सुन्नी बहुल देश सीरिया में चौथी बार राष्ट्रपति बने शिया नेता बशर अल असद, भड़का अमेरिका
बशर अल-असद को भी दुनियाभर के देशों में एक तानाशाह नेता के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, जब वो पहली बार सत्ता में आए थे तो उन्होंने सीरिया की जनता से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की बात कही थी।
दमिश्क, मई 28: 2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध की शुरूआत के साथ ही एक खूबसूरत देश बेहाली की आग में जलने लगा। इस युद्ध में किसे फायदा हुआ और किसे नुकसान, ये तो सीरिया की अलग अलग पार्टियां और उनके नेता जाने, लेकिन पिछले 10 साल में सीरिया में 2 लाख 88 हजार लोग बेमौत मारे गये हैं। ऐसे में सीरिया में फिर से चुनाव ने एक राजनीतिक उम्मीद जरूर जलाई है। हालांकि, इस चुनाव को लेकर भी कई तरह के सवाल हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर चुनाव एक सकारात्मक बात ही कही जा सकती है। शिया नेता बशर अल-असद लगातार तौथी बार सीरिया के राष्ट्रपति चुन लिए गये हैं और उन्हें इस बार चुनाव में 95 फीसदी से ज्यादा मत हासिल हुए हैं, जो पिछले बार के मुकाबले 6 प्रतिशत ज्यादा है। पश्चिमी देशों ने बशर अल-असद के जीतने को चुनावी ढोंग करार दिया है।

बशर अल-असद बने चौथी बार राष्ट्रपति
पिछले 10 सालों में सीरिया में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2 लाख 88 हजार लोग मारे गये हैं जबकि एक करोड़ से ज्यादा लोगों को विस्थापित जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा है। और इन सबके बीच चुनाव करवाकर सीरिया की सरकार ने दावा किया है कि देश सामान्य स्थितियों की तरफ बढ़ रहा है। सीरिया की संसद के प्रमुख हमौदा सब्बाग के मुताबिक इस बार चुनाव में करीब 78 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, जिसमें बशर अल-असद को करीब 95.1 फीसदी यानि करीब 1 करोड़ 35 लाख वोट मिले हैं और बशर अल-असद लगातार चौथी बार सीरिया की सत्ता संभालेंगे। इस जीत के साथ ही अगले सात सालों तक बशर अल-असद सीरिया के राष्ट्रपति बने रहेंगे। बशर अल-असद की जीत के साथ ही सीरिया के कई इलाकों में जश्न का माहौल देखा गया और लोग आतिशबाजी करते नजर आए।

बशर अल-असद की एकतरफा जीत
बशर अल-असद को भी दुनियाभर के देशों में एक तानाशाह नेता के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, जब वो पहली बार सत्ता में आए थे तो उन्होंने सीरिया की जनता से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने और देश में लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ाने की बात कही थी। लेकिन, धीरे धीरे उन्होंने भी सीरिया में तानाशाही व्यवस्था ही कामय कर दी। सीरिया की विपक्षी पार्टियों ने इस चुनाव को खारिज करते हुए चुनाव के एकतरफा होने का आरोप लगाया है। आपको बता दें कि 2014 के चुनाव में 88 प्रतिशत वोट बशर अल-असद को मिले थे, जबकि इस बार 95 प्रतिशत वोट मिले हैं। बशर अल-असद के दो विरोधियों अब्दुल्ला सालोम को 1.5 प्रतिशत तो महमूद मेरही को 3.3 प्रतिशत वोट मिले हैं। बशर अल-असद ने लगातार चौथी बार जीत हासिल करने के बाद फेसबुक पर लिखा कि 'राष्ट्रवादी भावना दिखाने के लिए सभी सीरियाई लोगों को धन्यवाद। सीरिया के लोगों, बच्चों और जवानों के अच्छे भविष्य के लिए साथ आएं और कल से नये अभियान की शुरूआत करें।'

अमेरिका ने चुनाव को बताया ढोंग
बशर अल-असद को रूस और ईरान का पूरी तरह से समर्थन हासिल है, लिहाजा अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने सीरियाई चुनाव को फर्जी करार दिया है। वहीं अमेरिका का कहना है कि जब तक बशर अल-असद सीरिया की सत्ता में सक्रिय हैं तब तक सीरिया में निष्पक्ष चुनाव होना संभव नहीं है। वहीं रिपोर्ट के मुताबिक सीरिया के उत्तर-पूर्वी इलाकों में मतदान ही नहीं हुआ, क्योंकि वहां कुर्दिश लड़ाकों का वर्चस्व है, जिन्हें अमेरिका का समर्थन हासिल है। इसके साथ ही सीरिया के उत्तर-पश्चिमी इलाके इदबिल प्रांत में भी मतदान नहीं हुआ क्योंकि यहां पर भी विद्रोहियों का कब्जा है तो दक्षिणी प्रांत दारा और स्वीडा के कई इलाकों में लोगों ने मतदान का ही बहिष्कार कर दिया था।

1970 से शासन में अल असद का परिवार
सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद का परिवार 1970 से शासन में है और पूरे देश पर बशर अल असद के परिवार का कब्जा है। वहीं, इस बार के चुनाव को लेकर बशर अल असद के विरोधी सुहैल गाजी ने कहा था कि '2014 के चुनाव में बशर अल असद के हारने की संभावना थी लेकिन अब ज्यादातर उनके विरोधी देश से भगाए जा चुके हैं और अब सीरिया को लोग मानने लगे हैं कि बशर अल असद को हराना नामुमकिन है।' उन्होंने कहा था कि 'इस चुनाव के बाद बशर अल असद और रूस दिखाने की कोशिश करेंगे की अब सीरिया सुरक्षित हैं और बाहर गये शरणार्थियों को अब देश लौट आना चाहिए'। आपको बता दें कि साल 2000 में अपने पिता हाफिज अल-असद की मौत के बाद बशर अल असद ने सत्ता संभाली थी। बशर अल असद आंखों के डॉक्टर हैं और उन्होंने सीरिया के लोगों से वादा किया था कि वे देश में राजनीतिक सुधारों को लागू करेंगे। लेकिन, 2011 में जब अरब क्रांति के समय सीरिया में भी प्रदर्शन होना शुरू हुआ तो उन्होंने भी हिंसा और दमन का रास्ता अपनाया और तब से करीब 3 लाख 88 हजार लोग सीरिया में मारे गये।












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