America Nuclear Testing: 30 साल बाद फिर न्यूक्लियर टेस्ट की तैयारी: रूस की मिसाइल से क्यों डरा अमेरिका?
America Nuclear Testing: एक दौर था जब अमेरिका और रूस ने परमाणु समझौते (Nuclear Agreement) के तहत नए न्यूक्लियर हथियार न बनाने का करार किया था। दोनों देशों ने वादा किया था कि वे हथियारों की संख्या नहीं बढ़ाएंगे और परमाणु परीक्षण रोकेंगे। लेकिन 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने इस करार से पीछे हटने का फैसला किया। इसके बाद रूस ने 2018 में कुछ ऐसा किया कि 33 साल बाद अमेरिका दोबारा न्यूक्लियर टेस्टिंग (Nuclear Testing) के लिए मजबूर हो गया।
30 साल बाद फिर से न्यूक्लियर टेस्टिंग करने की तैयारी
अमेरिका 30 साल बाद फिर से परमाणु परीक्षण करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह फैसला अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने लिया है, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल मच गई है।

अमेरिका ने आखिरी बार 1992 में नेवाडा (Nevada) में न्यूक्लियर टेस्ट किया था। 1996 में उसने Comprehensive Test Ban Treaty (CTBT) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत उसने वादा किया था कि अब और परीक्षण नहीं करेगा। मगर अब 2025 में ट्रम्प सरकार ने उस नीति को पलट दिया है।
रूस की मिसाइल से अमेरिका में मची हलचल
रूस ने हाल ही में अपनी परमाणु क्रूज़ मिसाइल Burevestnik (बुरेवेस्टनिक) के सफल परीक्षण का दावा किया है। रूस के इस कदम ने पूरी दुनिया में चिंता पैदा कर दी है। रूस का कहना है कि यह परीक्षण उसकी रक्षा तैयारी का हिस्सा है, लेकिन अमेरिका इसे सीधा खतरा मान रहा है।
रूस की मिसाइल से डरा अमेरिका?
रूस की इस मिसाइल को 'डूम्सडे वेपन (Doomsday Weapon)' भी कहा जाता है क्योंकि यह लंबी दूरी तक जाकर दुश्मन देश को पूरी तरह नष्ट करने की क्षमता रखती है। इसी डर की वजह से अमेरिका ने भी 30 साल बाद अपने परीक्षण कार्यक्रम को फिर से शुरू करने का फैसला लिया।
ट्रम्प का तर्क: रूस और चीन बढ़ा रहे हैं हथियार
डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि रूस और चीन दिन-प्रतिदिन अपनी परमाणु शक्ति बढ़ा रहे हैं।
रूस जहां हाइपरसोनिक मिसाइल (Hypersonic Missile) तैयार कर रहा है, वहीं चीन अपनी न्यूक्लियर कैपेसिटी को तीन गुना करने में लगा हुआ है।
ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका अब "शक्ति संतुलन" बनाए रखने के लिए न्यूक्लियर टेस्टिंग करेगा ताकि उसके पास भी समान तकनीकी और सैन्य बढ़त बनी रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम दुनिया को फिर से एक नई हथियारों की दौड़ (Arms Race) की तरफ धकेल सकता है।
दुनिया में बढ़ी चिंता और आलोचना
अमेरिका के इस कदम की दुनिया भर में आलोचना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और यूरोपीय संघ (EU) ने इसे "विश्व शांति के लिए खतरनाक कदम" बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका परीक्षण शुरू करता है, तो भारत, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश भी अपने परमाणु कार्यक्रमों को तेज़ कर सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था (Global Security Order) अस्थिर हो सकती है और एक नई परमाणु होड़ शुरू हो जाएगी।
कैसे होती ही न्यूक्लियर टेस्टिंग?
परमाणु बमों के परीक्षण मुख्य रूप से तीन प्रकार से किए जाते हैं:
1. वायुमंडलीय परीक्षण (Atmospheric Test):
इसे खुले आसमान में किया जाता है। यह सबसे अधिक घातक माना जाता है क्योंकि इसका असर वायु और वातावरण पर पड़ता है।
2. भूमिगत परीक्षण (Underground Test):
इसमें बम को जमीन के अंदर विस्फोटित किया जाता है ताकि रेडिएशन का प्रभाव सीमित रहे।
3. जलमग्न परीक्षण (Underwater Test):
यह समुद्र या नदी में किया जाता है। इसका असर समुद्री जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
कुछ जरूरी लेकिन असंभव बातें
रूस और अमेरिका के बीच यह नया परमाणु तनाव पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। अगर दोनों देश अपने पुराने समझौतों को भुलाकर फिर से हथियारों की दौड़ शुरू करते हैं, तो इसका असर विश्व शांति, पर्यावरण और मानवता- तीनों पर पड़ेगा।
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