बांग्लादेश के इस्लामिक नेताओं का बीजिंग में जमावड़ा, भारत के खिलाफ चीन ने लिखी स्क्रिप्ट, कितनी बड़ी टेंशन?
Bangladesh-China: शेख हसीना सरकार के इस साल 5 अगस्त को बांग्लादेश छोड़ने के बाद चीन ने देश के कट्टर इस्लामिक नेताओं की बड़ी बैठक बुलाई है और बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों के नेता इस वक्त बीजिंग के निमंत्रण पर चीन का दौरा कर रहे हैं।
चीन में बांग्लादेश के इस्लामिक नेताओं के जमावड़े को लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है, कि यह हसीना सरकार के पतन के बाद दक्षिण एशियाई देश में सत्ता केंद्रों से जुड़ने की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) की रणनीति का हिस्सा है।

14 सदस्यीय टीम का नेतृत्व जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय नेता नायब-ए-अमीर और पूर्व सांसद सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहिर कर रहे हैं। जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी संगठन है, जो भारत विरोधी रुख रखने के लिए जाना जाता है।
बांग्लादेश की राजनीति में कैसे घुसा है चीन?
चीन, 2009 से शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन बीएनपी और उसके सहयोगियों के साथ भी उसके पुराने संबंध हैं, जिनमें जमात भी शामिल है, जिसके शासन के दौरान 1970 के दशक में और फिर 1991 से 1996 और 2001-06 के बीच चीन को मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट मिले थे। दिलचस्प बात यह है, कि जमात ने कभी भी उइगरों के साथ खौफनाक व्यवहार के लिए चीन की आलोचना नहीं की है।
पिछले सप्ताह बांग्लादेश में चीनी राजदूत ने ढाका में इस्लामी दलों के लिए एक स्वागत समारोह आयोजित किया था।
इस मौके पर बोलते हुए चीनी राजदूत याओ वेन ने कहा था, कि "घरेलू या क्षेत्रीय परिस्थितियों में आए बदलावों के बावजूद, चीन-बांग्लादेश संबंध स्थिर बने हुए हैं और सही दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं।"
25 नवंबर 2024 को बांग्लादेश की राजधानी में चीनी दूतावास ने सभी इस्लामी राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए एक रिसेप्शन आयोजित किया, जिसमें बांग्लादेश के जमात-ए-इस्लामी प्रमुख शफीकुर रहमान मुख्य आकर्षण थे। जमात को पाकिस्तान समर्थक संगठन माना जाता है, लेकिन शेख हसीना की अवामी लीग सरकार ने हमास सहित अन्य मुस्लिम ब्रदरहुड संगठनों के साथ इसके मजबूत संबंधों के कारण इसपर बैन लगा दिया था।
दिलचस्प बात यह है, कि यह वही दिन था जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख भिक्षु चिन्मय कृष्ण दास को ढाका पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
इस महीने की शुरुआत में, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 7 से 16 नवंबर तक चीन के बीजिंग में राजनीतिक पार्टी प्लस सहयोग कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं, जिसमें दक्षिण-पूर्व और दक्षिण एशियाई देशों के समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एक साथ आए हैं।
पूर्व में जमात-ए-इस्लामी और पश्चिम में हमास जैसे इस्लामी संगठनों के साथ चीन की दोस्ती भी पूर्व (बिम्सटेक) और पश्चिम (भारत मध्य पूर्व यूरोप आर्थिक गलियारा, आईएमईसी) में भारत के व्यापार मार्गों को बाधित करने के उनके गुप्त सपनों से उपजी है। मुस्लिम दुनिया में चीन की बढ़ती हुई ताकत को और पुख्ता करने के लिए, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद ओआईसी (इस्लामिक देशों के संगठन) से भारत की अनुपस्थिति, संगठन में चीन की बढ़ती मौजूदगी के ठीक विपरीत है।

मुस्लिम देशों में चीन की मजबूती
दिलचस्प बात यह है कि चीन, मुस्लिम आबादी के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं होने के बावजूद, ओआईसी शिखर सम्मेलनों (OIC Summit) में "विशेष अतिथि" के तौर पर आमंत्रण प्राप्त कर रहा है, जो मुस्लिम दुनिया में उसके बढ़ते भू-राजनीतिक प्रभाव की ओर इशारा करता है। ओआईसी की धारा में यह बदलाव, मध्य पूर्व और अफ्रीका में चीन की बढ़ती मित्रता को उजागर करता है, जो बेल्ट एंड रोड पहल सहित कई ओआईसी सदस्य देशों के साथ उसके आर्थिक संबंधों से प्रेरित है।
जिसकी वजह से, भारत के साथ चीन इस तरह की उभरती दोस्ती और व्यापक भू-राजनीतिक दरार, विवाद और आशंका का विषय भी हो सकती है, क्योंकि म्यांमार और बांग्लादेश राजनीतिक रूप से अशांत हैं, इन देशों की सीमा अस्थिर है और इन देशों के अनियंत्रित प्रवासी (रोहिंग्या) की तेजी से बढ़ती समस्या और बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक और भू-राजनीतिक रूप से कमजोर स्थिति जैसे फैक्टर, शत्रुता से निपटने के मामले में भारत की परेशानी को बढ़ाते हैं।
विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी, बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने और उसे बढ़ावा देने में चीन, पाकिस्तान और अमेरिकी डीप स्टेट के बीच संभावित मिलीभगत की ओर इशारा किया है।
28 नवंबर को अमेरिका के भावी राष्ट्रपति ट्रंप को लिखे एक खुले पत्र में, अमेरिका में फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIDDS) के अध्यक्ष, खंडेराव कांड ने विशेष रूप से कहा, "बांग्लादेश तेजी से एक कट्टरपंथी इस्लामिक राज्य में तब्दील हो रहा है, जो अमेरिका, विदेश विभाग और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में है, जिन्हें लोकतंत्र को बहाल करने और अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के लिए अब कार्रवाई करनी चाहिए"।
लिहाजा, भारत के लिए एक बड़ी उम्मीद वॉशिंगटन में सत्ता परिवर्तन है। डोनाल्ड ट्रंप, बांग्लादेश को लेकर भारत की कई मुश्किलें दूर कर सकते हैं, हालांकि उनसे बड़ी उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, लेकिन इतना तय हो गया है, कि मोहम्मद यूनुस और बेगम खालिदा जिया की पार्टी BNP अगर मजबूत रहती है, तो बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध खराब ही रहेंगे।












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