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अफ़ग़ानिस्तान की पहली महिला मेयर ज़रीफ़ा ग़फ़ारी बुर्क़े में भी तालिबान से बातचीत को तैयार

''मैं तालिबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हूँ. मैं ये भूलने के लिए तैयार हूँ कि आपने मेरे पिता को मारा, आप मुझे और मेरे पति को मारने की कोशिश कर रहे थे. मैं अपना ग़म और सपनों को भूलकर आपसे बात करना चाहती हूँ.''

Afghanistans first female mayor Zarifa Ghafari ready to talk to Taliban in burqa

ये शब्द हैं अफ़ग़ानिस्तान के वरदक प्रांत में मैदान शर की मेयर रह चुकी 29 साल की ज़रीफ़ा ग़फ़ारी के.

देश की पहली महिला मेयर कही जाने वाली ज़रीफ़ा इस समय अपने परिवार के साथ जर्मनी में हैं.

उनके पिता को पिछले साल नवंबर में मार दिया गया था, वे अफ़गान सेना में थे.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे जब से अफ़ग़ानिस्तान से भाग कर जर्मनी आईं हैं, तब से अधिकारियों से बात कर रही हैं.

उनके अनुसार वे उन अफ़ग़ान महिलाओं की आवाज़ बनने की कोशिश कर रही हैं, जिनकी बात किसी ने नहीं की. तालिबान के साथ जो भी बात कर रहा है, वो अपने लिए बात कर रहा है कि कैसे सत्ता में आएगा, क्या पद पाएगा?

कौन से शरिया क़ानून?

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''तालिबान शरिया क़ानून की बात कर रहे हैं. वो कैसा क़ानून है? मैं भी मुसलमान हूँ, मैंने भी बहुत सी इस्लामिक किताबें पढ़ी हैं. मैं कुरान-शरीफ़ की हाफ़िज हूँ. मैं उनको बताना चाहती हूँ कि अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएँ क्या चाहती हैं. उनके लिए अधिकार क्या है, उनका आज और भविष्य क्या है?

ज़रीफ़ा अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते होते हुए इस्तांबुल से जर्मनी पहुँची हैं.

अपनी यात्रा के बारे में बताते वक़्त अभी भी वे सिहर जाती हैं.

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वे बताती हैं, ''मेरे घर को लूटा गया, वो मेरी गाड़ी अपने साथ ले गए, मेरे बॉडीगार्ड के पास जो हथियार थे, वो छीन लिए और वो मुझे भी ढूँढ रहे थे. एक दिन तो मुझे बचने के लिए 30 किलोमीटर तक यहाँ से वहाँ भागना पड़ा और पाँच दिन तक बस मैं यहाँ से वहाँ भाग ही रही थी.''

उनके अनुसार, ''जब पहली बार हमने देश से निकलने की कोशिश की, तो उस दिन एयरपोर्ट गेट पर फ़ायरिंग हो गई. हमें वापस लौटना पड़ा. फिर अगले दिन मैं गाड़ी के फुटवेल (जहाँ पैर रखे जाते हैं) में छिपी रही. और रास्ते में जब भी चेकप्वाइंट आते थे तो मेरे पति मेरे ऊपर बैग रख देते थे ताकि कोई न जान पाए. जैस- तैसे हम पहुँचे, तो वहाँ बहुत सारे तालिबान लड़ाके थे. मैं बहुत डर रही थी कि अगर पहचान लिए गए तो क्या होगा.''

लेकिन फिर अफ़ग़ानिस्तान में तुर्की के राजदूत की मदद से वे निकलने में कामयाब रहीं और जर्मनी पहुँच गईं.

महिलाओं की आवाज़

महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली ज़रीफ़ा पर इससे पहले भी हमले की कोशिशें हो चुकी हैं.

वे बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान है और ये अब वहाँ की वास्तविकता है. और मैं झगड़े में यक़ीन नहीं करती.

वो आगे कहती हैं, "मैं और मेरा परिवार जर्मनी में है. हम यहाँ सुरक्षित हैं लेकिन मुझे उन महिलाओं की चिंता होती है, जो मेरे साथ काम कर रही थीं. वे मुझ से मदद मांग रही हैं. मुझे इस बात की शर्म आती है कि आप किसी काम के नहीं हैं, तो जिंदगी जी क्यों रहे हैं, मुझे लगता है कि मेरे पास आवाज़ है जिसके ज़रिए मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाली महिलाओं की बात पहुँचा सकती हूँ."

"मैं गुहार लगा रही हूँ कि मेरी आवाज़ तालिबान तक पहुँचे कि मैं उनसे बातचीत के लिए तैयार हूँ."

वे कहती हैं, ''अगर तालिबान का नेतृत्व चाहता है कि मैं उनसे बुर्क़ा पहनकर बातचीत करूँ, तो मैं इसके लिए भी तैयार हूँ. वो दुनिया के किसी भी कोने में मुझ से बात करना चाहते हैं या चाहते हैं कि मैं अफ़ग़ानिस्तान में आकर बात करूँ, तो मैं तैयार हूँ. वो अगर शर्त भी रखेंगे तो मैं तैयार हूँ, लेकिन बात करने के लिए तैयार हो जाएँ, बस मुझे उनसे ये आश्वासन चाहिए."

