Earth: उस जमाने में धरती पर सिर्फ 19 घंटे का होता था एक दिन- Study
पृथ्वी हमेशा ऐसी नहीं थी, जैसा कि आज हम देख रहे हैं। अरबों साल में इसमें लगातार बदलाव होते रहे हैं। इसलिए यह आज भी इंसान के लिए रहस्यों से भरी हुई है। एक नए शोध से पता चला है कि एक ऐसा भी समय बीत चुका है, जब धरती पर एक दिन सिर्फ 19 घंटे का ही होता था।
धरती हमारे सौर मंडल में सूरज के बाद तीसरा ग्रह है। यह ब्रह्मांड में अबतक ज्ञात अकेला स्थान है, जहां जीवन की उत्पत्ति हुई और यह रहने लायक है। इस प्रक्रिया में अरबों साल गुजरे हैं। लेकिन, पृथ्वी के तूफानी इतिहास में ऐसा भी वक्त आया था, जब सबकुछ ठहर गया था।

'बोरिंग बिलियन' क्या है?
इस ठहरे हुए काल को 'बोरिंग बिलियन' के नाम से जाता है। इसपर एक नई रिसर्च नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुई है। इस शोध पत्र में बताया गया है कि इस दौरान पृथ्वी की टेक्टोनिक गतिविधि कम हो गई थी और जैविक विकास भी सीमित था।
'बोरिंग बिलियन' के दौरान ही 19 घंटे का होता था एक दिन-शोध
लेकिन, उसी 'बोरिंग बिलियन' के दौरान एक अजीब स्थिति भी पृथ्वी पर पैदा हुई, वह ये कि एक दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था। यानि धरती की घूमने की गति तेज थी। यह स्थिति हमारे ग्रह के विपरीत शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की वजह से उत्पन्न हुई थी। इस रिसर्च के बारे में चाइनीज एकैडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिक रॉस मिशेल ऑस्ट्रेलिया में कर्टिन यूनिवर्सिटी के उवे किर्शर ने बताया है।
चांद ने धरती की रोटेशनल एनर्जी खींची है-शोध
उनके मुताबिक, 'समय के साथ पृथ्वी से और दूर ज्यादा ऊंची कक्षा में पहुंचने के लिए चांद ने धरती की रोटेशनल एनर्जी को खींचा है।' दोनों भौतिक विज्ञानियों ने पृथ्वी को और अच्छी तरह से समझने के लिए हाल के समय में सामने आए जियोलॉजिकल डेटा का विश्लेषण किया है।
पृथ्वी के पैलियोरोटेशन के बारे में वैकल्पिक विचार पर आधारित शोध
इस विश्लेषण में खगोलीय बलों के कारण पृथ्वी की जलवायु में लयबद्ध परिवर्तन, इसके डगमगाने और अक्षीय झुकाव को भी शामिल किया गया है। साइंस अलर्ट ने मिशेल को कोट करते हुए कहा है, 'हमने महसूस किया कि यह आखिरकार एक प्रकार के बाहरी सतह के परीक्षण का समय था, लेकिन पूरी तरह से उचित और पृथ्वी के पैलियोरोटेशन के बारे में वैकल्पिक विचार के अनुसार।'
ग्रेट ऑक्सिडेशन इवेंट में क्या हुआ?
उनकी परिकल्पना के मुताबिक, धरती पर लगातार एक तरह की लंबाई वाले दिन की शुरुआत वायुमंडलीय परिस्थितियों में महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव के बाद हुई। गौरतलब है कि धरती के इतिहास में एक ग्रेट ऑक्सिडेशन इवेंट भी हुआ था, जब ऑक्सीजन स्तर बहुत बढ़ गया था, जिससे ओजोन लेयर पैदा हो गया, जो बाद में छितरा गया।
सौर ज्वार क्या है?
इन शोधकर्ताओं का तर्क है कि अतिरिक्त ओजोन लेयर बनने से उसने सूर्य के प्रकाश को जल वाष्प से भी ज्यादा सोख लिया। इसकी वजह से धरती की कम जानी जाने वाली घटना सौर ज्वार की स्थिति पैदा हुई। यदि मिशेल और किर्शर की परिकल्पना सही है और ओजोन एवं सूर्य के प्रकाश ने वायुमंडलीय ज्वार को तेज किया तो इससे विपरीत बल असंतुलित हो सकते हैं।
इन प्राकृतिक घटनाक्रमों की वजह से पृथ्वी पर लंबी अवधि तक ऐसी स्थिति बनी कि दिन सिर्फ 19 घंटे का ही होने लगा, क्योंकि इसकी घूमने की गति तेज थी। वैसे समुद्री ज्वार को नियंत्रित करने में चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की तुलना में अभी सौर ज्वार फीका पड़ जाता है। लेकिन, इतिहास में स्थिति अलग थी। लेकिन, पृथ्वी की घूमने की गति तेज रहने पर चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अभी के चौथाई रह जाएगी।
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