरह की कोई उम्मीद लगाना, अपने आपको धोखा देना है।

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