अफ़ग़ानिस्तान में नियंत्रण के बाद तालिबान की तरफ़ से की गई पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुज़ाहिद ने कहा था, "हम शरिया व्यवस्था के तहत महिलाओं के हक़ तय करने को प्रतिबद्ध हैं. महिलाएँ हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने जा रही हैं. हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा."

ज़रीफ़ा कहती हैं, ''तालिबान तो यही सोचता है कि अफ़ग़ान की महिलाओं को वेस्टर्न राइट्स या पश्चिमी आज़ादी चाहिए. हमें वो आज़ादी नहीं चाहिए. मुझे वैसी आज़ादी चाहिए जो अहमद शाह अब्दाली की माँ, पत्नी, बेटियों को थी, राबिया बल्ख़ी, सौरया को थी, ये महिलाएँ अफ़ग़ानिस्तान से आती थीं. हमें वो आज़ादी चाहिए जो हज़रत मोहम्मद की पत्नियों को थी, मैं उससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहती हूँ.''

"हमें मूलभूत आज़ादी चाहिए, जिसमें शिक्षा का अधिकार हो, काम करने की आज़ादी हो. तालिबान और हमें एक दूसरे को समझना होगा. मैं यूनिवर्सिटी बुर्का पहनकर जाऊँ या स्कॉर्फ़ पहनकर, जींस पहनकर जाऊँ या लंबी ड्रेस पहनकर, ये बाद की बात है."

"लेकिन बात करके ही हल निकलेगा, झगड़े से किसी भी बात का कोई समाधान निकलेगा. हम कहेंगे अधिकार दो वो नहीं देंगे, बाहर निकलने दो वो इसका भी अधिकार नहीं देंगे, वो महिलाओं को मारेंगे तो ऐसे तो नहीं चलेगा. और दिक़्क़त वहीं की वहीं रहेगी."

जब मैंने पूछा कि आप अकेली क्या कर पाएँगी. तो उनका कहना था कि मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि मेरे साथ कौन खड़ा है, बस मेरी आवाज़ कमज़ोर नहीं होनी चाहिए. अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के पास तो अपनी आवाज़ उठाने का ज़रिया भी नहीं है.

वे कहती हैं, ''मैं 100 फ़ीसदी आश्वस्त हूँ कि अगर एक बार तालिबान और उसके नेतृत्व ने इस आवाज़ को सुनने के संकेत दिए और औरतों को ये पता चला कि तालिबान इसमें शामिल होना चाहता है, तो जितनी भी अफ़ग़ान औरतें हैं वो सभी मेरे साथ खड़ी होंगी क्योंकि मेरे तर्क बहुत स्पष्ट हैं. मैं तालिबान को बाहर नहीं निकालना चाहती, मुझे एक महिला या इंसान होने के नाते उनके रहने या ना रहने से कोई दिक़्क़त नहीं है. वो रहे या ना रहें मुझे कोई लेना-देना नहीं है. मेरे लिए अहम है मेरे अधिकार, अगर तालिबान वो दे रहा है, तो मैं क्यों झगड़ा करूँ या सरकार दे रही है, मेरे लिए अधिकार ही ज़रूरी है. अगर आज़ादी मिलेगी तभी तो देश के लिए काम कर पाऊँगी.''

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विकास कैसे होगा?

लेकिन मेयर बनने के बाद उन्होंने देश के विकास और महिलाओं के लिए जो कुछ सपने देखे होंगे और योजना बनाई होगी, वो क्या अब 20 साल पीछे नहीं चले गए?

इस सवाल पर वे कहती हैं, ''मैं नकारात्मक सोच नहीं रखती, मैं उम्मीद के साथ जीती हूँ, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर जो हो रहा है मुझे उसकी जानकारी है. तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहिए. वो इसलिए आए हैं कि कुछ साल तक रहें और ये अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बिना संभव नहीं हो पाएगा. तालिबान के जितने भी सैनिक हैं वो लोगों के घर से मांग कर खाना खा रहे हैं. आम लोगों की ज़िंदगी का स्तर नीचे गिरता जा रहा है. जितनी जल्दी उन्हें मान्यता मिलेगी उतनी जल्दी ये दिक़्क़ते सुलझ जाएँगी. तो स्वीकृति के लिए उन्हें शर्तों को पूरा करना पड़ेगा.''

वे कहती हैं कि तालिबान की वापसी के लिए मुल्क और सरकार ज़िम्मेदार हैं लेकिन वे लड़ती रहेगी.

उनके अनुसार, वे अफ़ग़ानिस्तान के एयरपोर्ट से मिट्टी लाई हैं और वे उसे वापस जाकर सौंपना चाहती हैं, उनके बाहर रहने की कोई योजना नहीं है. उन्हें अपने वतन वापस जाना है, अपने पिता के पास जाना है.

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